प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को राज्यसभा में अपने संबोधन के दौरान एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी। अगर वैश्विक स्तर पर चल रहे युद्ध लंबे समय तक खिंचते हैं, तो दुनिया के साथ-साथ भारत को भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। यह बयान केवल एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत है।
आज के समय में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते; वे ऊर्जा बाजार, खाद्य आपूर्ति, वैश्विक व्यापार, मुद्रा बाजार और सामाजिक स्थिरता तक गहरा प्रभाव डालते हैं। ईरान-इजरायल युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एक क्षेत्रीय संघर्ष भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर सकता है। भारत, जो एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और वैश्विक सप्लाई चेन से गहराई से जुड़ा है, ऐसे हालात में सबसे अधिक संवेदनशील देशों में से एक बन जाता है।
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ऐसे में प्रधानमंत्री का यह बयान दरअसल एक चेतावनी है कि आने वाला समय केवल अवसरों का नहीं, बल्कि कठिन परीक्षाओं का भी हो सकता है। इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि अगर यह संकट बना रहता है तो आने वाले समय में किन-किन संकटों या चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है?
1. ऊर्जा संकट
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। एलपीजी सिलिंडर और डीजल-पेट्रोल की कीमतें इसका उदाहरण हैं। अगर युद्ध के कारण तेल उत्पादक क्षेत्रों खासकर पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ती है, तो कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इससे पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि बिजली उत्पादन और ट्रांसपोर्टेशन की लागत भी बढ़ेगी।
2. महंगाई बढ़ेगी
ऊर्जा या डीजल-पेट्रोल महंगा होता है तो हर चीज महंगी हो जाती है। ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, उत्पादन महंगा और अंततः उपभोक्ता वस्तुएं महंगी। इससे ‘cost-push inflation’ पैदा होता है। गरीब और मध्यम वर्ग की खरीदने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे खपत कम होती है और आर्थिक विकास धीमा पड़ता है।
3. सप्लाई चेन का टूटना
आधुनिक अर्थव्यवस्था 'ग्लोबल सप्लाई चेन' पर टिकी है। COVID-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि कैसे एक क्षेत्रीय संकट पूरी दुनिया में उत्पादन और वितरण को प्रभावित कर सकता है। चिप्स, दवाइयां, उर्वरक सबकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
4. खाद्य सुरक्षा का खतरा
मिडिल ईस्ट के देशों से बड़ी मात्रा में सल्फर का आयात किया जाता है जो कि उर्वरक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो उर्वरकों की कमी होगी जिससे उत्पादन घटेगा और आने वाले समय में खाद्य संकट देखने को मिल सकता है।
5. निर्यात पर असर
वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर होती है तो मांग घटती है। इसका सीधा असर भारत के निर्यात पर पड़ेगा। आईटी, टेक्सटाइल, ऑटो कंपोनेंट्स जैसे सेक्टर इस वजह से प्रभावित होते हैं। इससे विदेशी मुद्रा कम आती है और व्यापार घाटा बढ़ सकता है।
6. रुपया कमजोर होगा
जब वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है, तो इन्वेस्टर सुरक्षित बाजारों की ओर भागते हैं। इससे भारत जैसे उभरते बाजारों से पूंजी निकलने लगती है और रुपया कमजोर होता है। कमजोर रुपया आयात को और महंगा बना देता है, जिससे महंगाई और बढ़ती है।
7. रक्षा खर्च में बढ़ोतरी
लंबे युद्ध का माहौल देशों को अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए मजबूर करता है। भारत को भी अपनी सीमाओं और सैन्य क्षमता पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है। इससे सरकारी बजट पर दबाव बढ़ेगा और विकास परियोजनाओं के लिए संसाधन कम हो सकते हैं।
8. कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
भारत की विदेश नीति 'strategic autonomy' पर आधारित रही है। लेकिन जब वैश्विक शक्तियां आमने-सामने होती हैं, जैसे NATO और रूस, तो संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है। ऐसे में हर निर्णय का आर्थिक और राजनीतिक असर होता है। जाहिर है ईरान-इजरायल-अमेरिका के युद्ध में भी भारत के सामने इस तरह की चुनौतियां पेश आएंगी।
9. बेरोजगारी बढ़ने का डर
जब निवेश घटता है और व्यापार धीमा पड़ता है, तो रोजगार के अवसर भी कम होते हैं। स्टार्टअप, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर पर दबाव बढ़ता है। इससे बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है।
10. कानून-व्यवस्था की समस्या
महंगाई, बेरोजगारी और अनिश्चितता का माहौल बढ़ता है तो समाज में असंतोष की स्थिति पैदा होती है। ऐसे में सरकार के लिए इकॉनमी को मजबूत बनाए रखने के साथ-साथ सामाजिक स्थिरता भी बनाए रखना एक चुनौती होती है।
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ऐसे में पीएम मोदी ने सांकेतिक तौर पर यह बताने की कोशिश की है कि अगर युद्ध नहीं रुकता है तो किन-किन तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है?
