पश्चिम बंगाल में इन दिनों अंडो की बहुत ज्यादा चर्चा हो रही है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से सत्ता से बेदखल हुई टीएमसी पार्टी के नेताओं पर अंडे फेंककर मारे जा रहे हैं। अंडे राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए स्कूलों में मिलने वाले मिड-डे मील से अंडे को गायब कर दिया। यानी अब पश्चिम बंगाल के स्कूलों में दिन के समय मिड-डे मील में बच्चों को अंडे नहीं दिए जाएंगे। अंडे प्रोटीन का एक अच्छे सोर्स हैं और सरकार के इस फैसले के बाद से मिड-डे मील में अंडे दिए जाने चाहिए या नहीं, इस पर बहस शुरू हो गई है। 

 

 बंगाल की शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने मिड-डे मील का जिम्मा इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) को दे दिया है और इस्कॉन ने मेन्यू से अंडा हटाकर पूरा मेन्यू वेजिटेरियन कर दिया है। पश्चिम बंगाल में नॉन वेज खाने का एक अहम हिस्सा है और बताया जा रहा है कि मिड-डे मील से अंडा हटाने से बंगाली समुदाय नाराज भी हो सकता है। 

 

यह भी पढ़ें: 13 राज्यों में बारिश का अलर्ट, मॉनसून की रफ्तार धीमी, दिल्ली, UP तक कब पहुंचेगा?

प्रोटीन के सोर्स पर छिड़ी बहस

सरकार के इस फैसले पर राजनीति तो हो ही रही है लेकिन बच्चों के लिए प्रोटीन का सोर्स क्या होगा इसको लेकर भी राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हो गई है। इस मुद्दे को केवल खान-पान की पसंद या सांस्कृतिक बहस के दायरे में नहीं, बल्कि बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और उनके भविष्य के संदर्भ में देखा जा रहा है। 

 

अंडा प्रोटीन का सबसे सस्ता, सुलभ और उच्च गुणवत्ता वाला स्रोत माना जाता है। भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी आज भी कुपोषण और प्रोटीन की कमी से जूझ रही है, वहां अंडे बच्चों के लिए प्रोटीन के अच्छे सोर्स का काम करते हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं। ऐसे में उन बच्चों के लिए पोषक तत्वों से भरा खाना और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है। 

 

क्या बोले एक्सपर्ट?

बहुत से लोगों का यह मानना है कि मिड-डे मील में प्रोटीन के स्रोत के रूप में अंडे का विकल्प दाल, पनीर, टोफू, सोयाबीन इत्यादि हो सकते हैं। इस मुद्दे पर दिल्ली के गंगाराम अस्पताल की आहार विशेषज्ञ ने बताया कि अंडे बच्चों के लिए क्यों जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि अंडे को किसी भी चीज से नहीं बदला जा सकता है। पनीर, दूध या किसी अन्य चीज से इसे नहीं बदला जा सकता है। अंडे बच्चों के शरीर और दिमाग के लिए काफी अहम माना जाता है। 

 

उन्होंने बताया कि अगर अंडे को आप पनीर या किसी दूसरी चीज से बदलते हैं तो आपको उसके बराबर प्रोटीन देना होगा। इतना बच्चा खा भी नहीं पाता है और आर्थिक रूप से भी इसका असर पड़ता है। उन्होंने कहा, 'यदि स्कूलों में बच्चों को सप्ताह में एक या दो बार अंडा दिया जाता है, तो उसकी जगह समान मात्रा में प्रोटीन देने के लिए अन्य खाद्य पदार्थों की काफी अधिक मात्रा देनी होगी, जिसे सभी बच्चे पर्याप्त मात्रा में खा भी नहीं पाएंगे।'

 

यह भी पढ़ें: भगीरथ चौधरी ने अपने ही मंत्रालय से ली 99 लाख रुपये की सब्सिडी? अब हंगामे के आसार

मिड-डे मील में अंडे क्यों जरूरी?

भारत के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील योजना चलाने का एक अहम मकसद यह था कि जिन गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को घर पर पोष्टिक आहार नहीं मिल पाता है उन्हें कम से कम दिन में एक बार बढ़िया पोष्टिक खाना दिया जाए, जिससे बच्चों का विकास हो। प्रोटीन की बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत होती है। अंडा प्रोटीन का एक अच्छा सोर्स है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि मिड-डे मील से अंडा हटाना बच्चों के विकास के लिए हानिकारक हो सकता है क्योंकि कई बच्चे ऐसे हैं जो घर पर इस तरह का पोष्टिक आहार नहीं ले सकते हैं।