आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में 'हॉर्मोनल इम्बैलेंस' एक ऐसी समस्या बन गई है जो अंदर ही अंदर शरीर को नुकसान पहुंचा रही है। खासतौर पर शहरों में रहने वाली महिलाओं में PCOS (पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) और थायरॉइड की बीमारी एक 'धमाके' की तरह बढ़ी है। इसकी वजह शहर में रहने वाले लोगों और खासकर महिलाओं का खानपान हैं। अगर आप भी मैदे से बनी चीजें ज्यादा खा रही हैं तो आप भी PCOS और थायरॉइड जैसी समस्याओं को दावत दे रही हैं। 

 

शहरी जीवन की कुछ आदतें महिलाओं के हॉर्मोन पर बहुत बुरा असर डाल रही हैं। सेंडेंटरी लाइफस्टाइल यानी घंटों बैठकर काम करने और एक्सरसाइज न करने से मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। इससे शरीर में फैट बढ़ता है जो हॉर्मोन बनाने वाली गांठ को नुकसान पहुंचाता है। लगातार रहने वाला क्रोनिक स्ट्रेस शरीर में कोर्टिसोल हॉर्मोन को बढ़ा देता है। जिसकी वजह से थायरॉइड और प्रजनन हॉर्मोन का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है।

 

रात को देर तक जागने और नींद की कमी से शरीर की बॉडी क्लॉक खराब हो जाती है, क्योंकि हॉर्मोन की मरम्मत गहरी नींद में ही होती है। हॉर्मोन एक्सपर्ट डॉ. समीर कालरा बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में इनके मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है। हॉर्मोन हमारे शरीर के वे छोटे-छोटे संदेश भेजने वाले सिपाही हैं, जो अगर अपना संतुलन खो दें तो वजन बढ़ना, चेहरे पर दाने आना और स्वभाव में चिड़चिड़ापन जैसी कई दिक्कतें शुरू हो जाती हैं।

 

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इसके अलावा खून की जांच में LH (ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन) और FSH (फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन) नाम के दो हॉर्मोन का लेवल चेक किया जाता है। एक स्वस्थ शरीर में इनका तालमेल बराबर होता है लेकिन PCOS की स्थिति में LH का लेवल काफी बढ़ जाता है, जिसकी वजह से पीरियड्स समय पर नहीं आते।

थायरॉइड की समस्या

थायरॉइड एक ऐसी गांठ है जो हमारे गले में होती है और शरीर की ऊर्जा को कंट्रोल करती है। डॉ. राजेश मेहता बताते हैं कि अगर किसी की TFT (थायरॉइड फंक्शन टेस्ट) रिपोर्ट में TSH का लेवल 4.5 से ज्यादा आता है, तो इसका मतलब है कि थायरॉइड सुस्त पड़ गया है। इसे 'हाइपोथायरायडिज्म' कहते हैं। इसकी वजह से शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। जिससे महिला को हर समय थकान लगती है, बहुत ज्यादा ठंड लगती है और कम खाने के बावजूद वजन बढ़ने लगता है। रिपोर्ट में T3 और T4 का लेवल भी देखा जाता है ताकि बीमारी की गंभीरता का पता चल सके।

 

क्यों बढ़ रही है यह समस्या?

डॉक्टरों ने बताया कि शहरों में रहने वाली महिलाओं में यह समस्या ज्यादा क्यों दिख रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है गलत खान-पान। आजकल हम मैदा, चीनी और पैकेट बंद खाना ज्यादा खाते हैं। यह खाना शरीर में 'इंसुलिन' के लेवल को खराब कर देता है। जिससे PCOS का खतरा बढ़ जाता है। दूसरा बड़ा कारण है शारीरिक मेहनत की कमी। ऑफिस में घंटों बैठकर काम करने और एक्सरसाइज ना करने से शरीर के हॉर्मोन सुस्त पड़ जाते है और पूरा शरीर असंतुलित हो जाता है।

 

मानसिक तनाव और केमिक्लस का बुरा असर 

शहर की तेज जिंदगी में मानसिक तनाव सबसे बड़ा दुश्मन है। जब हम ज्यादा तनाव लेते है, तो शरीर में 'कोर्टिसोल' नाम का हॉर्मोन बढ़ जाता है। जो थायरॉइड और ओवरी के काम में रुकावट डालता है। डॉ समीर यह भी बताते हैं कि हम जो प्लास्टिक के डिब्बे इस्तेमाल करते हैं यह जिनमें खाना गरम करते हैं। उनमें ऐसे केमिकल्स होते हैं जो हमारे हॉर्मेन के साथ छेड़छाड़ करते हैं। कॉस्मैटिक्स और मेकअप के ज्यादा इस्तेमाल से भी हानिकारक तत्व शरीर में पहुंच जाते हैं। इन्हीं सब कारणों के मेल से आज की पीढ़ी में हॉर्मोनल असंतुलन एक बड़ी चुनौती बन गया है। 

 

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रिकवरी का रास्ता

डॉक्टरों ने साफ किया है कि चाहे वह मेटफॉर्मिन जो कि PCOS के लिए होता है या फिर लेवोथायरोक्सिन जो कि थायरॉइड के लिए होता है। इन दवाइयों से मदद होती हैं लेकिन असली सुधार जीवनशैली बदलने से ही आता है। सही समय पर अपनी रिपोटर्स जैसे TSH और LH/FSH की निगरानी करना और नेचुरल आहार के साथ योग को अपनाना इस हॉर्मेनल जंग को जीतने का एकमात्र रास्ता है।