दुनिया सैन्य तौर पर ईरान को बहुत एडवांस नहीं मानती थी। मगर 15 दिन के युद्ध ने यह भ्रम तोड़ दिया है। इजरायल से ओमान तक ईरानी मिसाइल और ड्रोन ने न केवल खाड़ी देशों बल्कि अमेरिका को भी परेशान कर रखा है। सऊदी अरब से इराक तक उसके दूतावास और ठिकानों पर ईरान की सेना ड्रोन बरसा रही है। कई एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो चुके हैं।
दुबई, अबूधाबी, मनामा के अलावा कुवैत और कतर में ईरानी ड्रोनों से मची तबाही को सभी ने देखा है। हालत इस कदम तक बिगड़ चुके हैं कि खाड़ी देशों के पास मिसाइल और ड्रोन इंटरसेप्टरों की भारी कमी है। अपने सहयोगी अमेरिका से मांग की है। मगर वह भी इनकी पूर्ति करने में असमर्थ है।
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ईरान की रणनीति: अमेरिका और इजरायल जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ ईरान ने सस्ते ड्रोन वाली रणनीति अपनाई। वह अपने पड़ोसी खाड़ी देशों पर इन ड्रोन से लगातार हमला कर रहा है। डर और दहशत के माहौल के इतर आर्थिक चोट भी दे रहा है। तेल ठिकानों पर हमले और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नाकाबंदी के बाद खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है। दुबई जैसे दुनिया के सबसे अहम आर्थिक केंद्र की इमेज को ईरान ने सिर्फ हजार डॉलर के ड्रोन से बदल कर रख दिया।
अनुमान के मुताबिक ईरान के एक शाहेद-136 ड्रोन की कीमत 20,000 से 50,000 डॉलर है। अमेरिका एक ड्रोन को मारने में पैट्रियट एयर डिफेंस जैसा डिफेंस सिस्टम इस्तेमाल करता है। इसकी एक मिसाइल की कीमत ही 30 लाख डॉलर (27.6 करोड़ रुपये) से अधिक है, जबकि शाहेद-136 ड्रोन भारतीय रुपये में सिर्फ 41.5 लाख रुपये का है।
ईरान एक साथ इन सस्ते ड्रोन को बड़ी संख्या में दाग सकता है। मगर पैट्रियट एयर डिफेंस इतनी बड़ी संख्या में इन्हें रोक नहीं सकता है। अगर हर ड्रोन पर 27 करोड़ की मिसाइल दागी गई तो यह आर्थिक तौर पर भी बहुत महंगा है। वहीं पैट्रियट जैसी मिसाइलों का उत्पादन करना बेहद जटिल और समय लगने वाली प्रक्रिया है। अगर युद्ध अधिक तीनों तक चला तो मिसाइलों की कमी आ सकती है। बाद में ईरान इन्हीं सस्ते ड्रोनों से और तबाही मचा सकती है। अब सवाल यह है कि इसका विकल्प क्या है?
सस्ते ड्रोन का इलाज क्या: दुनियाभर को लेजर के रूप में सस्ते ड्रोन का विकल्प दिख रहा है। मिसाइल की तुलना में इसका खर्च बेहद कम होगा। अगर एक ड्रोन को मिसाइल से मार गिराया गया तो उसकी लागत 27.6 करोड़ रुपये होगी। वहीं लेजर से यही ड्रोन महज 3.50 डॉलर यानी 325 रुपये में गिराया जा सकता है। यही कारण है कि दुनियाभर के देश लेजर तकनीक पर निवेश करने में जुटे हैं। अगर डोनाल्ड ट्रंप की माने तों अमेरिका भी जल्द अपना लेजर हथियार उतारने वाला है। दशकों से कई देश लेजर तकनीक को विकसित करने में जुटे हैं। मगर इसके रास्ते में अभी तक कई बाधाए हैं।
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लेजर हथियार के साथ समस्या क्या?
बचपन में आपने कभी न कभी आवर्धक लेंस का इस्तेमाल कागज को जलाने में किया होगा। लेजर हथियार भी इसी तरह से काम करता है। वह प्रकाश की एक बेहद शक्तिशाली किरण को एक जगह फोकस करके ड्रोन को निष्क्रिय कर देता है। सबसे जरूरी यह है कि प्रकाश की किरण का कई सेकंड तक लक्ष्य पर एक ही जगह में टिका होना जरूरी है।
अगर आसमान साफ नहीं है। बादल छाए हुए हैं तो एक ड्रोन को मार गिराने में लेजर को अधिक समय लग सकता है। कोहरा और मौसम में अधिक नमी होने पर भी यही समस्या का सामना करना पड़ेगा। धूल भरी आंधी से भी नुकसान पहुंच सकता है।
दुनिया के कुछ चुनिंदा लेजर हथियार
- इजराइल: राफेल एडवांस्ड डिफेंस - आयरन बीम
- ऑस्ट्रेलिया: इलेक्ट्रो ऑप्टिक सिस्टम्स- हाई एनर्जी लेजर वेपन।
- यूक्रेन: सनरे कॉम्पैक्ट लेजर सिस्टम।
- चीन: LY-1 सिस्टम।
- भारत: सहस्त्र शक्ति- 30 किलो वाट।
भारत क्या सीख सकता है?
सस्ते ड्रोन दुनिया की हर बड़ी जंग में सबसे अहम भूमिका निभाएंगे। ड्रोन को रोकना मिसाइलों से ज्यादा जटिल होगा। छोटे ड्रोन बड़ी तबाही मचा सकते हैं। यह हम यूक्रेन और अब ईरान युद्ध में देख चुके हैं। भारत को न केवल सस्ते ड्रोन बनाने होंगे, बल्कि इन ड्रोन से कैसे निपटा जाए, इस पर भी फोकस करना होगा। सस्ते ड्रोन से हम दुश्मन को बड़ी चोट पहुंचा सकते हैं, लेकिन अगर दुश्मन भी ऐसे ही ड्रोन इस्तेमाल करने लगे तो उनसे निपटने की तकनीक भी हमारे पास होनी चाहिए।
