उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले का मुख्यालय बेल्हा में है। यह छोटा सा शहर गांव के लोगों से भरा है इसलिए होली पर मेरे इस शहर में गंवई छाप दिखती है। बीते कुछ साल में अब शहर के प्रमुख चौराहों जैसे कि सदर चौराहा, चौक-घंटाघर, आंबेडकर चौराहा और निर्मल पैलेस तिराहे पर होलिका दहन की तैयारियां हफ्ते भर पहले से होने लगती हैं। इधर-उधर से जुटाई गई लकड़ियों का ढेर आखिर तक इतना बड़ा हो जाता है कि होलिका दहन के समय जलने वाली आग चौराहे को छोटा कर देती है और लोग दूर हट जाते हैं। होली से पहले रंगों से सजे बाजार जिले के गांवों के लोगों को भी आकर्षित करते हैं।

 

आज भी तमाम गांवों के लोग बड़ी खरीदारी के लिए शहर आते हैं और हमेशा की तरह प्रतापगढ़ शहर गुलजार हो उठता है। गांवों से घिरे इस छोटे से शहर की होली सुबह सूखे रंगों से शुरू होती है और दोपहर आते-आते जोरदार शोर, डीजे की तेज आवाज और उत्साही लोगों की भीड़ के साथ अपने चरम पर पहुंचती है। होली से पहले मंदिरों और शिवालयों में फाग भरपूर गाया जाता है और चुनावी साल में तो नेता भी इन आयोजनों में खूब पहुंचते हैं।

अवध की जान प्रतापगढ़ 

 

अवध क्षेत्र में आने वाला प्रतापगढ़ अपनी मीठी बोली और प्यार-मोहब्बत वाले माहौल के लिए मशहूर है। जैसे आंवला खाकर पानी पीने से मिठास आती है, वैसे ही दूर से सख्त और अक्खड़ दिखने वाले प्रतापगढ़ी भी असल में बहुत सरल और सहज हैं। होली में अवध का यह रंग प्रतापगढ़ की सड़कों पर खूब दिखता है। बाइक पर सवार युवा झुंड के झुंड सुबह तो अपना चेहरा दिखाते हुए निकलते हैं लेकिन दोपहर तक सारे चेहरे एक ही रंग में रंगे होते हैं। 

 

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पुराने लोग आज भी कीचड़, पानी, डामर आदि जैसी चीजों से होली खेलने से बाज नहीं आते। गड्ढे या हौद में भरे पानी में लोगों को पटकने या फिर पाइप के पानी से भिगा देने का अपना ही मजा है और प्रतापगढ़ी लोग इसका भरपूर मजा लेते हैं।

चोरी-छिपे वाली होली है खास

 

प्रतापगढ़ में घर-परिवार के रिश्तों में होली खेलने और एक-दूसरे को फगुआने (रंग लगाने) की पुरानी पंरपरा है। सालियों और सलहजों का अपने जीजा को रंगने के लिए तरह-तरह के ढोंग रचना, बाकी लोगों से झूठ बुलवाकर लोगों को रंगने के लिए फंसाना बेहद आम है। आज भी आपको यह देखने को मिलेगा कि आप बुलाए किसी और काम से जाएंगे और अचानक बाल्टी भर रंग आपको सराबोर कर देगा। रोचक बात यह है कि इस तरह की होली कई दिन पहले से चालू रहती है और कई दिन बाद तक भी चलती है।

 

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कई दिन पहले से ही खोआ बनाने, उससे गुझिया बनाने और इसी माहौल में एक-दूसरे को फगुआने का काम चलता रहा है। गांवों की लड़कियां आज भी एक-दूसरे की मदद से पापड़, गुझिया आदि बना डालती हैं और होली के लिए तैयार रहती हैं। हां, बीते कुछ सालों में यह जरूर देखने को मिला है कि पक्के रंगों की जगह अबीर-गुलाल ज्यादा आ गए हैं और हवा में उड़ने वाला रंग ज्यादा दिखने लगा है। वरना तो प्रतापगढ़ की होली ऐसी होती थी कि रंग कहीं उड़ता हुआ नहीं दिखता था लेकिन थोड़ी ही देर में सारे चेहरे रंगे हुए नजर आते थे।