RJD-कांग्रेस की गलती से ममता बनर्जी ने क्या सीखा? SIR प्लान से समझिए
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, चुनावी मुद्दा है। यह मुद्दा बिहार में भारी पड़ा लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इसे अवसर की तरह देख रहीं हैं। ऐसा क्यों है, आइए समझते हैं।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। Photo Credit: PTI
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हैं। चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ उन्होंने अभियान छेड़ रखा है। दिल्ली स्थित बंग भवन के बाहर उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार, चुनाव आयोग के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल के वैध वोटरों को मृत घोषित कर रही है। उन्होंने चुनाव आयोग पर भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया है। वह मुखर होकर SIR के खिलाफ केंद्र को घेर रही हैं। ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में खुद SIR से जुड़ी याचिका पर अपने राज्य का पक्ष रखेंगी। कोर्ट में खुद बहस करने के लिए उतर रहीं हैं।
ममता बनर्जी, खुद एक वकील रहीं हैं। वह सुप्रीम कोर्ट में वकील के तौर पर पेश होने वाली पहली मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने कोर्ट से खुद को 'पार्टी इन पर्सन' के तौर पर पेश होने की इजाजत मांगी है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से चुनाव आयोग के इस SIR अभियान का विरोध कर रही है।
ममता बनर्जी का कहना है कि यह काम जल्दबाजी और पक्षपाती तरीके से हो रहा है, जिससे लाखों वैध वोटरों के नाम कट सकते हैं। वह चाहती हैं कि 2026 के विधानसभा चुनाव पुरानी 2024 वाली मतदाता सूची के आधार पर ही हों, न कि नई संशोधित सूची से। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिसमें चुनाव आयोग के 24 जून 2025 और 27 अक्टूबर 2025 के SIR से जुड़े सभी आदेशों को रद्द करने की मांग की गई है। ममता बनर्जी इस पैंतरे पर आगे बढ़ रही हैं, वहीं इंडिया ब्लॉक के सहयोगी दल, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस को इस राह पर चलकर नुकसान हुआ।
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क्यों सियासत के लिए मुनाफे का सौदा नहीं है SIR?
बिहार में जुलाई 2025 से SIR अभियान की प्रक्रिया चुनाव आयोग ने शुरू की थी। चुनाव नवंबर में हुए थे। तारीखों से बहुत पहले, जब बिहार के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का एलान हुआ को कांग्रेस, आरजेडी और वाम दलों ने मिलकर यह तय किया कि इसे सियासी मुद्दा बनाएंगे क्योंकि बिहार के लोगों से उनका वोटिंग अधिकार छीना जा रहा है।
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने बिहार में 'SIR' कैंपेन को 'वोट चोरी' अभियान का नाम दिया। राहुल गांधी ने 17 अगस्त 2025 से वोटर अधिकार यात्रा निकाल। बिहार के 20 से ज्यादा जिलों में 1300 किलोमीटर से ज्यादा यात्राएं की गईं। 1 सितंबर को इस यात्रा का समापन हुआ लेकिन इस यात्रा में पूरा विपक्ष एकजुट नजर आया।
सबने कहा कि बिहार के लोगों का नाम बाहर किया जा रहा है। सड़क से संसद तक, केंद्र सरकार को घेरने की योजना बनाई गई। इस प्रचार में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अखिलेश यादव, तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी महागठबंधन के पक्ष में चुनावी मैदान में उतरीं। विपक्ष की लामबंदी काम नहीं आई।
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विपक्ष ने अपनी जनसभाओं में कहा कि बिहार के लोगों का वोट चोरी किया जा रहा है। अल्पसंख्यक और प्रवासी मजदूरों के नाम काटे जा रहे हैं। जानबूझकर लोगों से उनका मत अधिकार छीना जा रही है। दिलचस्प बात यह है कि जब चुनाव आयोग ने आंकड़े जारी किए तो वोटरों की संख्या घट गई। SIR से पहले बिहार में 7.89 करोड़ मतदाता थे, जो अब घटकर 7.42 करोड़ रह गए। लिस्ट से करीब 47 लाख से 69 लाख नाम कटे, जबकि 18 लाख नए जुड़े।
जनता इस मुद्दे से कनेक्ट नहीं कर पाई। ड्राफ्ट लिस्ट 1 अगस्त को जारी हुई थी। बिहार की 243 विधानसभा सीटों के लिए 6 और 10 नवंबर को मतदान हुआ था। नतीजे 14 नवंबर को आए। प्रचंड बहुमत से एनडीए की जीत हुई थी। 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी आरजेडी, सिर्फ 25 सीट हासिल कर पाई। कांग्रेस सिर्फ 6 सीट पर सिमट गई। लेफ्ट का भी हाल बुरा रहा। कोई फायदा नहीं पहुंचा।
ममता की रणनीति कैसे है अलग?
