सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जाति जनगणना को रोकने की मांग वाली एक याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने याचिका में इस्तेमाल की गई अश्लील और बदतमीजी भरी भाषा पर भी बहुत नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता को सख्ती से टोका।

 

याचिकाकर्ता खुद अदालत में मौजूद थे। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उनसे कहा, 'आपने अपनी याचिका में बदतमीजी की भाषा लिखी है। आपने यह याचिका किससे लिखवाई है?' उन्होंने आगे पूछा, 'आप ऐसी भाषा याचिका में कहां से लिखते हैं?' बेंच में जस्टिस जोयमलया बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल थे।

 

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याचिका में क्या था?

याचिका में केंद्र सरकार से आगामी जाति जनगणना तुरंत रोकने की मांग की गई थी। साथ ही सरकार को निर्देश देने की गुजारिश की गई थी कि एक बच्चे वाले परिवारों को आर्थिक मदद और प्रोत्साहन देने वाली नीतियां बनाई जाएं।


हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि याचिका में कोई दम नहीं था और उसे पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना था कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर अभी कोई दखल देने की जरूरत नहीं है।

पहले भी पड़ चुकी है याचिका

बताते चलें कि जाति जनगणना को लेकर यह पहली याचिका नहीं थी। 2 फरवरी 2026 को भी सुप्रीम कोर्ट ने एक इसी तरह की याचिका खारिज कर दी थी। उस याचिका में आगामी जनगणना में जाति डेटा को रिकॉर्ड करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे।

 

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2027 की जनगणना होगी खास

देश में 2027 में 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होनी है। यह 1931 के बाद पहली बार होगा जब जनगणना में विस्तृत जाति डेटा शामिल किया जाएगा। इस बार पूरी जनगणना डिजिटल तरीके से की जाएगी, जो इसे और भी खास बनाएगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि फिलहाल जाति जनगणना पर कोई रोक नहीं लगेगी और सरकार इसे अपने तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ा सकती है।