साल 2025 कई राजनीतिक दलों को गहरा सदमा देकर गया। आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता से बाहर हो गई, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) एक बार सत्ता से दूर रह गई। शिवसेना (उद्धव बाला साहब ठाकरे) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) अपना कुनबा बचाने में परेशान रहे और ढाई दशक तक ओडिशा पर राज करने वाले नवीन पटनायक की पार्टी बिखर सी गई। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि एक या दो राज्यों में सरकार चले राष्ट्रीय दलों या फिर एक-दो राज्यों तक ही सीमित क्षेत्रीय दलों के लिए 2026 में क्या संभावनाएं हैं। कई दल ऐसे हैं जो अभी-अभी चुनाव हारे हैं और कई दल ऐसे हैं जो 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए कमर कस रहे हैं।
2026 में सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम बंगाल की सरकार चला रही तृणमूल कांग्रेस, केरल की लेफ्ट सरकार और तमिलाडु की द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) के सामने है। असम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने अपनी सरकार बचाने की चुनौती है और पुडुचेरी में कांग्रेस अपनी वापसी की कोशिशों में जुटी हुई है। 2026 के बाद आम आदमी पार्टी की बड़ी परीक्षा होगी क्योंकि गुजरात और पंजाब में चुनाव हैं और दिल्ली हारने के बाद AAP ने अपनी पूरी ताकत इन दो राज्यों में झोंक दी है।
मौजूदा स्थिति क्या है?
मौजूदा वक्त में देश के कुल 28 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों यानी कुल 31 में से 14 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। 4 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में सरकार चला रहे दल नेशनल डेमोक्रैटिक अलायंस (NDA) का हिस्सा हैं और BJP उन सरकारों में शामिल है। सिर्फ तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है और दो राज्यों (तमिलनाडु और झारखंड) और एक केंद्र शासित प्रदेश (जम्मू-कश्मीर) की सरकार में वह शामिल है। एक राज्य में आम आदमी पार्टी की, एक राज्य में तृणमूल कांग्रेस की और एक राज्य में लेफ्ट की सरकार है। मिजोरम में सरकार चला रही जोराम पीपल्स मूवमेंट (ZPM) किसी धड़े का हिस्सा नहीं है। बाकी के एक राज्य मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू है।
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मौजूदा वक्त में तमिलाडु में DMK, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार ऐसी है जो बीजेपी के विरोध में चल रहे क्षेत्रीय दल चला रहे हैं। आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी (TDP) की अगुवाई वाली सरकार में बीजेपी भी शामिल है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है और फिलहाल उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है।
कौन-कौन कमजोर हुआ?
अगर राजनीतिक इतिहास के हिसाब से देखें तो जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के साथ सरकार चला चुकी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) और लंबे समय तक पंजाब पर राज करने वाला शिरोमणि अकाली दल (SAD) अपने-अपने अस्तित्व को जूझ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी पहली बार संसद से पूरी तरह साफ होने जा रही है। दोफाड़ होने के बाद शिवसेना के दोनों धड़े कमजोर हो चुके हैं और महाराष्ट्र में बीजेपी अपने दम पर सरकार चलाने में सक्षम है। 10 साल तेलंगाना पर राज करने वाली भारत राष्ट्र समिति (BRS) का कुनबा लगातार बिखर रहा है और भाई-बहन का भी टकराव हो गया है।
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ढाई दशक तक ओडिशा की सरकार चलाने वाला बीजू जनता दल (BJD) 100 साल जनता की सेवा करने का दम जरूर भर रहा है लेकिन पार्टी के पास अब भी इसका जवाब नहीं है कि नवीन पटनायक के बाद पार्टी का क्या होगा। बिहार में हाल ही में मिली करारी हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सदमे से नहीं उबर पाया है और तेजस्वी यादव फिलहाल विदेश में हैं। जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस सत्ता से बाहर जरूर है लेकिन उसके वजूद को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है। हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल और जननायक जनता पार्टी दोनों ही बेहद कमजोर स्थिति में हैं।
अब भी दम बाकी है...
जो बीजेपी और कांग्रेस के अतिरिक्त सरकार चलाने वाले बड़े दल हैं उनमें सबसे बड़ा नाम तृणमूल कांग्रेस का है जिसकी उपस्थिति संसद में भी मजबूत है। लंबे समय से पश्चिम बंगाल की सरकार चला रही ममता बनर्जी अभी भी पूरा दम दिखा रही हैं और बीजेपी के लिए उनके किले में सेंध लगा पाना अब भी दूर की कौड़ी ही लग रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भी 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी समेत पूरे देश को हैरान कर दिया था। 2026 के बाद 2027 में यूपी के विधानसभा चुनाव हैं और अखिलेश यादव PDA के नारे को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में उनकी गिनती सबसे मजबूत क्षेत्रीय दलों में हो रही है।
जेल जाकर फिर से सत्ता संभालने वाले हेमंत सोरेन ने 2024 में मिली चुनावी जीत से यह साबित किया है कि अभी उनमें दम बाकी है और अपने दम पर भी वह झारखंड की सत्ता पर काबिज रह सकते हैं। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में लंबे समय के बाद हुए चुनाव के बाद सरकार बनाने वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस भी यह दिखा रही है कि अभी उसका भविष्य काफी लंबा है और उसे इतने आसानी से खत्म नहीं किया जा सकेगा। दिल्ली हारने के बाद पंजाब में और तेज सक्रिय हुई AAP ने गोवा और गुजरात जैसे राज्यों पर अपना फोकस शिफ्ट किया है। गोवा और गुजरात में पिछले छोटी सफलता के दम पर AAP को भरोसा है कि वह आने वाले समय में पंजाब के साथ-साथ इन राज्यों में भी अपना विस्तार कर पाएगी।
मुश्किल में कौन है?