पश्चिम बंगाल में SIR की शुरुआत 4 नवंबर से हुई। 16 दिसंबर को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित हुई थी। 19 जनवरी तक इस पर आपत्ति जताई जा सकती थी। 14 फरवरी को अंतिम सूची प्रकाशित होने वाली है। ममता बनर्जी का कहना है कि जिंदा लोगों को मुर्दा किया जा रहा है। मुर्दा लोगों को जिंदा। उनकी रणनीति, राष्ट्रीय जनता दल की रणनीति से बेहद अलग है।
ममता बनर्जी, जनता के लिए केंद्र से भिड़ने वाली छवि बना चुकी हैं। कांग्रेस और तेजस्वी यादव, बिहार में यह कनेक्ट बनाने में असफल रहे थे। वह सिर्फ चुनावी जनसभा में नजर आते हैं, ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री रहते हुए भी कार्यकर्ताओं जैसे तेवर रखती हैं। जब ईडी ने आईपैक के दफ्तरमें रेड डाली, ममता बनर्जी फ्रंट फुट पर उतरकर जमीन पर आ गईं। CBI के खिलाफ सड़क पर उतरती हैं। बीजेपी जिन मुद्दों पर घेरती है, ममता बनर्जी, जमीन पर उतरी नजर आती हैं।
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ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल:-
2 करोड़ों के नाम मिसमैच में डाल दिए गए हैं। हरियाणा, बिहार और महाराष्ट्र में तो धांधली से जीत गए लेकिन पश्चिम बंगाल में हमारा सगठन है। मैं चाहूं तो लाखों लोगों को लेकर दिल्ली आ जाऊं। बूथ ऑब्जर्वर और बूथ लेवर ऑफिसर भी आधिकारिक तौर पर पार्टी के लिए काम करते हैं। पूरे देश में राशन कार्ड, आधार कार्ड, होम कार्ड, रेंट कार्ड, निवासप्रमाण पत्र प्रमाणित है लेकिन पश्चिम बंगाल में नहीं है। BLO टेंट में रहने वाले, झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों के घर नहीं जाते हैं बोल देते हैं कि कोई नहीं है। संगठति तरीके से लोगों के नाम काटे जा रहे हैं।
BJP का बिहार वाला दांव, पश्चिम बंगाल में बेअसर
पश्चिम बंगाल में उनकी छवि, 'मां, माटी और मानुष' की राजनीति करने वाले स्थानीय नेता की है। सिंगूर हो या नंदीग्राम लेफ्ट की 34 साल की सरकार को विदा करने में उनकी यही छवि काम आई थी। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने बिहार में जिस जंगलराज का डर दिखाया था, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के पक्ष में ऐसा नहीं है।
कैसे बीजेपी को घेर रहीं हैं ममता बनर्जी?
ममता बनर्जी के पक्ष में सहानुभूति इसलिए भी है कि वह दावा कर रही हैं कि पश्चिम बंगाल में SIR की वजह से हर दिन 4 से 5 लोग मर रहे हैं। 114 से ज्यादा लोग अब तक मर चुके हैं। लोग परेशान हो रहे हैं, उनकी नागरिकता छीनी जा रही है, वोटिंग का हक छीना जा रहा है। ममता बनर्जी, अपने साथ 12 परिवारों के लोगों को लेकर भी पहुंची है, जो जिंदा हैं लेकिन चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर मृत घोषित किया है।
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समीकरण जो ममता बनर्जी के पक्ष में बैठ रहे हैं
पश्चिम बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है। 40 से ज्यादा विधानसभाएं ऐसी हैं, जहां मुस्लिम निर्णायक स्थिति में हैं। 100 सीटें करीब ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर, मजबूत हैं। टीएमसी पर बीजेपी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोप लगाती रही है। यही आबादी, ममता बनर्जी की कोर वोटर कही जाती है। दिलचस्प बात यह है कि SIR पर सबसे ज्यादा आपत्ति भी इसी समुदाय की है। वजह यह है कि बीजेपी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी पर अवैध घुसपैठियों को आश्रय देने का आरोप लगाती है।
बीजेपी यह भी आरोप लगाती है कि ममता बनर्जी, बांग्लादेशी मुस्लिमों को पश्चिम बंगाल में बसाती हैं, उन्हें वोटर के तौर पर दर्ज कराती हैं। जांच प्रक्रिया में कई बार आम मुस्लिमों को भी परेशान होना पड़ता है। ममता बनर्जी, इस सहानुभूति को बाखूबी भुनाना जानती हैं। जब-जब दिल्ली में पश्चिम बंगाल से आने वाले समुदायों पर सख्ती बरती गई, ममता बनर्जी विरोध में खड़ी हुईं।
पश्चिम बंगाल में चुनाव हों या न हों, ममता बनर्जी चुनावी मोड में ही जनता में सक्रिय रहती हैं। दीघा के जगन्नाथ मंदिर के बाद अब महाकाल मंदिर बनवाने का वादा किया है। वह एक तरफ अल्पसंख्यकों की पहली पसंद हैं, दूसरी तरफ, गरीब और मध्यम वर्ग की बहुसंख्यक आबादी को साधने की कोशिश भी करती रही हैं।
ममता बनर्जी का यही तेवर, पश्चिम बंगाल में उनके लिए सहानुभूति पैदा करती है। जहां कांग्रेस, आरजेडी जैसे दलों को बिहार में झटका लगा, ममता बनर्जी, सधे कदमों से अपने कोर वोटरों को अपने पक्ष में करने में जुट गईं हैं। कांग्रेस ने वोट चोरी का सिर्फ मुद्दा उठाया, ममता बनर्जी, उसके लिए सड़क, संसद और सुप्रीम कोर्ट तक, खुद लड़ रहीं हैं।
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