गंगा और गंडक के संगम के पास बसा बिहार का हाजीपुर शहर होली पर जैसे अपनी पूरी आत्मा खोल देता है। यहां रंग सिर्फ चेहरे नहीं रंगते, बल्कि मोहल्लों, रिश्तों और पुरानी यादों को भी एक साथ भिगो देते हैं। होली से हफ्ते भर पहले ही शहर की रफ्तार बदलने लगती है। बाजारों में अबीर-गुलाल की ढेरियां सज जाती हैं, पिचकारियों की कतारें बच्चों की आंखों में चमक भर देती हैं। स्थानीय मिठाई की दुकानों पर गुझिया, दही-बड़ा और मालपुआ की खुशबू हवा में तैरती रहती है। गांवों से लोग खरीदारी के लिए शहर आते हैं और पूरा हाजीपुर गुलजार हो जाता है।
होलिका दहन की रात मोहल्ले में सामूहिक तैयारी दिखती है। बच्चे लकड़ियां जुटाते हैं, बड़े लोग व्यवस्था संभालते हैं। जैसे ही आग जलती है लोग परिक्रमा करते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दोहराते हैं। आग की लपटें सिर्फ लकड़ियों को नहीं जलातीं, बल्कि पुराने गिले-शिकवे भी राख कर देती हैं।
यह भी पढ़ें: एक त्योहार, कई अंदाज, देश के अलग-अलग राज्यों में होली की खास परंपराएं
हाजीपुर की होली का बदलता रंग
होली की सुबह खुशी का माहौल होता है। लोग पहले सूखे रंगों से एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं, युवा पैर छूकर रंग लगाते हैं लेकिन दोपहर तक माहौल पूरी तरह बदल जाता है। ढोलक और मंजीरे की थाप के साथ फगुआ गीत गूंजने लगते हैं। कई जगह डीजे की तेज धुनें भी सुनाई देती हैं, भोजपुरी गाने बजते है जिन पर लड़के टोली बनाकर नाचते-गाते सड़कों पर निकल पड़ते हैं।
सामाजिक एकता और लोकपरंपरा का संगम
हाजीपुर की होली की सबसे बड़ी खासियत इसकी सामाजिक एकता है। यहां हिंदू-मुस्लिम परिवार एक-दूसरे के घर जाकर मिठाइयां बांटते हैं, गले मिलते हैं और रंग लगाते हैं। यह शहर गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करता है, जहां त्योहार विरासत की तरह मनाया जाता है। आसपास के गांवों से आए लोग पारंपरिक अंदाज में होली खेलते हैं। कहीं लोकगीतों की महफिल सजती है तो कहीं ढोल की थाप पर सामूहिक नृत्य होता है। महिलाएं समूह बनाकर फगुआ गाती हैं, जिससे माहौल में अलग ही मिठास घुल जाती है।
यह भी पढ़ें: होली के रंगों को छुड़ाने के लिए अपनाएं ये तरीके, 10 मिनट में चेहरा होगा साफ
ठंडाई और सामुदायिक उत्सव की खास झलक
खानपान भी होली का अहम हिस्सा है। हर घर में मेहमानों के लिए दरवाजे खुले रहते हैं। ठंडाई के गिलास, गुजिया की प्लेट, मटन और हंसी-मजाक का सिलसिला पूरे दिन चलता है। बच्चों के लिए यह रंगों का रोमांच है, युवाओं के लिए उत्साह का विस्फोट और बुजुर्गों के लिए परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर है।
इको-फ्रेंडली होली
पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है। कई युवा प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल और पानी की बचत का संदेश देते नजर आते हैं। सोशल मीडिया पर हाजीपुर की होली की तस्वीरें और वीडियो तेजी से शेयर किए जाते हैं, जिससे यह स्थानीय त्योहार डिजिटल दुनिया तक पहुंचता है। कुल मिलाकर, हाजीपुर की होली रंग, रिश्ते और प्रेम का त्योहार है। यहां हर गली में फागुन की धुन बजती है और हर दिल में एक ही भावना होती है होली मिलकर मनाना है। यही इस शहर की पहचान है और यही इसकी सबसे खूबसूरत परंपरा है।
