भारत में नरेंद्र मोदी सरकार से पहले, दिव्यांगों के लिए विकलांग शब्द का इस्तेमाल होता था। यह अवस्था, मानसिक या शारीरिक हो सकती है। 27 दिसंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 15वें एपिसोड के दौरान 'विकलांग' शब्द की जगह 'दिव्यांग' शब्द का इस्तेमाल करने की अपील की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से कई बार, दिव्यांग बच्चों की शिक्षा पर जोर दिया है। उनका मानना है कि  दिव्यांगों को सहानुभूति की नहीं, बल्कि समान अवसर और सही संसाधनों को मुहैया कराने की जरूरत है, जिससे वे अपनी प्रतिभा साबित कर सकें। लेकिन क्या ऐसा है?

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट 'स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया' में जो आंकड़े दिए हैं, उनके हिसाब से अभी दिव्यांग बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा में व्यापक सुधार की गुंजाइश है। देश में हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहां दिव्यांग बच्चों के लिए अलग से सीढ़ियों की जगह रैंप की सुविधा तक नहीं है। उनके लिए विशेष टॉयलेट नहीं है, जिससे स्कूल में होनी वाली असुविधाओं से वे बच सकें। यह स्थिति तब है, जब देश में 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' लागू है। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में समावेशी शिक्षा पर जोर दिया गया है, स्कूलों और कॉलेजों को दिव्यांग अनुकूल बनाने के लिए कड़े निर्देश दिए गए हैं। पीएम मोदी ने दिसंबर 2015 में 'सुगम्य भारत अभियान' की शुरुआत भी इसी सिलसिले में की थी। केंद्र का साफ निर्देश है कि स्कूलों और यूनिवर्सिटी बिल्डिंग्स में रैंप, विशेष शौचालय और ब्रेल संकेतकों की व्यवस्था हो, जिससे दिव्यांग छात्रों को परेशानी न हो।

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दिव्यांगों के स्कूलों का हाल क्या है? 

देश के स्कूलों में दिव्यांग या चिल्ड्रेन विद स्पेशल नीड्स (CwSN) बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएं अभी भी बेहद कमजोर हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024-25 में सिर्फ 33.4 फीसदी स्कूलों में ही दिव्यांग बच्चों के लिए 'विशेष टॉयलेट' (CwSN-friendly toilets) उपलब्ध हैं। करीब 66.6 फीसदी स्कूलों में यह सुविधा अभी भी नहीं है।

देश के ज्यादातर राज्यों में दिव्यांग बच्चों के लिए अलग शौचालय की स्थिति अभी भी काफी खराब है। 32 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में 70 फीसदी से भी कम स्कूलों में इन बच्चों के लिए शौचालय उपलब्ध हैं। इनमें से 7 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश तो 10% से भी नीचे हैं, जबकि 6 में 10-20 फीसदी के बीच है।

इन जगहों पर दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय लगभग न के बराबर हैं। कुछ राज्यों में 20-30 फीसदी और 30-40 फीसदी के बीच कवरेज है। सिर्फ 4 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश ही 60 फीसदी से ऊपर पहुंच पाए हैं। हालांकि कुछ राज्यों में सुधार हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय औसत अभी भी बहुत कम है और बड़े-बड़े क्षेत्रीय अंतर बने हुए हैं।

राज्यों के हाल, आंकड़ों से समझिए-

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किन राज्यों में बेहतर हैं हालात?

दिल्ली के 99.2 फीसदी स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए रैंप बने हुए हैं। दादरा और नगर हवेली-दमन और दीव के 98.4 फीसदी स्कूल, लक्षद्वीप के 97.2 फीसदी स्कूल, ओडिशा के 95.3 फीसदी स्कूल और चंडीगढ़ के 95.2 फीसदी स्कूलों में रैंप की सुविधा है। महाराष्ट्र में 94.0 फीसदी, मध्य प्रदेश में 93.1 फीसदी, तमिलनाडु में 92.7 फीसदी स्कूल बेहतर स्थिति में हैं।

किन राज्यों में खराब हालात हैं?

