पेट्रोल और डीजल के दामों में अचानक हुई भारी बढ़ोतरी ने एक नया संकट खड़ा कर दिया है। तेल कंपनियों ने ईंधन के दामों में करीब 3 रुपये प्रति लीटर का बड़ा इजाफा किया है जिसके बाद से आम जनता के साथ-साथ ऑनलाइन काम करने वाले गिग वर्कर्स यानी डिलीवरी बॉय और कैब ड्राइवरों की परेशानी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। कीमतों में हुई इस बढ़ोतरी के बाद अब दिल्ली में पेट्रोल की कीमत लगभग 97.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत करीब 90.67 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है। ईंधन के दामों में करीब चार साल बाद हुए इस बड़े बदलाव के विरोध में और अपनी रोजाना की कमाई को बचाने के लिए अब इन डिजिटल प्लेटफॉर्म वर्कर्स ने आंदोलन का रास्ता चुन लिया है।
बढ़ती कीमतों के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज कराने के लिए गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन ने शनिवार को एक बड़े देशव्यापी बंद का ऐलान किया। इस हड़ताल के तहत दोपहर 12 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक पूरे 5 घंटे के लिए सभी ऐप आधारित सेवाओं को पूरी तरह बंद रखने का फैसला लिया गया। इस दौरान लाखों डिलीवरी पार्टनर्स और ड्राइवरों ने अपने-अपने मोबाइल ऐप्स को ऑफलाइन कर दिया। यूनियन का मानना है कि यह अस्थायी शटडाउन कंपनियों और सरकार के सामने अपनी बात रखने और अपना विरोध जताने का एक शांतिपूर्ण तरीका है जिससे सीधे तौर पर देश के करीब 1.2 करोड़ वर्कर्स पर सीधा असर हो रहा हैं।
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डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर दिखा सीधा असर
इस ऑल इंडिया हड़ताल और शटडाउन का सीधा असर देश की लगभग सभी ऑनलाइन और डिजिटल डिलीवरी सर्विस पर देखने को मिला है। इस आंदोलन में खाना पहुंचाने वाले जोमैटो और स्विगी, जल्दी राशन का सामान पहुंचाने वाले ब्लिंकिट और जेप्टो, कैब और बाइक टैक्सी सेवा देने वाले ओला, उबर और रैपिडो जैसे प्लेटफॉर्म शामिल रहे। इनके अलावा डंजो, अर्बन कंपनी, पॉर्टर और अमेजन फ्लेक्स के डिलीवरी नेटवर्क से जुड़े कर्मचारी भी इस बंद का हिस्सा बने जिसके वजह से दोपहर के समय लोगों को ऑनलाइन सामान ऑर्डर करने और आने-जाने की सुविधा में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
मांगें क्या है?
इस पूरे आंदोलन की मुख्य वजह वर्कर्स को मिलने वाला पैसा है। गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन ने सरकार और सभी ऐप कंपनियों के सामने यह बड़ी मांग रखी है कि डिलीवरी और राइड देने वाले इन कर्मचारियों के लिए कम से कम 20 रुपये प्रति किलोमीटर का रेट तय किया जाए। इसके लिए यूनियन ने भारत सरकार के साथ-साथ सभी प्रमुख ऐप कंपनियों को अपनी मांगों का एक लेटर भी भेजा है। उनका कहना है कि जब तक प्रति किलोमीटर मिलने वाले पैसे में तुरंत सुधार नहीं किया जाता तब तक महंगाई के इस दौर में उनके लिए घर चलाना बिल्कुल नामुमकिन हो जाएगा।
यूनियन के मुताबिक देश में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने के पीछे इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में ईरान के आसपास चल रहा तनाव है। यूनियन की अध्यक्ष सीमा सिंह ने साफ किया है कि एलपीजी सिलेंडर के मंहगे होने के बाद अब पेट्रोल-डीजल की इस मान ने वर्कर्स के बजट को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है।
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आने-जाने का बढ़ता खर्च
यूनियन के नेशनल कोऑर्डिनेटर निर्मल गोराना के मुताबिक यह कर्मचारी भीषण गर्मी और मुश्किल ट्रैफिक के बीच रोजाना 10 से 14 घंटे तक लगातार काम करते हैं। इन वर्कर्स में महिलाएं भी शामिल हैं जो खराब मौसम में भी सड़कों पर रहती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये सभी लोग अपनी कमाई के लिए पूरी तरह से मोटरसाइकिल, स्कूटर और दूसरे वाहनों पर डिपेंडेंट हैं। ईंधन महंगा होने से उनका रोज का आने-जाने का खर्च और गाड़ियों की सर्विसिंग का खर्चा काफी बढ़ गया है। इसके बदले कंपनियों ने उनके पैसे या डिलीवरी चार्च में कोई बदलाव नहीं किया है।
