पश्चिम बंगाल में अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनाव से पहले ममता बनर्जी सरकार ने साल 2026-27 के लिए एक अंतरिम बजट पेश किया है। यह बजट, भारतीय जनता पार्टी की योजनाओं के लिए चुनौती बनकर सामने आया है। इसे ममता बनर्जी का चुनावी मेनिफेस्टो कहा जा रहा है। पश्चिम बंगाल सरकार ने 5 फरवरी 2026 को विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 4.06 लाख करोड़ रुपये का अंतरिम बजट पेश किया। 

पश्चिम बंगाल का यह बजट आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आया है, जिसमें महिलाओं, युवाओं और फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को लक्षित कई बड़े ऐलान किए गए हैं। राज्य की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने इसे पेश करते हुए कहा कि यह लोगों के कल्याण पर केंद्रित है। ममता बनर्जी सरकार का यह बजट, कई मायनों में BJP के लिए चुनौती साबित होने वाला है। लोगों का कहना है कि ममता बनर्जी बजट नहीं, मेनिफेस्टो लेकर आईं हैं। 

यह भी पढ़ें: SIR को लेकर कोलकाता से दिल्ली नाप रहीं ममता बनर्जी, विपक्ष क्या कर रहा?

बंगाल का अंतिम बजट, ममता बनर्जी का मेनिफेस्टो कैसे?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल का अंतरिम बजट, ममता बनर्जी के लिए चुनावी मेनिफेस्टो जैसा नजर आ रहा है। यह बजट मुख्य रूप से महिलाओं, युवाओं और कर्मचारियों को लुभाने वाला है। उन्होंने लक्ष्मीर भंडार योजना में महिलाओं को मिलने वाली राशि बढ़ाई है, 21-40 साल के बेरोजगार युवाओं के लिए 'बांग्लार युवा साथी' स्कीम तहत मासिक भत्ता दिया है, सरकारी कर्मचारियों के DA में 4 प्रतिशत इजाफे का वादा किया है। 

ममता बनर्जी ने गिग वर्कर्स को स्वास्थ्य सुरक्षा, आशा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ाने का वादा किया है। विपक्षी राजनीतिक दलों का कहना है कि वह बजट में भी अपना चुनावी एजेंडा थोप रहीं हैं। यह बजट नहीं, मेनिफेस्टो है। विपक्ष इसे वोट-खरीद और तुष्टिकरण से जोड़कर देख रहा है। ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक विभाग को 5700 करोड़ रुपये आवंटिक करने का वादा किया है। 

यह भी पढ़ें: SIR का केस लड़ने SC पहुंचीं ममता बनर्जी, जोरदार बहस के बाद चुनाव आयोग को नोटिस

 

ममता बनर्जी की कोर वोटर, महिलाएं और अल्पसंख्यक रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने दोनों वर्गों को साधने की कोशिश की है। 

सुधांशु त्रिवेदी, प्रवक्ता, बीजेपी:-
पश्चिम बंगाल सरकार का बजट तुष्टीकरण और असंतुलित प्राथमिकताओं को दर्शा रहा है। सरकार ने अपने बजट में अल्पसंख्यक मामलों और मदरसों के लिए 5,700 करोड़ रुपये से अधिक आवंटित किए हैं, जबकि उद्योग और वाणिज्य के लिए केवल 1400 करोड़ रुपये ही रखे गए हैं। एक ओर देश विकास की नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है, जो हाल ही में प्रस्तुत केंद्रीय बजट में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वहीं, दूसरी ओर ममता बनर्जी सरकार के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल तुष्टीकरण की राजनीति में डूबता जा रहा है।

 

यह भी पढ़ें: RJD-कांग्रेस की गलती से ममता बनर्जी ने क्या सीखा? SIR प्लान से समझिए

 

