अवसर से आशंका तक, FTA पर भारत और यूरोपियन यूनियन की चुनौतियां क्या हैं?
भारत के अपने क्षेत्रीय हित हैं, जिन्हें लेकर यूरोपियन यूनियन के साथ सहमति नहीं बन पा रही है। एक अरसे से भारत और यूरोपियन यूनियन, फ्री मूवमेंट ट्रेड को लेकर महत्वाकांक्षी हैं।

EU नेताओं के साथ विदेश मंत्री एस जयशंकर। Photo Credit: PTI
भारत के 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि हैं। दोनों अधिकारी, 25 जनवरी से 27 जनवरी तक भारत की राजकीय यात्रा पर हैं। यूरोपियन यूनियन के सबसे बड़े साझेदारों में से भारत भी एक है। भारत और यूरोपियन यूनियन बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पिछले लगभग 20 वर्षों से चर्चा में है, अब दोनों देश, एक अहम पड़ाव पर पहुंचने वाले हैं।
16वें EU-इंडिया समिट के लिए यूरोपीय नेता भारत आ रहे हैं। भारत और यूरोपियन यूनिट, व्यापार समझौते को लेकर महत्वाकाक्षी मिशन पर जुटे हैं। 27 जनवरी को होने वाली इस समिट पर देशभर की निगाहें टिकी हैं। दो दशकों से ज्यादा वक्त से भारत और यूरोपियन के बीच तकनीक, सूचना, रक्षा, खेती, कार्बन बॉर्डर टैक्स, सर्विस डिलीवरी जैसे अहम विषयों को लेकर चर्चा चल रही है। कभी सोचा है कि दशकों की बातचीत के बाद भी कहां FTA पर बात अटकती है?
यूरोपियन यूनियन की तरफ से कई बार कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है, जिसकी वजह से भारत के साथ बात अटक जाती है। , जनरलाइज्ड सिस्ट ऑफ प्रिफरेंसेज (GSP) के तहत कई वस्तुओं पर भारत को मिलने वाले एक्सपोर्ट फीस पर सब्सिडी हटा दी है। 1 जनवरी से इसे निलंबित किया गया है। अब इस फैसले से खनिज, रसायन, प्लास्टिक, लोहा स्टील और कुछ उपकरणों पर भारत को झटका लगेगा। यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर ऐसी ही कई बाधाएं, हर बात सामने आती हैं कि बात अटक जाती है।
यह भी पढ़ें: ISIS के खिलाफ लड़ने वाले कुर्दों को अमेरिका ने कैसे दिया धोखा?
27 जनवरी को होने वाली बैठक में ही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत खत्म होगी, समझौते पर बाद में दोनों देश आगे बढ़ेंगे। आखिर क्यों यहां बार-बार अटकती है चीजें-
EU-इंडिया समिट का एजेंडा क्या है?
भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच 20 साल से ज्यादा वक्त से मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। यह समझौता लगभग पूरा होने वाला है। 27 जनवरी 2026 को 16वें शिखर सम्मेलन में कई बातों पर सहमति बन सकती है। यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे इतिहास का सबसे बड़ा सौदा तक करार दिया है। पीयूष गोयल ने इस समझौते को 'मदर ऑफ ऑल डील्स' बता दिया है।
किन मुद्दों पर हो सकता है FTA, असर किस पर?
इस समझौते से भारत का टेक्सटाइल, ज्वेलरी, मेडिकल सेक्टर को नया आकार मिल सकता है। यूरोपीय कारें, वाइन, ड्रिंक्स सस्ती हो सकती हैं। EU भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक ब्लॉक है। इससे जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज की बहाली हो सकती है। गारमेंट्स, फार्मा, स्टील, पेट्रोलियम, मशीनरी आदि निर्यात पर टैरिफ कम किए जा सकते हैं। अमेरिका ने भारत पर करीब 50 फीसदी टैरिफ लगाया है, अगर उससे बाहर आना है तो यूरोपियन यूनियन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट अनिवार्य है।
यह भी पढ़ें: 'सूदखोर, लुटेरा, भ्रष्ट और गद्दार', यूनुस पर खूब बरसीं शेख हसीना
किन मुद्दों पर सहमती नहीं बन पा रही है?
यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच इंटेल्क्चुअल प्रॉपर्टी कंजर्वेशन, डेटा प्रोटेक्सन और पेटेंट रूल्स को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। भारत का कहना है कि यूरोपियन यूनियन का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) नए टैरिफ जैसा लगता है, जो लघु और छोटे उद्योगों (MSME) के लिए महंगा और जटिल है। कृषि, डेयरी जैसे संवेदनशील मामलों पर अभी मंथन की जरूरत है। कार, वाइन जैसी चीजों पर टैरिफ चरणबद्ध तरीके से कम किया जा सकता है।
यह भी पढ़ें: 'ये तो पूरा झूठ है', ट्रंप के 800 फांसी रोकने के दावे पर बोला ईरान
जरूरी क्यों है यह डील?
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगया है। ईरान के साथ व्यापार करने पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी है। टैरिफ और यूरोप के साथ व्यापार युद्ध की धमकियों के बीच दोनों पक्ष विश्वसनीय व्यापार के लिए साझेदार तलाश रहे हैं। भारत की जरूरत यूरोपियन यूनियन है, यूरोपियन यूनियन की जरूरत भारत जैसा बड़ा बाजार है। भारत अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करना चाहता है, जबकि EU चीन पर निर्भरता घटाना चाहता है। भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता, इसलिए इस डील पर जोर दे रहा है।
यह भी पढ़ें: WHO: अमेरिका ने सिर्फ सदस्यता ही नहीं, 260 मिलियन डॉलर का कर्ज भी छोड़ा
किन बातों पर सहमति बन सकती है?
- रक्षा और सुरक्षा पर नए पार्टनरशिप समझौता की उम्मीद
- सूचना सुरक्षा पर समझौते की उम्मीद
- मजदूरों, स्किल्ड वर्कर, स्टूडेंट, रिसर्चर, सीजनल वर्कर के आने-जाने पर MoU
- जलवायु परिवर्तन, सप्लाई चेन, क्रिटिकल मिनरल्स पर साझेदारी
- आपदा राहत और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाने की उम्मीद
- IMEC कॉरिडोर, भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर
भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच व्यापार कितना है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, भारत के लिए लगातार मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। उनके मनमाने फैसलों की वजह से दुनियाभर के व्यापार पर असर पड़ रहा है। ट्रंप के फैसलों का असर भारत और यूरोपियन यूनियन, दोनों पर पड़ रहा है। यूरोपियन कमीशन के आंकड़े बताते हैं कि भारत के लिए EU सबसे बड़ा सामान व्यापार साझेदार है। साल 2024-25 में 136 बिलियन डॉलर से ज्यादा का व्यापार भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच हुआ है। इस समझौते के और विस्तृत होने की उम्मीद जताई जा रही है।
EU को भारत क्यों पसंद है?
भारत दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था है। भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की सकल घरेलू आय (GDP) पार करने की राह पर है। अगर ऐसा हुआ तो जापान भी अर्थव्यवस्था में भारत से पीछे छूट सकता है। यह समझौता 2 अरब लोगों का मुक्त बाजार होगा। दुनियाभर की अर्थव्यवस्था का 1 चौथाई हिस्से तक यह व्यापार फैल सकता है।
https://twitter.com/MEAIndia/status/2014895650203431093
यह भी पढ़ें: बैन से बचने के लिए अमेरिका में क्या डील साइन कर रहा है टिक-टॉक?
भारत को EU क्यों पसंद है?
EU भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक ब्लॉक है। अगर जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज की बहाली होगी तो साल 2023 में भारत ने जिन नुकसानों को सहा है, उनमें राहत मिलेगी। गारमेंट्स, फार्मा, स्टील, पेट्रोलियम, मशीनरी आदि निर्यात पर टैरिफ कम होंगे। अमेरिकी टैरिफ के झटके से भारत उबर सकेगा।
बात कहां अटकती है?
