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ISIS के खिलाफ लड़ने वाले कुर्दों को अमेरिका ने कैसे दिया धोखा?

इस्लामिक स्टेट के खिलाफ जिस जातीय समूह ने अमेरिका को जीत दिलाने में सबसे बड़ी मदद पहुंचाई, आज अमेरिका उसे ही धोखा दे रहा है। इससे न केवल सीरिया बल्कि तुर्की, ईरान और इराक तक फैले कुर्दों में गुस्सा है।

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सीरिया में कुर्दों को अमेरिका से मिला धोखा। ( Photo Credit: Social Media)

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अफगानिस्तान की तरह अमेरिका ने कुर्दों को भी धोखा दिया है। सीरिया, इराक, ईरान और तुर्की तक फैले कुर्दों में अमेरिका के प्रति गुस्सा है। वह अमेरिकी प्रशासन पर यूज एंड थ्रो का आरोप लगा रहे हैं। अहमद अल शरा की नेतृत्व वाली सीरियाई सरकार ने उत्तर पूर्व सीरिया में कुर्दों से एक बड़ा भूभाग छीन लिया है। कुर्दों की सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्से (SDF)को अपने इलाकों से पीछे हटना पड़ा। तुर्की एसडीएफ के पीछे हटने का जश्न मना रहा है, जबकि एसडीएफ लड़ाके खुद को अमेरिका से ठगा महसूस कर रहे हैं।

 

करीब एक दशक पहले अमेरिका के समर्थन से एसडीएफ की स्थापना हुई थी। अमेरिका के साथ कुर्दों की इस सेना ने न केवल इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई लड़ी, बल्कि सीरिया के अलेप्पो समेत बड़े भूभाग पर अपना नियंत्रण भी स्थापित किया। सीरिया के तेल समृद्ध इलाके के अलावा लगभग एक तिहाई जमीन पर इनका अधिपत्य था, लेकिन सीरियाई सेना के साथ पिछले एक महीने की जंग में कुर्दों की सेना एसडीएफ को बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ा।

बैकग्राउंड को समझिए

2024 में सीरिया में बशर अल असद सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह भड़का। भारी हिंसा के बीच असद को रूस भागना पड़ा। देशभर पूर्व आतंकी अहमद अल शरा का कब्जा हो गया। अल कायदा से जुड़े आतंकी शरा पर अमेरिका ने भारी भरकम इनाम घोषित कर रहा था। मगर देश की कमान संभालते ही उस पर लगी पाबंदी और इनाम को हटा दिया। अमेरिका ने खुलकर शरा का समर्थन किया और आज यही अहमद अल शरा अमेरिका का बेहद खास है।

 

अब सीरिया में दो ताकतें हैं। जिन्हें अमेरिका का समर्थन प्राप्त है। एक अल शरा की अगुवाई वाली सीरिया सरकार और दूसरे कुर्द हैं। आरोप है कि अमेरिका काम निकलने के बाद कुर्दों के साथ विश्वासघात कर रहा है। कुर्द बलों ने अमेरिका से संपर्क साधा था। हालांकि वाशिंगटन ने कुर्दों की तरफ से दखल देने से साफ मना कर दिया। ट्रंप प्रशासन ने खुलकर अल शरा सरकार का समर्थन किया। जब अल शरा ने एसडीएफ के खिलाफ कार्रवाई को तेज किया तो अमेरिका ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

मौजूदा विवाद की जड़ क्या है?

मार्च 2025 में सीरिया की सरकार और कुर्द बलों के बीच एक समझौता हुआ था। इसके तहत साल के अंत तक एसडीएफ का सीरिया की सेना में विलय करना था। नियंत्रण वाला उत्तर पूर्व सीरिया को सरकार के हवाले सौंपना था। जब एसडीएफ ने अपना वादा नहीं निभाया तो सीरियाई की सेना ने एसडीएफ के खिलाफ अभियान चलाया। सीरिया की सेना का अमेरिका और तुर्की ने समर्थन किया। 

 

एसडीएफ ने अलग-अलग यूनिट के तहत सेना में शामिल करने की मांग उठाई। सीरिया की सरकार ने मना कर दिया। उसका कहना है कि अलग-अलग जवानों को अलग-अलग यूनिट में शामिल किया जाएगा। 

 

शर्त के मुताबिक -

 

