संजय सिंह, पटना: बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक महिला चिकित्सक के चेहरे से हिजाब हटाने को लेकर विवादों में घिर गए हैं। ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्रियों की सूची में शामिल अन्य लोगों का भी नाता विवादों से ना रहा हो। पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव, डॉ. जगन्नाथ मिश्र, बिंदेश्वरी दुबे और सतीश प्रसाद सिंह का नाता भी विवादों से रहा है। लालू प्रसाद यादव तो जेल तक गए और अक्सर अपने बयानों या हरकतों के चलते विवादों में रहे। भागवत झा आजाद भागलपुर दंगों की वजह से विवादों में फंसे तो बिंदेश्वरी प्रसाद दुबे के कार्यकाल में संथाल परगना में हुई हिंसक घटनाओं के चलते कांग्रेस ने उन्हें पद से ही हटा दिया।

 

मौजूदा सीएम नीतीश कुमार तो पिछले एक साल से विवादों में ही चल रहे हैं। कोई इसके पीछे उनकी बढ़ती उम्र बताता है तो कोई कह जाता है कि वह बीमार हैं। सार्वजनिक मंचों पर नीतीश कुमार ने कभी किसी के सिर पर गमला रख दिया तो कभी महिला प्रत्याशी को मंच पर माला पहना दी। इस बार तो वह एक महिला के चेहरे पर से नकाब हटाने के चलते विवादों में आ गए। 

 

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बेतुके बोल के कारण विवाद में आए लालू

 

लालू अटपटा बयान देने में माहिर माने जाते हैं। जब वu मुख्यमंत्री थे तब, उन्होंने सड़क को लेकर एक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि बिहार की सड़कें हेमामालिनी की गाल की तरह होंगी। इस बयान के बाद लालू के खिलाफ विरोधी दल के लोग आक्रामक हो गए थे। लालू के कार्यकाल में ही 'भूरा बाल साफ करो' का नारा दिया गया था। इसको लेकर भी वह विवादों में घिर गए थे। विभिन्न राजनीतिक दलों और अगड़ी जाति के लोगों ने इस नारे पर नाराजगी जताई थी। धीरे-धीरे अगड़ी जाति के लोग राष्ट्रीय जनता दल से कटने लगे थे। लालू का नाम चारा घोटाला में भी आया। हाई कोर्ट ने बिहार की बिगड़ती कानून व्यवस्था को लेकर यहां जंगलराज होने की टिप्पणी कर दी। चारा घोटाला में वह दोषी भी करार दिए गए। लालू की लोकप्रियता का ग्राफ यहीं से घटना शुरू हो गया। हाल के दिनों में बहू और बेटी को घर से निकाले जाने के मामले को लेकर भी लालू परिवार की खूब किरकिरी हुई। 

जगन्नाथ मिश्रा भी फंसे

 

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र के बड़े भाई ललित नारायण मिश्रा केंद्र में रेल मंत्री थे। कांग्रेस के वह कद्दावर नेता माने जाते थे। 1975 में समस्तीपुर में उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद डॉ जगन्नाथ मिश्रा को मुख्यमंत्री बना दिया गया। डॉ. जगन्नाथ मिश्रा ने 1982 में बिहार प्रेस विधेयक लाया था। जिसका पूरे प्रदेश में विरोध हुआ। वह इस विधेयक के जरिए मीडिया पर अंकुश लगाना चाहते थे। विरोध के बाद यह विधेयक वापस हुआ। उन्होंने अपने कार्यकाल में मुसलमानों को खुश करने के लिए उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दे दिया। इसको लेकर भी उनकी खूब आलोचना हुई। गुस्साए लोगों ने उन्हें मौलाना जगन्नाथ तक कहना शुरू कर दिया। 

 

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बिंदेश्वरी दुबे के कार्यकाल में अशांत रहा संथाल परगना 

 

बिंदेश्वरी दुबे का कार्यकाल भी विवादास्पद रहा। तब झारखंड का हिस्सा था। 1980 के दशक में संथाल परगना में हिंसा की घटनाएं हुई थी। कई लोग मारे गए थे। सरकार पर आरोप लगा था कि हिंसा को रोकने के लिए सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए। उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप मंत्रियों और अधिकारियों पर लगे। उनके ही पार्टी के कई विधायक सरकार के खिलाफ बगावत कर दी थी। अंततः कांग्रेस हाई कमान को बिंदेश्वरी दुबे को बदलना पड़ा। 

आजाद के माथे दंगे का कलंक

 

भागवत झा आजाद जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तब उनके माथे पर भागलपुर दंगे का कलंक लगा। आजाद की राजनीतिक की शुरुआत भागलपुर से ही हुई और भागलपुर दंगे के बाद उनका राजनीतिक अंत भी हो गया। भागलपुर में वर्ष 1989 में दंगा हुआ था। जिसमें 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। विवाद तब शुरू हुआ, जब दंगे के दौरान एसपी केएस द्विवेदी का तबादला कर दिया। तबादले को रोकने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को हस्तक्षेप करना पड़ा था। दंगे के कारण मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद की कुर्सी चली गई थी। हालांकि, आजाद कुशल प्रशासक माने जाते थे। 

 

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पांच दिन का मुख्यमंत्री 

 

सतीश प्रसाद सिंह को 1968 में पांच दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनाया गया था। वह पिछड़े वर्ग से आने वाले बिहार के पहले मुख्यमंत्री थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में ऐसे-ऐसे फैसले लिए जिनको लेकर उनकी जमकर राजनीतिक आलोचना हुई। इस आलोचना की वजह से उनका राजनीतिक ग्राफ भी दिन-ब-दिन गिरता चला गया। ऐसी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि नीतीश कुमार ऐसे अकेले मुख्यमंत्री नही हैं, जिनका नाता विवादों से रहा है।