भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक वकील की फाइल की गई कई पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PILs) पर कड़ी नाराजगी जताई और उन्हें खारिज कर दिया। वकील ने प्याज और लहसुन पर स्टडी की मांग करते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अलग-अलग मामलों में चार और PILs भी फाइल की थीं। अदालत ने कहा कि पिटीशन को खराब तरीके से तैयार किया गया, साफ नहीं और इनमें कोई ठोस कानूनी आधार नहीं था। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी पिटीशन कोर्ट का समय बर्बाद करती हैं।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने पिटीशनर के वकील सचिन गुप्ता को फटकार लगाई। बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने पूछा, 'क्या आप आधी रात को उठकर ये पिटीशन लिखते हैं?' कोर्ट ने वकील को चेतावनी भी दी कि वह भविष्य में ऐसी फालतू पिटीशन फाइल न करें।
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क्या है पूरा मामला?
एक पिटीशन में प्याज और लहसुन में तामसिक या नेगेटिव एलिमेंट्स का पता लगाने के लिए साइंटिफिक स्टडी की मांग की गई थी। पिटीशन में जैन समुदाय के खाने के तरीकों का भी जिक्र किया गया था। जिसमें प्याज, लहसुन और जड़ वाली सब्जियां नहीं खाई जाती है। इस पर अदालत ने सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी याचिका दाखिल कर जैन समुदाय की भावनाओं को आहत करने की जरूरत क्यों है। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के मुद्दों को अदालत में लाने से पहले गंभीर कानूनी आधार होना चाहिए।
अदालत ने PIL को बताया बेबुनियाद
सुनवाई के दौरान वकील ने यह भी दावा किया कि गुजरात में प्याज के कारण एक तलाक का मामला सामने आया था। हालांकि, अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में कोई गंभीर कानूनी प्रश्न नहीं उठाया गया है और उनकी भाषा भी बेहद कमजोर है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह की बेबुनियाद याचिकाएं दाखिल की गईं तो सख्त कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता खुद वकील नहीं होते तो उन पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता था।
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दूसरे PILs भी खारिज
दरअसल वकील ने कई पिटीशन दायर किए थे और इन सभी PILs को खारिज कर दिया गया। इन याचिकाओं में से एक में शराब और तंबाकू उत्पादों में मौजूद कथित हानिकारक तत्वों को लेकर सख्त नियम बनाने की मांग की गई थी। इस पर अदालत ने कहा कि कानून के तहत इन उत्पादों पर पहले से ही स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी लिखना अनिवार्य है। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि लोग चेतावनी पढ़ने के बावजूद इनका सेवन करते हैं तो इसमें अदालत क्या कर सकती है। जब वकील ने कहा कि यदि यह हानिकारक हैं तो इनकी बिक्री क्यों होने दी जाती है। तो अदालत ने हल्के अंदाज में पूछा कि क्या अब शराब की बोतल के साथ डॉक्टर की पर्ची भी देनी पड़ेगी।