- रूस के साथ रिश्ता: यूरोपियन यूनियन के ज्यादातर देश, रूस के खिलाफ हैं। वे नहीं चाहते कि भारत, रूस से तेल खरीदे। भारत अपने फैसले, संप्रभु तरीके से लेता है, वैश्विक दबाव में नहीं। अमेरिका के साथ-साथ यूरोपियन यूनियन को भी यह बात खटकती है।
- कृषि और डेयरी उत्पादों पर असहमति: अगर FTA इस सेक्टर में हुआ तो छोटे किसानों, आम नागरिकों के हित प्रभावित हो सकते हैं। भारत के लिए यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है। करोड़ों सीमांत किसान डेयरी और कृषि पर आधारित हैं। देश को डर है कि अगर यूरोपीय डेयरी उत्पादों में यूरोप की एंट्री स्वीकार की जाती है तो पनीर, बटर, मिल्क पाउडर के सेक्टर में भारतीय किसान हाशिए पर चले जाएंगे। इस समझौते को बाहर रखा गया है।
- ऑटोमोबाइल और शराब पर असहमति: यूरोपियन यूनियन की मांग रहती है कि भारत यूरोपीय कारों, वाइन और व्हिस्की पर लगने वाली भारी इंपोर्ट ड्यूटी को कम कर दे। EU का कहना है कि भारत में विदेशी कारों पर टैक्स 70 फीसदी से 100 फीसदी तक हो सकता है। भारत इसे धीरे-धीरे कम करने पर विचार कर रहा है, लेकिन इसमें एक बड़ी दिक्कत है। विदेशी निवेश और व्यापार को इजाजत मिली तो घरेलू उद्योग पर सकंट आ सकता है, कुछ उद्योग पूरी तरह खत्म हो सकते हैं।
- 'ग्रीन प्रोटेक्शनिज्म' और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म: यूरोपियन यूनियन का नया कार्बन टैक्स भी भारत की चिंता बढ़ा रहा है। 1 जनवरी से लागू यूरोपियन यूनियन के इस फैसले की वजह से भारत का स्टील और एल्युमीनियम निर्यात पर अतिरिक्त लागत आनी तय है। भारत इसमें छूट की मांग करता है, यूरोपियन यूनियन ने चुप्पी साधी है।
- प्रोफेशन वीजा और प्रवासी संकट: बड़ी संख्या में भारतीय, यूरोप की ओर पलायन कर रहे हैं। भारत चाहता है कि उसके IT प्रोफेशनल्स, डॉक्टरों और अन्य विशेषज्ञों के लिए यूरोप में काम करने के लिए वीजा प्रक्रिया आसान की जाए। यूरोपीय यूनियन, इसके बदले में भारत के बैंकिंग, इंश्योरेंस और लीगल सेक्टर में दखल चाहता है। भारत इसके लिए तैयार नहीं है। यूरोप भारतीयों और एशिया के बढ़ते प्रवासन से पहले ही डरा है।
- डेटा प्रोटेक्शन और लेबर स्टैंडर्ड्स: यूरोपियन यूनियन, भारत से कड़े डेटा सुरक्षा नियमों और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों को अपनाने की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि विकासशील देश होने के नाते उसे अपनी नीतियों में लचीलेपन की जरूरत है। भारत ने अपने श्रम नियमों में व्यापक संशोधन भी किया है।
क्या होगा भारत-यूरोपियन FTA का भविष्य?
भारत और यूरोपियन यूनियन, 2 दशक की बातचीत के बाद निर्णायक फैसले पर पहुंचते नजर आ रहे हैं। असहमतियों पर भारत और EU दोनों बच रहे हैं। यूरोपियन यूनियन चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है, भारत असीमित संभावनाओं वाला देश है। ऐसा हो सकता है कि यूरोपियन यूनियन, चीन का प्रभाव कम करने के लिए अब, भारत की शर्तों पर जोर दे। 27 जनवरी की बैठक पर दुनियाभर की नजरें टिकी हैं।
और पढ़ें
Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies
CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | Sitemap


