इजरायल-अमेरिका ने ईरान पर शनिवार को एक साथ मिलकर हमला कर दिया। ईरान ने भी दोनों दुश्मन देशों को कड़ा संदेश देते हुए प्रहार किया है। इन हमलों से पूरे मिडिल ईस्ट में हड़कंप मच गया है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में दुबई, यूएई, ओमान आदि देशों में अमेरिकी एयरबेसों को निशाना बनाकर भारी नुकसान पहुंचाया है। इस बीच एक बार फिर से 'होर्मुज स्ट्रेट' चर्चा में आ गया है। 

 

होर्मुज स्ट्रेट अरब सागर का हिस्सा है, जो ईरान से होते हुए फारस की खाड़ी जाता है। यह पतले पानी का रास्ता (कच्चे तेल) है। यह वह रास्ता है जहां से कुवैत, बहरीन, सउदी आदि देश कच्चा तेल दूसरे देशों को बेचते हैं। इस नई जंग की वजह से कच्चे तेल की कीमतें तय करने में मुश्किलों को सामना करना पड़ रहा है, जिससे अंदेशा जताया जाने लगा है कि आने वाले समय में पेट्रोल-डीजन की कीमतें बढ़ सकती हैं।

 

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होर्मुज स्ट्रेट क्या है?

होर्मुज स्ट्रेट को एक पतला समुद्री गलियारा है। यह फारस की खाड़ी का मेन एंट्री गेट है। यह उत्तर में ईरान और दक्षिण में यूनाइटेड अरब अमीरात, ओमान के बीच है। यह एक तरह से फारस की खाड़ी और अरब सागर का लिंक है। यह होर्मुज स्ट्रेट लगभग 100 मील है यानी 161km लंबा है। यह रास्ता लगभग 21 मील पतला हो जाता है।

होर्मुज स्ट्रेट अहम क्यों है?

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया भर में समुद्र से होने वाले तेल शिपमेंट का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। यह एनर्जी ट्रेड के लिए जरूरी रास्ता है। अधिकतर पर्शियन गल्फ एक्सपोर्टर्स के पास शिपमेंट के लिए कोई दूसरा समुद्री रास्ता नहीं है। एनालिटिक्स फर्म बोर्टेक्सा के डेटा से पता चला है कि पिछले साल औसतन करीबन 20 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा तेल, कंडेनसेट और रिफाइंड फ्यूल होर्मुज से होकर दुनियाभर में पहुंचा है। 

रास्ता बंद होने से क्या नुकसान होगा? 

होर्मुज स्ट्रेट को अगर ईरान बंद करता है, तो दुनियाभर में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। तेल सप्लाई में रुकावट होगी। क्रूड ऑयल की कीमतों में बढ़ोत्तरी होगी। यह दुनिया की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकती है। यानी कुल मिलाकर इस रास्ते के बंद होने से ग्लोबल तेल मार्केट पर बड़ा असर पड़ेगा। 

 

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भारत के लिए खास महत्व

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का करीब 85% तेल आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा फारस की खाड़ी के देशों से आता है। भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट तेल और एलएनजी (लिक्वीफाइड नेचुरल गैस) आयात का प्रमुख समुद्री मार्ग है। अगर यह रास्ता बंद होता है तो भारत को वैकल्पिक मार्ग अपनाने होंगे जो लंबे, महंगे और अस्थिर हो सकते हैं। भारत, ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह परियोजना में शामिल है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए जरूरी है। अगर ईरान अमेरिका से और अधिक अलगाव की ओर जाता है, तो विशेषकर अमेरिका और इजरायल के साथ रिश्तों को ध्यान में रखते हुए भारत को भू-राजनीतिक संतुलन साधने में मुश्किल हो सकती है।

 

इसके साथ ही होर्मुज में जब भी तनाव बढ़ता है तो बीमा दरें बढ़ जाती हैं, शिपिंग महंगी हो जाती है और तेल की कीमतें चढ़ जाती हैं। 2019 में जब ईरान-अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा था, तब भारत को कच्चे तेल के आयात पर करोड़ों डॉलर अतिरिक्त चुकाने पड़े थे।