मायावती की BSP- सबसे ज्यादा खतरा इस समय बहुजन समाज पार्टी के सामने है। कभी उत्तर प्रदेश जैसे सूबे की सीएम रहकर प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब देखने वालीं मायावती की पार्टी के पास उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक विधायक है। राज्यसभा में सिर्फ एक सांसद है लेकिन 2026 में उसका भी कार्यकाल खत्म हो जाएगा। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों से गठबंधन के बावजूद BSP को सफलता नहीं मिल रही है और पार्टी काडर पस्त होता जा रहा है। आकाश आनंद की वापसी के बाद BSP नई ऊर्जा से भरे होने का दावा जरूर कर रही है लेकिन अभी यह दावा चुनावी परिणाम में नहीं दिख पा रहा है।
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शिरोमणि अकाली दल-2007 से 2017 तक लगातार 10 साल सरकार चलाने के बाद जब शिरोमणि अकाली दल को हार का सामना करना पड़ा तो उसे उम्मीद थी कि 2022 में वह वापसी कर लेगी। हालांकि, 2022 में AAP की एंट्री ने उसका खेल खराब कर दिया। किसान आंदोलन के चलते बीजेपी से गठबंधन टूटा और चुनाव दर चुनाव अकाली दल कमजोर होता गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 3 सीटों पर सिमटने के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में अकाली दल को सिर्फ 1 सीट पर जीत मिली। पार्टी में सुखबीर बादल का विरोध हुआ और उन्हें कुछ समय के लिए पार्टी के प्रधान का पद भी छोड़ना पड़ा। अब अकाली दल के सामने बड़ी चुनौती है कि वह कैसे भी करके खुद को 2027 के चुनाव में साबित करे। यही वजह है कि कुछ नेताओं ने फिर से बीजेपी से हाथ मिलाने की बात भी कहनी शुरू कर दी है।
नवीन पटनायक की BJD- 2024 में सत्ता से बाहर होने के बाद BJD पस्त होने लगी है। उम्र बढ़ने के चलते नवीन पटनायक बीमार रहने लगे हैं और पार्टी की सेकेंड लाइन लीडरशिप में से किसी एक का नाम तय नहीं है जो पार्टी को आगे बढ़ाए। वी के पांडियन के बारे में सुगबुगाहट थी लेकिन चुनाव के समय हुए विवादों के बाद से वह भी उतनी सक्रियता नहीं दिखा पा रहे हैं। पार्टी काडर के हौसते पस्त हैं और कई नेता तो पार्टी भी बदलने लगे हैं। ऐसे में 2029 के चुनाव तक पार्टी को बचाकर रख पाना ही अब नवीन पटनायक के लिए बड़ी चुनौती हो रहा है। दूसरी तरफ, इस स्पेस को भरने के लिए कांग्रेस लगातार मेहनत करती दिख रही है।
लालू यादव की RJD- बड़े वोटबैंक और सामाजिक समीकरण का दावा करने वाले राष्ट्रीय जनता दल 2025 के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त झटका लगा। 2020 में सरकार बनाने के करीब दिख रही RJD इस बार काफी पीछे रह गई। हालत यह है कि अब RJD के कई राज्यसभा सदस्यों को भी घर बैठना पड़ सकता है। पार्टी के अलावा लालू यादव के परिवार में भी कई तरह के विवाद चल रहे हैं। परिवार और पार्टी से निकाले जाने के बाद तेज प्रताप यादव अलग दल बना चुके हैं। रोहिणी आचार्य का मामला सामने आने के बाद बहनों ने भी घर छोड़ दिया है। राबड़ी देवी को पुराना सरकारी आवास खाली करना पड़ा है और इस सबके बीच तेजस्वी यादव विदेश चले गए हैं। ऐसे में RJD को बिहार में नए सिरे से काम करने और नया फॉर्मूला तलाशने की जरूरत है।
ममता बनर्जी की TMC- पश्चिम बंगाल बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती साबित हुआ है। 2021 में पूरा दमखम झोंकने के बावजूद बीजेपी सत्ता से काफी दूर रह गई। ममता बनर्जी ने एक बार फिर से अपना दम दिखाया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी की पार्टी ने बीजेपी को पटखनी दी और पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सीटें 18 से घटकर 12 पर आ गईं और TMC की सीटें 22 से 29 पर पहुंच गईं। हालांकि, इन सफलताओं के बावजूद ममता बनर्जी को बेहद सतर्क रहना होगा। लगभग 15 साल से सरकार चला रहीं ममता बनर्जी कई मुद्दों पर फंसती रही हैं। ऐसे में बीजेपी जैसी पार्टी के सामने उनकी मुश्किलें बढ़ना तय है।
इन दलों के अलावा कांग्रेस के सामने भी बड़ी चुनौती है। कांग्रेस के पास कर्नाटक है लेकिन वहां हर दिन सत्ता के लिए आपस में ही टकराव हो रहा है। हिमाचल प्रदेश में एक बार आपसी बगावत को जैसे-तैसे संभाला गया था। चुनावी राज्यों में केरल को लेकर कांग्रेस जरूर उत्साहित है लेकिन पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का विजन अभी भी क्लियर नहीं है। असम में कांग्रेस के सामने हिमंत बिस्व सरमा के रूप में बड़ी चुनौती है और तमिलनाडु में उसे डीएमके का ही सहारा है।