  • एसडीएफ का सेना में विलय करना
  • गैस-तेल वाले क्षेत्र को सौंपना होगा
  • जेलों और कैंप का नियंत्र भी देना होगा

 

बदले में- 

  • कुर्दिश को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा
  • कुर्द लोगों को सीरिया की नागरिकता
  • नवरोज को राष्ट्रीय अवकाश घोषित होगा

अमेरिका का विश्वासघात

कुर्द लड़ाके अमेरिका के व्यवहार को विश्वासघात के तौर पर देख रहा हैं। इस बात की पुष्टि अमेरिका के विशेष दूत टॉम बैरक के बयान से होती है। हाल ही में बैरक ने कहा, सीरिया में आईएस विरोधी मुख्य बल एसडीएफ के साथ साझेदारी का मूल उद्देश्य लगभग समाप्त हो चुका है। सीरिया में कुर्दों के सामने सबसे बड़ा अवसर शरा की अगुवाई में होने वाले बदलाव में ही निहित है।

 

सीरिया में कुर्दों का कहां-कहां कब्जा

  • रक्का
  • दीर अज जोर 
  • हसाका

तुर्की के खिलाफ क्या इजरायल देगा दखल?

तुर्की की कुल आबादी का करीब 20 फीसद हिस्सेदारी कुर्दों की है।  रेसेप तैयप एर्दोगन की सरकार पर कुर्दों की पहचान मिटाने का आरोप है। 1978 में पीकेके नाम की एक पार्टी का गठन किया गया। 1984 में पीकेके ने तुर्की के खिलाफ जंग छेड़ी, ताकि आजाद मुल्क बनाया जा सके। दशकों के संघर्ष में करीब 40 हजार जानें गईं। तुर्की का आरोप है कि एसडीएफ के संबंध पीकेके से हैं। यही कारण है कि वह सीरिया में भी कुर्दों के खिलाफ हमले करता रहता है।

 

सीरिया में तुर्की के दखल से इजरायल खफा है। यही कारण है कि एसडीएफ ने अमेरिका से उम्मीद छोड़कर इजरायल से सीधे हस्तक्षेप की मांग की। एसडीएफ से जुड़े नेताओं ने इजरायल से कहा कि हमारी भी ठीक वैसी मदद करें जैसे सुवेदा प्रांत में द्रुज लोगों की थी। अभी तक इजरायल ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

 

एक बयान में एसडीएफ ने कहा, जैसे 2014 में हमारे साथियों ने कोबानी में एक ऐतिहासिक प्रतिरोध खड़ा किया और उसे (इस्लामिक स्टेट के लिए) कब्रिस्तान में बदल दिया। वैसे ही हम आज भी अपने शहरों को तुर्की से निर्देशित आईएसआईएस मानसिकता वाले लोगों के लिए कब्रिस्तान में बदल देंगे।'

कौन हैं कुर्द, कहां तक फैले?

दुनियाभर में कुर्दों की करीब 3 से 4 करोड़ की आबादी है, लेकिन अपना कोई देश नहीं है। यह लोग कुर्दिश भाषा बोलते हैं। मुख्यत: यह उत्तर-पश्चिम ईरान की भाषा है। अधिकांश कुर्द सुन्नी मुसलमान हैं। हालांकि कुछ लोग अन्य धर्मों को भी मानते हैं। कुर्दों की आबादी उत्तरी इराक, उत्तर पश्चिम ईरान, दक्षिण-पश्चिमी आर्मेनिया, दक्षिण-पूर्वी तुर्की में रहती है।

 

15वीं शताब्दी में ओटोमन साम्राज्य ने कुर्दों की अधिकांश जमीन पर कब्जा कर लिया था। 1920 में सेवरस संधि हुई और ओटोमन साम्राज्य टूट गया। संधि के तहत कुर्दिस्तान नाम से एक देश बनाने का वादा किया गया। मगर आज तक इसे लागू नहीं किया गया। कुर्दों लोगों ने कई बार अपना अलग देश बनाने की कोशिश की। आज भी उनका यह ख्वाब अधूरा है।

  • तुर्की में कुल आबादी में करीब 20 फीसद कुर्द।
  • सीरिया की कुल संख्या में 10 प्रतिशत।
  • इराक में 15 से 20 फीसद कुर्द। कुर्दिस्तान इलाके में नियंत्रण।
  • इरान में करीब 10 प्रतिशत कुर्द आबादी।

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