दुनिया के सबसे बड़े दानदाता अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को छोड़ दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने एक साल पहले WHO से हटने के लिए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किया था। ट्रंप प्रशासन के इस कदम से अमेरिका अब डब्ल्यूएचओ के किसी भी कार्यक्रम का हिस्सेदार नहीं होगा। वहीं उस पर करीब 260 मिलियन डॉलर कर्ज भी बकाया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ के सभी निकायों और तकनीकी समिति में अपनी भागेदारी खत्म कर दी है। मुख्यालय समेत दुनियाभर में तैनात अपने कर्मचारियों को वापस बुला लिया है। अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग का कहना है कि संगठन ने महामारी का कुप्रबंधन किया और सुधारों को लागू करने में असफल रहा। संगठन की सभी फंडिंग को बंद कर दिया गया है। अमेरिका ने संगठन पर कोविड महामारी के दौरान चीन केंद्रित नीति अपनाने का आरोप लगाया। दूसरी तरफ डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस का कहना है कि संगठन से हटना न केवल अमेरिका, बल्कि दुनिया के लिए एक नुकसान है।
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ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने 2022-23 के बीच डब्ल्यूएचओ को करीब 1.3 अरब डॉलर की सहायता दी। इतनी भारी भरकम रकम के साथ अमेरिका दुनिया का शीर्ष दानदाता था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका को करीब 260 मिलियन डॉलर का भुगतान डब्ल्यूएचओ करना था। मगर अमेरिका ने केवल भुगतान रोका, बल्कि सदस्यता भी छोड़ दी। सबसे खास बात यह है कि कानूनी तौर पर अमेरिका यह भुगतान करने को बाध्य नहीं है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक जनवरी 2025 तक अमेरिका पर करीब 260 मिलियन डॉलर का बकाया था।
अमेरिका ने 2024 और 2025 की फीस का भी भुगतान नहीं किया। इसका असर यह हुआ कि डब्ल्यूएचओ के कई कर्मचारियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। उधर, डब्ल्यूएचओ के वकीलों का तर्क है कि अमेरिका को बकाया राशि चुकानी ही होगी। जवाब में अमेरिका ने कहा कि ऐसा करने का कोई कारण नहीं है।
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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और स्वास्थ्य मंत्री रॉबर्ट एफ कैनेडी ने कहा, 'डब्ल्यूएचओ अपने मूल मिशन से हट गया था। उसने बार बार अमेरिका के हितों के खिलाफ काम किया। अमेरिका ने जो भी काम डब्ल्यूएचओ के लिए किया, संगठन ने उसे कलंकित और खारिज किया।' अमेरिका ने यह भी ऐलान किया कि अब वह देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों के माध्यम से रोग निगरानी और इलाज पर ध्यान केंद्रित करेगा।