अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जिन लोगों ने नवंबर 2024 में हुए चुनावों में चुना था, अब वे ही उनके खिलाफ हो रहे हैं। ईरान से भिड़कर डोनाल्ड ट्रंप, कुछ हासिल तो नहीं कर पाए लेकिन अपना जनसमर्थन गंवा रहे हैं। पहले जिन सर्वे में डोनाल्ड ट्रंप, कमला हैरिस और पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन को पीछे छोड़ देते थे, अब उन्हीं सर्वे में ट्रंप से लोग किनारा कर रहे हैं। लोग उनसे सिर्फ ईरान से जंग लड़ने की वजह से नहीं नाराज हैं, कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर उनकी आलोचना हो रही है। 

अमेरिका में कई सर्वे हुए हैं, जिनमें लोगों ने साफ तौर पर डोनाल्ड ट्रंप को उनकी नीतियों की वजह से नापसंद किया है। डोनाल्ड ट्रंप, इतने अप्रत्याशित फैसले ले रहे हैं, जिन पर न तो उनका साथ अदालतें दे रहीं हैं, नही अमेरिका के आम लोग। अमेरिका में 'नो किंग्स प्रोटेस्ट' को लेकर भी खूब शोर मचा था। लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप को गिरफ्तार तक करने की मांग उठाई थी। 

अमेरिकी केबल न्यूज नेटवर्क CNN ने हाल ही में एक ऑनलाइन पोल कराया था। पोल में ज्यादातर लोग ट्रंप से नाराज दिखे। जिन लोगों ने उन्हें वोट किया था, वे भी  में ट्रंप से बुरी तरह नाराज हैं। कुल 22 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने ट्रंप को, उनकी कार्यशैली के आधार पर नापसंद करार दिया है। सोशल मीडिया से लेकर वॉशिंगटन की गलियों तक, लोग उनके खिलाफ मुखर होकर बोल रहे हैं। 

 

यह भी पढ़ें: न जमीन पर कब्जा, न हवा में मजबूत, जेट नहीं, ईरान ने अमेरिका का हौसला गिराया है

ट्रंप पर हुए पोल में क्या बोल रहे हैं लोग?

CNN ने अपने पोल में दावा किया है कि ट्रंप की प्रवासी नीति से ही उनके 15 फीसदी समर्थक खुश नहीं हैं। विदेश नीति पर 25 फीसदी लोग नाराज हैं, ईरान पर 28 फीसदी लोग नाराज हैं। अर्थव्यवस्था पर 30 और महंगाई पर 39 फीसदी ट्रंप समर्थक उनसे नाराज हैं। गैस की बढ़ती कीमतों की वजह से करीब 45 फीसदी ट्रंप वोटर नाराज हैं।

 

नो किंग्स प्रोटेस्ट में डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग। Photo Credit: PTI

ट्रंप के लिए चिंता की बात क्या है?

हाल के दिनों में हुए कई सर्वे यह इशारा कर रहे हैं कि अब लोगों को अपने फैसले पर पछतावा हो रहा है कि उन्होंने ट्रंप को क्यों चुना है। साल 2024 में ट्रंप को वोट देने वाले कुछ लोगों को अब अपनी पसंद पर ही संदेह हो रहा है। UAMS यूट्यूब पोल में अप्रैल 2025 में 74 प्रतिशत ट्रंप के वोटरों ने कहा था कि उन्हें अपने वोट पर भरोसा है। अब यह संख्या घटकर 62 प्रतिशत तक आ गई है। 38 प्रतिशत ट्रंप वोटरों ने चिंता जाहिर की है, चुप्पी साधी है या पछतावा जताया है। 

यह संख्या कमला हैरिस वोटरों से दोगुनी है। इस पोल में सिर्फ 5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें पूरा पछतावा है और अगर मौका मिले तो वे दूसरी पार्टी को वोट देंगे। डोनाल्ड ट्रंप के 16 प्रतिशत समर्थक अब उनका विकल्प ढूंढ रहे हैं। एक और सर्वे 'स्ट्रेंथ इन नंबर्स' में 13 प्रतिशत ट्रंप वोटरों ने कहा कि वे डोनाल्ड ट्रंप को चुनकर पछता रहे हैं। यह संख्या कमला हैरिस के वोटरों से दोगुनी है। जिन युवाओं ने ट्रंप को चुना है, उनमें 17 फीसदी लोगों को पछतावा है। पिछले साल अप्रैल और अक्टूबर में यह आंकड़ा सिर्फ 6-7 प्रतिशत था।

यह भी पढ़ें: परमाणु प्लांट पर मिसाइल हमला, ईरान बोला- कई राजधानियों में जीवन खत्म हो जाएगा

प्रवासी नीति पर कैसे घिरे हैं ट्रंप?

