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PM मोदी ने सोमनाथ मंदिर के शिखर का कुंभाभिषेक क्यों किया? असली कहानी पता चल गई

पीएम मोदी ने सोमनाथ मंदिर के शिखर का ऐतिहासिक अभिषेक किया है जो यहां के इतिहास में पहली बार हुआ है। 17 बार लूटे जाने और टूटने के बाद भी यह मंदिर आज भव्य रूप में खड़ा है।

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गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आज यानी 11 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ अमृत महोत्सव के अवसर पर मंदिर के 90 मीटर ऊंचे शिखर का कुंभाभिषेक किया। मंदिर के हजारों साल के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी प्रधानमंत्री ने शिखर का इस तरह से अभिषेक किया है। यह आयोजन मंदिर की आधुनिक प्राण-प्रतिष्ठा के 75 साल पूरे होने पर किया गया जिसकी शुरुआत 11 मई 1951 को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने की थी।

 

प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर के गर्भस्थान में रुद्राभिषेक करने के साथ-साथ शिखर का कुंभाभिषेक भी किया। इसके लिए देश के 11 अलग-अलग पवित्र तीर्थों से जल लाया गया था। मंदिर का शिखर बहुत ऊंचा है इसलिए 90 मीटर लंबी क्रेन की मदद से पवित्र जल का कलश ऊपर पहुंचाया गया। प्रधानमंत्री ने नीचे से ही रिमोट दबाकर इस अभिषेक को पूरा किया। इतिहास में पहली बार शिखर पर इस तरह जल अर्पण हुआ है।

 

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फूलों की बारिश

सोमनाथ अमृत महोत्सव को भव्य बनाने के लिए भारतीय वायुसेना की सूर्यकिरण टीम ने आसमान में करीब 15 मिनट तक शानदार शो दिखाए। इन विमानों ने जामनगर एयरफोर्स स्टेशन से उड़ान भरकर मंदिर के ऊपर अपनी सलामी दी। इसके साथ ही चेतक हेलीकॉप्टर से पूरे मंदिर परिसर पर फूलों की वर्षा की गई। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया और मंदिर के म्यूजियम का दौरा भी किया।

सोमनाथ मंदिर की खासियत

यह मंदिर अपनी अद्भुत बनावट और वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसे चालुक्य शैली में बनाया गया है और इसे 'कैलाश महामेरु प्रासाद' भी कहा जाता है। मंदिर का शिखर 155 फीट ऊंचा है और इसके ऊपर 10 टन भारी सोने का कलश लगा है। मंदिर के पास समुद्र किनारे एक 'बाण स्तंभ' स्थित है। इस स्तंभ की खासियत यह है कि यहां से साउथ पोल तक समुद्र के बीच में कोई भी जमीन का टुकड़ा या पहाड़ नहीं आता है।

 

 

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक सोमनाथ को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है। 'सोम' का अर्थ चंद्रमा होता है। पौराणिक कथा है कि जब राजा दक्ष ने चंद्रमा को श्राप दिया था तब चंद्रमा ने इसी जगह पर शिवजी की कठिन तपस्या की थी। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर चंद्रमा को श्राप से मुक्ति दी थी जिसके बाद यहां मंदिर की स्थापना हुई। 

 

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1000 साल पुराना संघर्ष

इस मंदिर की भव्यता को देखकर विदेशी हमलावरों ने इसे 17 बार लूटा और करीब 7 बार नष्ट करने की कोशिश की। सबसे बड़ा हमला 1026 में महमूद गजनवी ने किया था जिसे आज ठीक 1000 साल पूरे हो रहे हैं। अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब ने भी मंदिर को नुकसान पहुंचाया लेकिन हर बार भक्तों ने इसे फिर से बनवाया।

 

आजादी के बाद जब सरदार वल्लभभाई पटेल जूनागढ़ आए तो उन्होंने मंदिर की जर्जर हालत देखकर इसे दोबारा बनाने का निर्णय लिया। महात्मा गांधी के कहने पर मंदिर के लिए सरकारी पैसा इस्तेमाल नहीं हुआ बल्कि जनता ने इसके लिए दान दिया। सरदार पटेल के प्रयासों से ही 11 मई 1951 को नया मंदिर बनकर तैयार हुआ। आज का आयोजन उसी ऐतिहासिक दिन की याद में रखा गया है।


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