वजहें जो बना रहीं ममता बनर्जी के बजट को चुनावी मेनिफेस्टो

  • लक्ष्मीर भंडार योजना: बीजेपी शासित राज्य, जैसे मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना या महाराष्ट्र की माझी लाड़की बहन योजना में महिलाओं को दी जाने वाली सीधी आर्थिक मदद ने सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। बीजेपी की इसी रणनीति को टक्कर देने के लिए ममता सरकार ने 'लक्ष्मीर भंडार' की योजना को और सशक्त बनाने का फैसला किया है। अब उन्होंने इस राशि में 500 रुपये की बढ़ोतरी की है। अब सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1500 रुपये और अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं को 1700 की आर्थिक सहायता दी जाएगी। 

  • रोजगार, कौशल विकास और बेरोजगारी भत्ता: बीजेपी अक्सर पश्चिम बंगाल सरकार को बेरोजगारी और उद्योगों की कमी के मुद्दे पर घेरती रही है। बीजेपी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल से उद्योग उजड़ रहे हैं। केंद्र सरकार की 'प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना' और राज्यों में इंटर्नशिप भत्तों के जवाब में पश्चिम बंगाल सरकार ने 'बंगला युवा साथी' योजना पेश की है। अब 21 से 40 वर्ष के बेरोजगार युवाओं को 1500 रुपये का मासिक भत्ता दिया जाएगा। इन युवाओं को नौकरी मिलने तक या अधिकतम पांच वर्ष की अवधि के लिए 1,500 रुपये का मासिक भत्ता मिलेगा। अगर तृणमूल कांग्रेस सत्ता में वापसी करती है तो यह योजना 15 योजना अगस्त से शुरू की जाएगी।

  • डबल इंजन vs सिंगल इंजन वाला दांव: बीजेपी 'डबल इंजन सरकार' का दावा करती है। बीजेपी का तर्क है कि अगर राज्य में बीजेपी की सरकार होगी तो केंद्रीय योजनाओं का लाभ, पश्चिम बंगाल को ज्यादा मिलेगा। ममता बनर्जी ने इसे अपनी स्वतंत्र छवि और 'कोरबो, लड़बो, जीतबो' वाले दांव से काटने की कोशिश की है। ममता बनर्जी का कहना है कि वह यहां की स्थानीय नेता हैं, बीजेपी बाहरी है। ममता बनर्जी ने बजट में आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सिविक वॉलंटियर्स के भत्तों में वृद्धि की है। यह उन फ्रंट लाइन वर्कर्स को साधने की कोशिश है जिन्हें बीजेपी अपना आधार बनाने का प्रयास करती रही है।

यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट में वकील बनकर खुद क्यों पेश हो रहीं हैं ममता बनर्जी?

  • डीए और सरकारी कर्मचारियों पर दांव: पश्चिम बंगाल में सरकारी कर्मचारी लंबे समय से केंद्रीय दर पर महंगाई भत्ते (DA) की मांग कर रहे हैं। बीजेपी ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। ममता बर्नर्जी ने बजट में 4 फीसदी डीए बढ़ोतरी की घोषणा की है। यह सीधे तौर पर कर्मचारियों की नाराजगी को कम करने के लिए ममता बनर्जी ने यह दांव चला है। बीजेपी के इस बड़े चुनावी मुद्दे को टीएमसी ने पहले ही साध लिया है। 

  • सामाजिक सुरक्षा का विस्तार: बीजेपी की आयुष्मान भारत योजना के मुकाबले राज्य की स्वास्थ्य साथी योजना पहले से मौजूद है। टीएमसी अपनी योजनाओं को बीजेपी के दावों से ज्यादा प्रभावी दिखा रही है। इस बजट में भी ममता बनर्जा ने वही दांव खेला है। 

  • आंगनवाड़ी और आशा वर्कर पर दांव: ममता बनर्जी सरकार ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायकों के भत्ते में 1,000 रुपये का इजाफा किया है। उनकी मृत्यु पर परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी प्रावधान है, जिसके लिए 280 करोड़ रुपये रखे गए हैं। आशा कार्यकर्ताओं को भी 1,000 रुपये अतिरिक्त मासिक मिलेंगे। नागरिक स्वयंसेवकों और 'ग्रीन पुलिस' कर्मियों के लिए 1,000 रुपये मासिक वेतन वृद्धि का ऐलान है। इसके लिए 150 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।