सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अगर डीएनए टेस्ट से साफ हो जाए कि कोई आदमी किसी बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे बच्चे के लिए मेंटेनेंस (भरण-पोषण) नहीं देना पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि साइंटिफिक सबूत कानूनी धारणाओं से ऊपर हैं। डीएनए रिपोर्ट में अगर साबित हो कि पिता बच्चे का जैविक पिता नहीं है तो अदालतें इसे नजरअंदाज नहीं कर सकतीं।
21 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापाम कोटिस्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाया। एक महिला ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील की थी। हाई कोर्ट ने डीएनए टेस्ट के आधार पर बच्चे के लिए मेंटेनेंस देने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने महिला की अपील खारिज कर दी।
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कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा, 'जब कानून के तहत तय सबूत और दुनिया भर में स्वीकार की गई साइंटिफिक सच्चाई के बीच टकराव हो, तो साइंटिफिक सबूत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।' बेंच ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सेक्शन 112 इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 उस समय बना था जब डीएनए टेस्ट जैसी आधुनिक तकनीक नहीं थी। यह धारा बच्चे को सामाजिक कलंक से बचाती है लेकिन जब डीएनए रिपोर्ट अंतिम और बिना विवाद के हो तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या है मामला?
दोनों पक्षों ने 2016 में शादी की थी। उसी साल उनका एक बच्चा हुआ था। कुछ समय बाद दोनों के बीच रिश्ते खराब हो गए। महिला ने प्रोटेक्शन ऑफ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 के तहत केस किया। उसने खुद और बच्चे के लिए हर महीने 25,000 रुपये मेंटेनेंस और स्त्रीधन की मांग की।
पति ने घरेलू हिंसा के आरोपों से इनकार किया और कहा कि वह उनका बच्चा नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने डीएनए टेस्ट कराने की इजाजत दी। 8 मई 2017 को आई डीएनए रिपोर्ट में साफ हो गया कि पति बच्चे के जैविक पिता नहीं हैं। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के लिए अंतरिम मेंटेनेंस देने से मना कर दिया। इसके अलावा महिला पर आय छिपाने का भी आरोप लगा।
महिला ने अपीलेट कोर्ट में अपील की लेकिन अपीलेट कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना। फिर मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने सेक्शन 112 के तहत कानून पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे को वैध माना जाता है लेकिन जब कन्क्लूसिव एविडेंस या कोई अंतिम रूप से ऐसा सबूत (डीएनए रिपोर्ट) हो, तो यह बच्चे को उस शख्स का नहीं माना जा सकता। इसलिए बच्चे के लिए मेंटेनेंस नहीं मिलेगा। हालांकि महिला के खुद के मेंटेनेंस पर फिर से विचार करने को कहा गया।
HC के फैसले को सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने माना कि जब डीएनए टेस्ट दोनों पक्षों द्वारा स्वीकार हो चुका हो और उसकी रिपोर्ट अंतिम हो गई हो तो अदालतें इसे अनदेखा नहीं कर सकतीं। पहले के कई फैसलों में डीएनए टेस्ट कराने से बचा जाता था क्योंकि इससे बच्चे और मां पर सामाजिक रूप से विपरीत प्रभाव पड़ने की संभावना होती थी लेकिन इस मामले में टेस्ट हो चुका था और उसको लेकर कोई विवाद नहीं था।
कोर्ट ने बच्चे को लेकर भी चिंता जताई। फैसले में कहा गया कि पति से मेंटेनेंस न मिलने के बावजूद बच्चे को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया कि एक सीनियर अधिकारी बच्चे के घर जाकर उसकी स्थिति देखें। शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और रहने की न्यूनतम सुविधाओं का जायजा लें अगर कोई कमी पाई गई तो तुरंत सुधारात्मक कदम उठाएं।
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मां का मेंटेनेंस अभी तय नहीं
महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने महिला के खुद के मेंटेनेंस वाले मामले में हाई कोर्ट के आदेश में दखल नहीं दिया। ट्रायल कोर्ट अब इस पर नए सिरे से कानून के अनुसार फैसला करेगा।
