प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर हैं। वह तीसरे भारत-नॉर्डिक समिट में हिस्सा ले रहे हैं। वह नीदरलैंड, स्वीडन और अन्य नॉर्डिक देशों का दौरा करेंगे। भारत के लिए यह बैठक, इसलिए भी खास है क्योंकि अमेरिका, अब, भारतीय उत्पादों के लिए बहुत सिमट रहा है, देश की नजर अब यूरोप पर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोप के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। यूरोप, भारत के लिए बेहतर बाजार साबित हो सकता है। साल की शुरुआत में ही भारत और यूरोपियन यूनियन के साथ एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ था, अब भारत इसका और विस्तार चाहता है। अमेरिका के हालिया रुख से यह बात साफ है कि भारत, अब सिर्फ अमेरिका पर व्यापार के लिए नहीं निर्भर हो सकता है।
भारत का यूरोप और नॉर्डिक देशों की तरफ जाना मजबूरी भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ दोस्ताना रुख खत्म किया है और भारत पर एक के बाद एक कई टैरिफ लादे, भारत के खिलाफ गैरजिम्मेदाराना बयान दिया, जिसके बाद से ही संबंध, पहले जैसे नजर नहीं आ रहे हैं।
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कब शुरू हो रहा है इंडिया नॉर्डिक सम्मेलन?
साल 2018 में स्टॉकहोम और कोपनहेगन में 2022 में पहले भी भारत-नॉर्डिक सिमट हो चुका है। भारत, नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड और आइसलैंड के नेता इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। भारत, अक्षय ऊर्जा, रक्षा सहयोग, समुद्री इन्फ्रास्ट्रक्चर, क्लीन एनर्जी और आर्कटिक सेक्टर में इन देशों के साथ सहयोग पर जोर दे रहा है।
नॉर्डिक देशों के साथ भार का व्यापार कितना है
साल 2024 में भारत-नॉर्डिक देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार 19 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत ने 9.4 अरब डॉलर का निर्यात किया और आयात 9.6 अरब डॉलर का आयात किया। भारत में 700 से अधिक नॉर्डिक कंपनियां काम करती हैं। नॉर्डिक देशों में 150 भारतीय कंपनियां मौजूद हैं।
भारत उम्मीद से क्यों देख रहा है?
भारत और EU के बीच मुक्त व्यापार समझौता हुआ है। समझौते का असर, व्यापार पर पड़ना तय है। आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के बीच 1 अक्टूबर, 2025 से लागू हुए भारत-ईएफटीए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते की वजह से व्यापार के बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
नॉर्डिक देशों से बेहतर रिश्ते भारत की मजबूरी क्यों हैं?
भारत को बड़ा बाजार चाहिए। ऐसा बाजार, जहां उत्पादों की सही कीमत भी मिले और अमेरिकी धमकियों का डर न हो। भारत के लिए नॉर्डिक देश, ऐसे ही विकल्प हैं। भारत इन देशों से पर्यावरण, AI, ब्लू इकॉनमी, जहाज निर्माण और रक्षा क्षेत्र में तकनीक चाहता है। बदले में भारत भी इन्हें अपनी तकनीकी मजबूतियां साझा करने के लिए तैयार है।
ध्रुवों से अंतरिक्ष तक, भारत का सहयोग करेंगे ये देश
भारत अपना पहला स्वदेशी पोलर रिसर्च वेसल (PRV) बना रहा है। गार्डन रीच शिपबिल्डर्स ने नॉर्वे की कंपनी कॉन्ग्सबर्ग के साथ समझौता किया है। यह जहाज 2029-30 तक तैयार हो जाएगा और लागत करीब 2,329 करोड़ रुपये है। इससे भारत को आर्कटिक और अंटार्कटिक दोनों जगह शोध करने में आसानी होगी। स्वीडन केएसरेंज स्पेस सेंटर से भारत को पहले ही चंद्रयान-3 और अन्य मिशनों में मदद मिल चुकी है। भारत, इसे भी अपने लिए जरूरी मान रहा है।
खनिजों का खजाना है नॉर्डिक देशों के पास
नॉर्डिक देशों में प्राकृतिक खजाने भरपूर हैं। भारत ने 10 साल में यहां अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। साल 2008 से भारत आर्कटिक रीजन में सक्रिय है। यहां हिमाद्री रिसर्च स्टेशन है। भारत की पनी आर्कटिक पॉलिसी नीति है। ये देश, भारत के अहम साझेदार हैं। नॉर्डिक देश बर्फ तोड़ने वाली जहाजों को बनाने में, अक्षय ऊर्जा बनाने और ध्रुवीय शोध में माहिर हैं। यहां दुर्लभ खनिज हैं, जो भारत की सामरिक जरूरतों को भी पूरा कर सकते हैं। आइसब्रेकर तकनीक, फिनलैंड से आती है, ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज हैं, स्वीडन का स्पेस इन्फ्रास्ट्रक्चर बेहतर है, नॉर्वे शिप डिजाइनिंग का उस्ताद है। इन देशों के साथ साथ आने से भारत को चौतरफा लाभ पहुंचता है।
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क्लीन एनर्जी सेक्टर से क्या उम्मीद है?
आइसलैंड भू-तापीय ऊर्जा और कार्बन कैप्चर में दुनिया का नेतृत्व करता है। भारत अपनी पर्यावरणीय क्षमताओं का इस्तेमाल करना चाहता है। नॉर्वे के पास समुद्र को लेकर बेहतरीन प्लान हैं, प्रदूषण के खिलाफ तकनीकी दक्षता है। 2 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश करने की क्षमाताओं वाले इन दोशों को भारतीय बाजार में आने का न्याता मिला है। भारत के स्वच्छ ऊर्जा, हाइड्रोजन और ऑफशोर विंड प्रोजेक्ट्स में ये निवेश क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं।
रक्षा विभाग को क्या उम्मीद है?
नॉर्डिक डिफेंस कोऑपरेशन (NORDEFCO) के तहत भारत इन देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा सकता है। भारत को अभी एंटी-सबमरीन वारफेयर दुरुस्त करने की जरूरत है। ठंडे मौसम में लॉजिस्टिक्स और समुद्री निगरानी में नॉर्डिक देशों की विशेषज्ञता का लाभ भी भारत लेना चाहता है। भारत को इस सेक्टर में भी बड़ी मदद की उम्मीद है।
भारत को जहाज बनाने में आत्मनिर्भर बनाएंगे ये देश?
भारत 2030 तक दुनिया के टॉप 10 जहाज बनाने वाले देशों में शामिल होना चाहता है। इसके लिए डेनमार्क और फिनलैंड की कंपनियों के साथ साझेदारी बढ़ाने की सिफारिश की गई है। भारतीय शिपयार्ड्स को ग्रीन शिपिंग टेक्नोलॉजी और आइस-क्लास जहाज बनाने में मदद मिलेगी। भारत अभी भी अपने LNG और LPG आयात के लिए विदेशी जहाजों पर निर्भर है। मार्च 2026 में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जब मुश्किलें बढ़ीं तो इसका खतरा साफ दिखा। अब में नॉर्डिक देशों के साथ मिलकर भारत को अपने स्वदेशी LNG कैरियर जहाज बनाने में मदद मिल सकती है।