अरुणाचल प्रदेश में सिर्फ 28.2 फीसदी स्कूल में रैंप है। मेघालय में 32.8 स्कूल, नागालैंड में 42.1%, मणिपुर में 42.6%, मिजोरम में 44.4% और सिक्किम में 44.5% स्कूलों में रैंप की स्थिति ठीक है। जम्मू-कश्मीर में 45.4%,  त्रिपुरा में 63.6%, गोवा में 65.3% और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में 66.2% स्कूल ऐसे हैं।  इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दिव्यांग बच्चों के लिए बुनियादी पहुंच अभी भी बहुत कमजोर है।

सिक्किम में पहले 7.5 फीसदी स्कूल दिव्यांगों के लिए बेहतर थे, अब बढ़कर,  44.5 फीसदी हुए हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में 22.0% से बढ़कर 66.2% स्कूलों में रैंप बना है। आंध्र प्रदेश में 32.5% से 88.8%  और तेलंगाना 28.3% से 76.7% प्रतिशत सुधार दिखा है। उत्तर प्रदेश में मामूली गिरावट दर्ज की गई है, पहले 73.1% स्कूलों में बेहतर स्थिति थी, अब 71.2 प्रतिशत है।

उम्मीद क्या है?

यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE) 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि साल 2018-19 में जहां सिर्फ 16.64 फीसदी स्कूलों में ऐसे टॉयलेट थे, वहां 2024-25 तक यह आंकड़ा बढ़कर 33.4 फीसदी हो गया है। 6 साल में दोगुना से भी ज्यादा सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी दो-तिहाई स्कूल इस बुनियादी सुविधा से वंचित हैं।

कई राज्यों में स्थिति और खराब

32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 70 फीसदी से कम स्कूलों में दिव्यांगजनों के अनुकूल टॉयलेट हैं। 7 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में तो 10 फीसदी से भी कम स्कूलों में यह सुविधा है। 6 राज्यों में तो ऐसे टॉयलेट 10 से 20 फीसदी के बीच हैं। 

दिल्ली, दादरा नगर हवेली, दमन-दीव, लक्षद्वीप और ओडिशा जैसे कुछ राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, जहां कवरेज 95 फीसदी से ऊपर है। अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर जैसे कई पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्य अभी भी बहुत पीछे हैं।

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कहां बेहतर हालात हैं?

दिव्यांग बच्चों के लिए रैंप की उपलब्धता है तो लेकिन सुधार की जरूरत है। साल 2014-15 में 59.77  फीसदी स्कूलों में रैंप थे, जो 2024-25 में बढ़कर 79.1 प्रतिशत हो गए हैं। दिल्ली के स्कूलों में रैंप की सुविधा करीब 99.2 प्रतिशत तक है, दादरा-नगर हवेली में 98.4 प्रतिशत तक है। लक्षद्वीप में 97.2 फीसदी तक। इन इलाकों में करीब सभी स्कूलों में रैंप मौजूद हैं। कई राज्यों में रैंप की गुणवत्ता, हैंड्रेल और स्लिप-प्रूफ सतह जैसी जरूरी बातों पर अभी काम की जरूरत है।

रिपोर्ट क्या कहती है?

नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि समग्र शिक्षा अभियान के तहत दिव्यांग बच्चों के लिए इंडिविजुअल एजुकेशन प्लान (IEP), स्पेशल एजुकेटर, असिस्टिव डिवाइस और टीचर ट्रेनिंग जैसी व्यवस्थाएं की जा रही हैं। स्कूलों में फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी बड़ी बाधा है। रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि बिना बुनियादी सुविधाओं के दिव्यांग बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा में शामिल करना मुश्किल है, जो NEP 2020 के लिए बाधा बन रहा है।