भारत में आज सेना दिवस मनाया जा रहा है। इसे मनाने की वजह है कि इसी दिन भारत की थल सेना यानी इंडियन आर्मी की कमान भारत के हाथों में आई थी। रोचक बात यह है कि तारीख 15 जनवरी 1949 थी। भारत को आजादी मिली थी 15 अगस्त 1947 और सेना दिवस 1949 में मनाया गया। इसके पीछे रोचक कहानी है। रोचक इसलिए क्योंकि अगस्त 1947 से जनवरी 1949 के बीच भारत और पाकिस्तान का युद्ध भी हो गया। उस वक्त आर्मी जरूर भारत की थी लेकिन यह पूरी तरह से 'भारतीय नहीं थी।' इसी दिन के एम करियप्पा ने आखिरी ब्रिटिश कमांडर इन चीफ जनरल फ्रांसिस रॉबर्ट बुचर यानी रॉय बुचर से इंडियन आर्मी की कमान ली थी और आजाद भारत के पहले आर्मी चीफ बने थे।

 

15 अगस्त को जब देश को आजादी मिली तब तक सेना का मामला क्लियर नहीं हुआ था। ऐसे में ब्रिटिश सरकार की ओर से रॉबर्ट लोकहार्ट को इंडियन आर्मी का कमांडर इन चीफ बनाया गया। 31 दिसंबर 1947 को रॉय बुचर को इंडियन आर्मी की कमान मिली। बाद में इस पद का नाम चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ्स और कमांडर इन चीफ हो गया। 1 जनवरी 1948 को कमान संभालने वाले रॉय बुचर 14 जनवरी 1949 तक इस पद पर रहे और उन्होंने ही के एम करियप्पा को आर्मी की कमान सौंपी।

कैसे बंटी ब्रिटिश आर्मी?

 

जब यह तय हुआ कि भारत की आजादी के साथ ही बंटवारा होगा तो संसाधनों के बंटवारे का भी फैसला हुआ। दफ्तरों की मेज, कुर्सियां और बर्तन तक बांटे गए। ऐसे में सेना कैसे बची रही। बंटवारे से पहले जो भारत था और समय इंडियन आर्मी के चीफ थे सर क्लॉड औचिनलेक। उन्हीं की अगुवाई में इंडियन आर्मी को भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा गया।

 

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UK के नेशनल आर्मी म्यूजियम के दस्तावेजों के मुताबिक, सेना का बंटवारा इस तरह हुआ कि 2,60,000 सैनिक भारत को मिले और 1,40,000 सैनिक पाकिस्तान को दिए गए। भारत को मिले सैनिकों में हिंदू और सिख ज्यादा थे तो पाकिस्तान को मिले सैनिकों में ज्यादातर मुस्लिम जवान थे। नेपाल से हुई भर्तियों के आधार पर बनी गोरखा ब्रिगेड को दोनों देशों के बीच बांट दिया गया। बंटवारे के बाद जनरल लोकहार्ट इंडियन आर्मी के चीफ बने और जनरल फ्रैंक मेसरवी पाकिस्तानी आर्मी के चीफ बने। 

 

यही दस्तावेज बताते हैं कि दोनों देशों की आर्मी में कई यूनिट ऐसी थी जिन्होंने सैनिकों की अदला-बदली भी की। उदाहरण के लिए पाकिस्तान के खाते में गई 19वीं लैंसर्स में सिख और जाट सैनिक थे, तो इस यूनिट ने भारत की स्किनर्स हॉर्स यूनिट के मुस्लिम सैनिकों को लेकर जाट और सिख सैनिक भारत को दे दिए। इस स्थिति में भी बहुत सारे लोग अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं थे। मसलन भारत में रहने वाले लोग पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे और पाकिस्तान के लोग भारत नहीं आना चाहते थे। ऐसे ही परिवारों में कई सैनिक परिवार भी थे, ऐसे में उन्हें भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। जैसे-तैसे बंटवारा पूरा हुआ और दोनों देशों के पास बेहद कमजोर सेना बची।

डेढ़ साल का समय क्यों लगा?

