ईरान के बाद इजरायल की बलूचिस्तान में दिलचस्पी बढ़ती जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स मे दावा किया गया कि इजरायल अब बलूचिस्तान को अहम रणनीतिक ठिकाने के तौर पर देख रहा है। जहां से न केवल ईरान, बल्कि पाकिस्तान पर भी दबाव बनाया जा सकता है। पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत पिछले कई दशकों से अशांति का गवाह बना है। बलूचिस्तान का एक लंबा भूभाग ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान से लगा हुआ है। पूरा इलाका दुर्गम पहाड़ियों से घिरा है। यहां से अलगाववादी तत्वों का आना-जाना बेहद आसान है। यहां फैली अशांति ने इजरायल की दिलचस्पी और बढ़ा दी है।  

 

बलूचिस्तान की सरजमीं से इजरायल ईरान के साथ-साथ पाकिस्तान को भी काबू करना चाहता है, क्योंकि इजरायल लंबे समय से पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को बड़ा खतरा मानता है। इस्लामी जगत में पाकिस्तान इकलौता देश है, जिसके पास विनाशकारी बम हैं। हाल ही में सऊदी अरब के साथ उसके समझौते ने इजरायल की टेंशन और बढ़ा दी है। परमाणु बम के मामले में इजरायल बेहद संवेदनशील है। ईरान के साथ उसका मौजूदा तनाव भी इसी कारण है। 

 

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पाकिस्तान के प्रति इजरायल की सोच क्या है?

पिछले साल 18 जून 2025 को इजरायल के पूर्व उप रक्षा मंत्री मीर मसरी ने एक ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने कहा था कि ईरान के बाद हम पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने का प्रयास कर सकते हैं।' 2011 में बेंजामिन नेतन्याहू ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का जिक्र एक इंटरव्यू में किया था। तब उन्होंने कहा था कि परमाणु हथियारों को किसी उग्रवादी इस्लामी शासन के हाथ में आने से रोकना है। पहले को ईरान और दूसरे को पाकिस्तान या अधिक सटीक शब्दों में कहें तो तालिबान द्वारा पाकिस्तान पर कब्जा कहते हैं, क्योंकि अगर इन कट्टरपंथियों के पास परमाणु हथियार होंगे तो वे उन नियमों का पालन नहीं करेंगे, जिनका पालन पिछले लगभग 7 दशकों से किया जा रहा है। 

बलूचिस्तान पर इजरायली थिंक टैंक का मंथन

पिछले साल ही 12 जून को इजरायली थिंक टैंक मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट (MEMRI) ने बलूचिस्तान अध्ययन प्रोजेक्ट का आगाज किया। खास बात यह है कि बलूच नेता मीर यार बलूच को प्रोजेक्ट का अध्यक्ष बनाया गया। प्रोजेक्ट के शुरू होने से ठीक एक महीने पहले यानी 12 मई को ही मीर यार बलूच ने संयुक्त राष्ट्र को एक पत्र लिखा था। इसमें बलूचिस्तान को देश के तौर मान्यता देने की अपील की गई थी। 

बलूचों की सक्रियता के पीछे कौन?

साल 1998 में MEMRI की स्थापना कर्नल यिगल कार्मोन ने की थी। उन्होंने इजरायल सैन्य खुफिया कोर में करीब 20 वर्षों तक सेवा दी थी। इस संस्था के संबंध इजरायल की खुफिया एजेंसी से भी बताए जाते हैं। इसने 2012 तक खुफिया जानकारी भी जुटाई। मौजूदा समय में यह थिंक टैंक ईरान, तुर्की और खाड़ी देशों पर नजर रखता है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बलूचिस्तान मामले को अधिक कवरेज मिल रही। वहीं यूरोप में भी बलूच कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ी है। पाकिस्तान सरकार का मानना है कि इसके पीछे इजरायली थिंक टैंक MEMRI का हाथ है।

 

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बलूचिस्तान में इजरायल की दिलचस्पी क्यों?

  • पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न हैं। यहां तेल, गैस, यूरेनियम, तांबा, कोयला और दुर्लभ पृथ्वी तत्व मौजूद है। ईरान के अलावा इसकी सीमा अफगानिस्तान और अरब सागर से भी लगती है। अगर बलूचिस्तान में इजरायल का प्रभाव बढ़ा तो उसे न केवल ईरान, बल्कि फारस की खाड़ी में भी लाभ मिलेगा। भविष्य में इन खनिज पदार्थों तक इजरायल की पहुंच भी आसान हो सकती है।

 

  • पाकिस्तान वैश्विक मंच पर खुलकर फिलिस्तीन के समर्थन में खड़ा है। वह इजरायल को देश के तौर पर मान्यता भी नहीं देता है। बलूचिस्तान मुद्दे के सहारे तेल अवीव पाकिस्तान पर दबाव बनाने की रणनीति पर जुटा है।

 

  • पाकिस्तान ने हाल के दिनों में तुर्की और सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाया है। इजरायल तुर्की को ईरान के बाद सबसे बड़ा खतरा मानता है। माना जा रहा है कि बलूचिस्तान मामले में इजरायल दिलचस्पी दिखाकर इस्लामाबाद को संदेश देना चाहता है।

बलूचिस्तान का रणनीतिक महत्व

इसी साल अमेरिकी-इजरायली रक्षा विशेषज्ञ जोस लेव ने टाइम्स ऑफ इजरायल में लिखे अपने लेख में बलूचिस्तान के रणनीतिक महत्व पर प्रकाश डाला था। उन्होंने लिखा, 'बलूचिस्तान दक्षिण-पूर्वी ईरान, दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान और अरब सागर के बीच स्थित है। यह ईरान के पूर्वी प्रांतों पर छाया डालता है और मकरान तट पर नजर रखता है, जो अब बंदरगाहों, पाइपलाइनों, भूमिगत केबलों और महत्वाकांक्षाओं से भरा हुआ है। इसलिए अगर ईरान इजरायल के लिए दीर्घकालिक रूप से एक प्रमुख चुनौती बना रहता है तो बलूचिस्तान एक मामूली बिंदु नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह कोई अड्डा या झंडा नहीं, बल्कि एक खिड़की है।'