देश में कहीं पर भी कोई आपदा आए तो लोगों की मदद और रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए एक अलग संस्था बनाई गई है। नाम है नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स। कहीं भगदड़ हो, ट्रेन या हवाई जहाज हादसे का शिकार हो या फिर वायनाड जैसी लैंडस्लाइड आए, इसी NDRF को मदद के लिए बुलाया जाता है। इसमें काम करने वाले लोग ऐसे हादसों के लिए प्रशिक्षित होते हैं। हाल ही में जब उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में एक युवक की कार पानी में डूब रही थी और वह मदद के लिए पुकार रहा था तब भी इसी NDRF को मदद के लिए बुलाया गया था। हालांकि, NDRF की टीम को गाजियाबाद से घटनास्थल तक पहुंचने में देरी हो गई और युवक युवराज मेहता की जान नहीं बच सकी।

 

अब ऐसे में NDRF के काम करने के तरीके, उसकी क्षमता और उसके कामकाज को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। इस हादसे में स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स (SDRF) की टीम भी मौके पर पहुंची थी लेकिन वह भी कुछ नहीं कर पाई और युवराज डूब गए। NDRF के साथ-साथ SDRF भी सवालों के घेरे में है। ऐसे में हम आपको यह बता रहे हैं कि इन संस्थाओं पर सवाल कितने रुपये खर्च करती है और ये काम कैसे करते हैं।

क्या है NDRF?

 

पहले 1999 में ओडिशा में आए चक्रवात, 2001 में आए गुजरात भूकंप और फिर 2004 में आई सुनामी के चलते एक ऐसी संस्था की जरूरत महसूस की गई जो ऐसे हादसों में मदद कर सके। ऐसे में 26 दिसंबर 2005 को डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट लागू हुआ और नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) की स्थापना हुई। इसी डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट के तहत NDRF की स्थापना की गई। शुरुआत में 6 बटालियन थीं और अब 16 बटालियन हैं। हर बटालियन में 1149 जवान हैं यानी कुल 18 हजार से ज्यादा जवान। 

 

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तब से लेकर तमाम प्राकृतिक आपदाओं, सड़क और रेल दुर्घटनाओं और अग्निकांड तक में NDRF की मदद ली जाती रही है। NDRF की एक बटालियन में 18 सर्च और रेस्क्यू टीम होती हैं और हर टीम में 47 जवान लोग होते हैं। कुल 16 ही बटालियन होने के चलते कुछ राज्य ऐसे भी जहां एक भी बटालियन नहीं है। 

कितने पैसे खर्च होते हैं?

 

NDRF और SDRF केंद्रीय गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन डिवीजन के तहत काम करते हैं। हालांकि, नेशनल पॉलिसी ऑन डिजास्टर मैनेजमेंट (NPDM) के मुताबिक, इस फंड को खर्च करने का काम राज्य सरकारों का होता है। आपदा आने की स्थिति में राज्य सरकार स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फंड (SDRF) में रखे पैसों का इस्तेमाल करती है। इसके लिए पहले से तय नियमों का ध्यान रखना होता है। केंद्र सरकार भी आपदा की स्थिति में अपनी ओर से मदद करती है। इसके लिए इंटर मिनिस्ट्रियल सेंट्रल टीम (IMCT) प्रभावित क्षेत्र का दौरा करके नुकसान का आकलन करती है, उसके बाद केंद्रीय फंड से पैसा जारी किया जाता है। यहां यह जानना जरूरी है कि ये पैसे तभी खर्च होते हैं जब आपदा आती है।

 

मार्च 2025 में सांसद सेल्वाराज और सुब्बारायन के एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बताया था कि साल 2024-24 में 12 मार्च 2025 तक SDRF के लिए खुल 26742 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 20,550 करोड़ और राज्यों की हिस्सेदारी 6291 करोड़ रुपये थी। 12 मार्च 2025 तक इसमें से 18322 करोड़ रुपये SDRF से और 4371 करोड़ रुपये NDRF से खर्च किए गए। यानी एक साल में तकरीबन 22 हजार करोड़ से ज्यादा रुपये आपदा प्रबंधन के लिए जारी किए गए।

 

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गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन डिवीजन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 15वें वित्त आयोग ने स्टेट डिजास्टर रिस्क मैनेजमेंट फंड (SDRMF) के लिए 1,60,153 करोड़ रुपये साल 2021 से 2026 तक के लिए जारी करने का प्रस्ताव रखा। इसमें से 80 प्रतिशत यानी 1,28,122 करोड़ रुपये स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फंड के लिए और 20 पर्सेंट यानी 13,693 करोड़ रुपये नेशनल डिजास्टर मिटिगेशन फंड के लिए रखे गए।

कहां से आता है पैसा?

 

डिजास्टर मैंनेजमेंट ऐक्ट, 2005 की धारा 48 (1) के तहत केंद्र सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SDRF के फंड का 75 प्रतिशत देती है। वहीं, स्पेशल कैटगरी के राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों जैसे कि सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के लिए 90 प्रतिशत पैसे देती है। ये पैसे वित्त आयोग की सिफारिश पर दो किस्तों में जारी किए जाते हैं। 

 

यह पैसा चक्रवात, सूखा, भूकंप, अग्निकांड, बाढ़, सुनामी, ओले, भूस्खलन, बादल फटने, कीड़ों के हमले, हिमस्खलन, हिमपात और कोल्डवेव की स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर हुई घटनाओं के लिए राज्य सरकार SDRF में उपलब्ध बजट का 10 प्रतिशत खर्च कर सकती है।