 

बंटवारे के साथ ही पूरी सेना बिखरी हुई थी। कहीं बटैलियन अधूरी थी तो कहीं सैनिक कम पड़ गए थे। इसके चलते आजादी के बाद भी कई बड़े अंग्रेज सैन्य अफसर भारत में ही रुके। 15 अगस्त को आजादी के साथ ही सेनाओं का बंटवारा मौखिक तौर पर तो हो गया था लेकिन इसे जमीन पर उतारने में समय लगा। हां, इतना जरूर है कि इससे पहले ज्यादातर अंग्रेज सैनिक भारत छोड़कर जा चुके थे और सेना में सिर्फ भारतीय सैनिक ही बचे थे।

 

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15 अगस्त को बंटवारे के 2 दिन बाद यानी 17 अगस्त 1947 को ब्रिटिश आर्मी की रॉयल नोरफोक रेजीमेंट रवाना हुई। बंटवारे के साथ ही देश के कई इलाकों में दंगे हो गए और हर जगह सेना की जरूरत पड़ने लगी। लोगों की जान बचाने से लेकर उनके लिए कैंप लगाने और खाने का इंतजाम करने तक का जिम्मा सेना पर आ गया था। अगस्त में बंटवारा हुआ और अक्तूबर में पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। ऐसे में सेना पर दोहरा बोझ पड़ा। फिर भी भारत के जवानों ने शानदार वीरता दिखाई और पाकिस्तान को कश्मीर से खदेड़ा।

भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय क्या हुआ?

 

जब पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीर में घुसने की कोशिश की और कई जगहों पर आतंक मचाया, उस वक्त भारतीय सेना की कमान रॉय बुचर के हाथों में थी। यह युद्ध शुरू होने से ठीक पहले तक वह मुख्य रूप से सेना के संसाधनों के बंटवारे में जुटे हुए थे। कहा जाता है कि पंडित नेहरू को सीजफायर के लिए राजी करने में रॉय बुचर की अहम भूमिका थी।

 

अपनी किताब 'वॉर ऐंड डिप्लोमेसी इन कश्मीर'में पूर्व IFS अधिकारी सी दासगुप्ता लिखते हैं कि उस वक्त भारतीय सेना बेहद मजबूत थी लेकिन भारत पीछे हट गया। सी दासगुप्ता लिखते हैं, 'यहां तक कि पंडित नेहरू भी कश्मीर की सीमा से आगे जाकर इन हमलावरों और उनका समर्थन कर रहे पाकिस्तान को सबक सिखाने को तैयार थे लेकिन दो ब्रिटिश अफसरों यानी रॉब लॉकहार्ट और रॉय बुचर ने इस प्लान को लागू नहीं होने दिया। इनका तर्क था कि अगर भारत आजाद कश्मीर से इन कबीलाइयों को खदेड़ेगा तो पाकिस्तानी सेना भी उतर सकता है। इसी क्रम में माउंटबेटन ने नेहरू से कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाएं।'

 

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सी दासगुप्ता लिखते हैं कि माउंटबेटन ऐसा इसलिए कर रहे थे कि उन्हें डर था कि अगर युद्ध छिड़ता है तो वह अपना रुतबा खो देंगे। एक और वजह यह थी पश्चिमी ताकतों का मानना था कि अगर भारत पूरी ताकत से हमला कर देगा तो पाकिस्तान कई टुकड़ों में बंट जाएगा और इस पूरे क्षेत्र में अशांति फैल जाएगी। ऐसे में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाया और उसे सीजफायर पर राजी होना पड़ा।

भारतीय सेना और के एम करियप्पा

 

आजादी के समय के एम करियप्पा को मेजर जनरल बनाया गया और उन्हें डिप्टी चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बनाया गया। नवंबर 1947 में वह ईस्टर्न आर्मी के कमांडर और लेफ्टिनेंट जनरल बनाए गए। जनवरी 1948 में वह दिल्ली और पूर्वी पंजाब के कमांडर बनाए गए। यानी अंग्रेज अफसरों की निगरानी में भारतीय अफसर तैयार किए जा रहे थे। यह क्रमिक विकास था, जो उस समय जरूरी  समझा गया क्योंकि भारतीय सेना के जवानों और अफसरों के बाद उस वक्त इतना अनुभव नहीं था।

आखिर में जब भारतीय सेना ने अपने कदम मजबूत कर लिए थे और के एम करियप्पा भी जिम्मेदारी निभाने को पूरी तरह से तैयार थे, तब 15 जनवरी को रॉय बुचर ने उन्हें भारतीय सेना की कमान सौंपी और भारतीय सेना की कमान पूरी तरह से भारत के हाथ में आ गए। एक साल बाद यानी 26 जनवरी 1950 को भारत में संविधान लागू होने के साथ ही देश के राष्ट्रपति को तीनों सेनाओं का सुप्रीम कमांडर बना दिया गया।