संजय सिंह, पटना। बिहार में नई सरकार बनने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा किसी जातीय समीकरण की नहीं, बल्कि ‘परिवार कनेक्शन’ की हो रही है। सत्ता के इस नए समीकरण में एक साथ कई ऐसे चेहरे शामिल हुए हैं, जिनकी राजनीतिक पहचान उनकी पारिवारिक विरासत से जुड़ी रही है। खास बात यह रही कि पहली बार बिहार की कैबिनेट में तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे एक साथ मंत्री बने हैं। इसके साथ ही सांसदों के बेटे, पूर्व सांसद की पत्नी और बड़े राजनीतिक परिवारों से जुड़े नेताओं की मौजूदगी ने वंशवाद बनाम योग्यता की बहस छेड़ दी है।
जब बीजेपी नेता सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने थे, तभी विपक्ष ने उन पर राजनीतिक विरासत को लेकर तंज कसा था। सम्राट चौधरी पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी के बेटे हैं। उस समय बीजेपी और सहयोगी दलों ने इसे अनुभव और राजनीतिक संघर्ष का परिणाम बताया था। अब मंत्रिमंडल विस्तार के बाद यह मुद्दा और बड़ा हो गया है।
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पहली बार एक साथ तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे बने मंत्री
नई कैबिनेट में सबसे ज्यादा चर्चा उन नामों की रही है, जिनका संबंध बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों से है। नीतीश मिश्रा, दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के बेटे हैं। वह पहले भी मंत्री रह चुके हैं और एक बार फिर कैबिनेट में शामिल किए गए हैं।
संतोष कुमार सुमन, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे हैं। मांझी फिलहाल केंद्र सरकार में मंत्री हैं और महादलित राजनीति में उनका प्रभाव लगातार मजबूत माना जाता है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम निशांत कुमार का रहा। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत ने पहली बार मंत्री पद की शपथ लेकर राजनीति में औपचारिक एंट्री कर ली है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार की राजनीति में यह एक प्रतीकात्मक बदलाव है, जहां नई पीढ़ी को सीधे सत्ता में उतारने की रणनीति साफ दिखाई दे रही है।
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उपेंद्र कुशवाहा के बेटे भी बने मंत्री
पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को भी मंत्री बनाया गया है। पिछली बार भी उनके मंत्री बनने पर परिवारवाद को लेकर सवाल उठे थे। दिलचस्प बात यह है कि निशांत कुमार और दीपक प्रकाश अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। ऐसे में दोनों के लिए विधान परिषद का रास्ता खुला माना जा रहा है।
सांसद परिवारों की भी मजबूत मौजूदगी
नई कैबिनेट में कई ऐसे चेहरे भी हैं, जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि सीधे बड़े राजनीतिक परिवारों से जुड़ी है। अशोक चौधरी, पूर्व मंत्री महावीर चौधरी के बेटे हैं। अब उनकी बेटी भी सांसद हैं, जिससे यह परिवार बिहार की राजनीति में लगातार प्रभावशाली बना हुआ है। श्रेयसी सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह की बेटी हैं। अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज के रूप में पहचान बनाने के बाद उन्होंने राजनीति में भी मजबूत जगह बनाई है। रमा निषाद भी पूर्व सांसद परिवार से आती हैं। वह एक पूर्व सांसद की पत्नी और पूर्व केंद्रीय मंत्री परिवार की बहू हैं।
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लेशी सिंह का उदाहरण अलग
राजनीतिक गलियारों में लेशी सिंह का नाम भी चर्चा में है, हालांकि उनका मामला थोड़ा अलग माना जा रहा है। उनके पति की चुनावी हार के बाद उन्होंने राजनीति संभाली थी। इसके बाद उन्होंने जनता के बीच खुद का मजबूत आधार बनाया और चुनाव जीतकर अपनी अलग पहचान स्थापित की। इसी वजह से जानकार मानते हैं कि उन्हें केवल वंशवाद के दायरे में रखना सही नहीं होगा।
परिवारवाद या राजनीतिक अनुभव?
बिहार की राजनीति में परिवारवाद कोई नया विषय नहीं है। इस बार खास बात यह है कि जिन दलों ने लंबे समय तक वंशवाद के खिलाफ राजनीति की थी, उन्हीं दलों के भीतर अब राजनीतिक परिवारों की नई पीढ़ी तेजी से उभर रही है। समर्थकों का तर्क है कि राजनीतिक परिवार से आने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अयोग्य है। वहीं विरोधियों का कहना है कि इससे जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं।फिलहाल इतना तय है कि बिहार की नई कैबिनेट सिर्फ सत्ता संतुलन के लिए नहीं, बल्कि परिवार बनाम प्रतिभा की नई बहस के लिए भी लंबे समय तक याद की जाएगी।