 डोनाल्ड ट्रंप को पसंद करने वाले 15 फीसदी लोग मानते हैं कि उनकी प्रवासी नीतियां, खराब हैं। डोनाल्ड ट्रंप, अपनी प्रवासन नीति को सबसे सफल बताते हैं लेकिन जिस तरीके से उन्होंने लोगों को डिपोर्ट किया है, वह अमेरिकियों को भी रास नहीं आया है। जो समुदाय, बाहर से आकर अमेरिका में बसे हैं, उन्होंने मुखर विरोध भी किया था। उन्होंने सीमा सुरक्षा और बेहतर कानून व्यवस्था का वादा किया था, जिसकी धज्जियां अमेरिका में उड़ रहीं हैं।

नो किंग्स प्रोटेस्ट में डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग। Photo Credit: PTI

विदेश नीति पर कैसे घिरे हैं ट्रंप?

 ट्रंप के 25 फीसदी वोटर, उनकी विदेश नीति से नाराज हैं। वह 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति से चर्चा में आए थे, अब उनकी वजह से अमेरिका अलग-थलग पड़ गया है। नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) के सहयोगी देश, ट्रंप से किनारा कर रहे हैं। फ्रांस और ब्रिटेन जैसे दोस्तों ने अमेरिका से मुंह मोड़ लिया है। उनकी टैरिफ नीतियों ने अमेरिका के खिलाफ दुनियाभर में माहौल बनाया है। वह हाल में कई अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और संगठनों से अचानक बाहर निकल आए हैं। 

यह भी पढ़ें: अमेरिका-इजरायल से जंग के बीच ईरान ने किन दो लोगों को फांसी पर चढ़ा दिया?

ईरान नीति पर कैसे घिरे हैं ट्रंप?

 डोनाल्ड ट्रंप के 28 फीसदी वोटर, उनकी ईरान नीति से नाराज हैं। अमेरिका में उनके समर्थक और आलोचक, दोनों कह चुके हैं कि वह बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायल के दबाव में इस जंग में कूद पड़े हैं। डोनाल्ड ट्रंप, इसे अंतहीन लड़ाई में बदल रहे हैं। 

वह खुद के लिए शांति के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार मांग रहे थे, भारत-पाकिस्तान की जंग रुकवाने का क्रेडिट ले रहे थे लेकिन अमेरिका को ही युद्ध में झोंक दिया। वह इतने अप्रत्याशित फैसले लेते हैं कि अब अमेरिका में उनकी सरकार में, उन्हीं के चुने हुए लोग भाग रहे हैं। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने टॉप कमांडर रैंडी जॉर्ज से इस्तीफा तक ले लिया, क्योंकि उनके हिसाब से काम कर रहे हैं। 

नो किंग्स प्रोटेस्ट में डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग। Photo Credit: PTI

आर्थिक नीति पर कैसे घिरे हैं ट्रंप?

डोनाल्ड ट्रंप, 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नारा देते हैं, लेकिन अपनी आर्थिक नीतियों की वजह से अमेरिका की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। मनमाने टैरिफ से अमेरिका को तत्कालीन फायदा हो सकता है लेकिन उन्होंने अपने रणनीतिक भागीदारों को नाराज किया है। स्थानीय स्तर पर आर्थिक अस्थिरता भी बढ़ रही है, जिससे मध्यम वर्ग नाराज हैं। उनसे अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर करीब 30 फीसदी उनके वोटर नाराज हैं। रिवेंज टैक्स में अमेरिकी कंपनियों को ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, युद्ध और शटडाउन की वजह से निवेशक भी कतरा रहे हैं। लोगों के मन में डर है कि अगर जमीनी कार्रवाई शुरू हुई तो अमेरिका को और नुकसान पहुंचेगा।

अमेरिका ने इजरायल के लिए जंग छेड़ा, वहीं जंग खत्म करने की मांग कर रहे लोग। Photo Credit: PTI

महंगाई पर ट्रंप नीति नहीं बना रहे, संकट पैदा कर रहे हैं?

डोनाल्ड ट्रंप के 39 फीसदी समर्थक उनसे मंहगाई के मुद्दे पर नाराज हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने महंगाई कम करने का वादा किया था लेकिन उनकी नीतियों की वजह से महंगाई और बढ़ गई। लगातार युद्ध की वजह से अब सप्लाई चेन बाधित हो रही है। खाने-पीने की चीजें महंगी हो रहीं हैं। गैस और पेट्रोलियम की कीमतें बढ़ी हैं। 

गैस की किल्लत, 39 फीसदी समर्थक नाराज 

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट बताती है कि ईरान के साथ जंग में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा हो गईं हैं। BBC की एक रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत पहली बार चार साल बाद फिर 4 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुंच गई है। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से पेट्रोल 1 डॉलर से ज्यादा और डीजल 1.70 डॉलर से ज्यादा के उछाल पर है। 

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से तेल उत्पादन और ट्रंसपोर्टेशन रुका है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें अब करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। ट्रंप सरकार इसे अस्थायी बता रही है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर ऐसा ही रहा तो तगड़ा नुकसान होगा। फरवरी में जंग शुरू होने से पहले पेट्रोल 2.98 डॉलर प्रति गैलन था। अब बढ़ती कीमतें खाने-पीने समेत रोजमर्रा के सामान को भी महंगा कर रही हैं।  ट्रंप के नारे, अमेरिकियों को भरोसा देने में नाकायाब हो रहे हैं।