अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान नए सर्वोच्च नेता की तलाश में जुटा है। इस बीच खबर आ रही है कि अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई इस रेस में सबसे आगे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक मोजतबा खामेनेई अपने पिता के उत्तराधिकारी बनने के प्रबल दावेदार हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि ईरान के वरिष्ठ धर्मगुरु जल्द ही नाम का ऐलान करेंगे, लेकिन इस बीच ईरान को एक चिंता भी सता रही है।

ईरान को कौन सी टेंशन सता रही?

ईरान में विशेषज्ञों की एक सभा सर्वोच्च नेता के नाम का चयन करती है। इस सभा को मोजतबा खामेनेई के नाम की घोषणा करने पर आपत्ति है। उसका मानना है कि अगर नाम का ऐलान किया गया तो अमेरिका-इजरायल उन्हें भी निशाना बना सकते हैं। हालांकि अगर मोजतबा के नाम का ऐलान होता है तो वह ईरान के तीसरे सर्वोच्च नेता होंगे और 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार एक ही परिवार को यह पद मिलेगा।

 

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बैठक से पहले इमारत पर इजरायल का हमला

इजरायल ने मंगलवार को दावा किया था कि जहां विशेषज्ञ सभा की बैठक होनी थी, वह इमारत को उड़ा दिया गया है। वहीं ईरानी मीडिया ने बताया कि यह इमारत कोम नाम की जगह पर स्थित थी। हालांकि हमले के वक्त अंदर कोई नहीं था। मंगलवार को विशेषज्ञ सभा ने दो वर्चुअल बैठक कीं। इसमें अगले सर्वोच्च नेता के नाम पर चर्चा हुई। मगर सार्वजनिक ऐलान नहीं किया गया।

आईआरजीसी में मोजतबा की गहरी पकड़

55 साल के मोजतबा खामेनेई की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) और ईरानी प्रशासन में अच्छी पकड़ मानी जाती है। हालांकि उन्होंने हमेशा पर्दे के पीछे से ही काम किया है। 

 

उनकी तुलना इस्लामिक ईरान के संस्थापक रुहोल्लाह खुमैनी के बेटे अहमद खुमैनी से की जाती है। जैसे अहमद खुमैनी ने इस्लामिक क्रांति के बाद अपने पिता के सहायक और विश्वासपत्र के तौर पर काम किया। ठीक वैसे ही मोजतबा खामेनेई ने अपने पिता का साथ उनके दफ्तर में दिया। 1980 के दशक में इराक-ईरान युद्ध में मोजतबा खामेनेई ने आईआरजीसी से जुड़ी हबीब बटालियन में अपनी सेवा दी। यही से मोजतबा खामेनेई ने आरजीसी में अपना प्रभाव बढ़ाया।

 

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मोजतबा खामेनेई विवादित क्यों?

माना जाता है कि 2009 में लोकतांत्रिक आंदोलन के दमन में मोजतबा खामेनेई का हाथ था। ईरान का विपक्ष उन पर चुनाव में धांधली का आरोप भी लगाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मोजतबा खामेनेई के पास इस्लामी न्यायशास्त्र की गहन जानकारी नहीं है, जबकि संविधान के मुताबिक ज्ञान का होना अनिवार्य है। उनकी पहचान ईरान में धर्मगुरु के तौर पर भी नहीं। न हीं उनके पास अयातुल्ला का पद है। न ही वे मुजतहिद हैं। बस उन्होंने कोम के मदरसों से पढ़ाई की है।