पंजाब की राजनीति में जाट सिख और दलित दो जातियों की संख्या ज्यादा है। कांग्रेस ने 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर दलित समुदाय से आने वाले चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया था। यह पहली बार था जब कोई दलित पंजाब के सर्वोच्च पद तक पहुंचा हो। कांग्रेस के इस कदम को कई लोग मास्टरस्ट्रोक बता रहे थे। 2022 चुनाव में कांग्रेस का यह कथित मास्टरस्ट्रोक बुरी तरह असफल रहा और चन्नी खुद अपनी दोनों सीटें हार गए। कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई। 

 

2022 की करारी हार के बाद कांग्रेस ने अपना कुनबा संभाला और 2024 के लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया। इसके बाद अब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और राज्य में जातिय राजनीति चर्चा में बनी हुई है। पूर्व सीएम चन्नी ने अपनी ही पार्टी पर सवाल खड़े कर दिए। चन्नी ने पार्टी कार्यकर्ताओं की एक मीटिंग में कहा कि पंजाब कांग्रेस के बड़े पदों पर अपर कास्ट लोग बैठे हैं। उन्होंने सवाल किया कि अगर सारे पद अपर कास्ट को ही मिल जाएंगे तो हम (दलित) कहां जाएंगे। इसके बाद एक बार फिर पंजाब में जाति की राजनीति चर्चा में है। वहीं, कांग्रेस पार्टी के अंदर भी बवाल मचा हुआ है और पार्टी की जमकर फजीहत हो रही है। 

 

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किस धर्म की कितनी आबादी?

2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब में सबसे ज्यादा आबादी सिख समुदाय की है और इसके बाद दूसरी बड़ी आबादी हिंदुओं की है।

 

हिंदू- 38.49%
मुस्लिम- 1.93%
ईसाई- 1.26%
सिख- 57.69%
बोद्ध-0.12%
जैन- 0.16%
अन्य-0.04%

जाति के आंकड़े

अनुसूचित जाति (SC)- 31.9%
OBC- 31.3%
जनरल - 33 प्रतिशत
धार्मिक अन्य अल्पसंख्यक-3.8 %

दलित समुदाय

सिख- 33.68%
हिंदू- 32.23%
बोद्ध- 82.40%

बिखरा दलित समुदाय

पंजाब की राजनीति में दलितों की संख्या अन्य जातिय समूहों की तुलना में ज्यादा है। 2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब में 31.9% दलित हैं। किसी भी भारतीय राज्य में यह सबसे ज्यादा दलित आबादी है। दलित पहले तो हिंदू और सिख दोनों धर्मों में बंटे हुए हैं यानी हिंदू दलित और सिख दलित। मजहबी रविदासिया या रामदासिया, आद-धर्मी, बाल्मीकि दलितों में प्रमुख हैं। पंजाब में कुल 39 जातियों को अनुसूचित जातियों का दर्जा दिया गया है। पंजाब के 18 जिलों में अनुसूचित जातियों की आबादी 25 फीसदी से ज्यादा है और 34 विधानसभा की सीटें इनके लिए आरक्षित हैं। आबादी में ज्यादा होने के कारण भी दलित पंजाब की राजनीति में फ्रंट पर नहीं रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण दलितों बिखराव है। अलग-अलग अनुसूचित जातियों का वोटिंग पैटर्न अलगग-अलग रहा है।

 

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पंजाब में कौन कितना ताकतवर?

कांग्रेस के बीच जट्ट सिख यानी अपर कास्ट और दलित की लड़ाई के बीच पंजाब का जातिय समीकरण चर्चा में है। आखिर ऐसा क्या है कि जिस पंजाब की धरती से दलित आंदोलन का जन्म हुआ उसी पंजाब में दलित बड़ी ताकत होने के बावजूद कभी मजबूत नहीं हो पाए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पंजाब में जहां सिख दलित और हिंदू दलितों में बंटी हुई है वहां सिख और हिंदू दलितों के बीच भी कई समाज हैं और हर समाज अपनी अलग-अलग विचारधारा रखते हैं। 

 

इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट एंड कम्यूनिकेशन के निदेशक डॉक्टर प्रमोद कुमार ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा था, 'पंजाब में प्रतिशत के हिसाब से देखें तो दलित एक बहुत बड़ा वर्ग जरूर हैं लेकिन सामाजिक तौर पर नहीं। सिख धर्म ,आर्य समाज के आने बाद जातीय जड़ें पंजाब में काफी कमजोर हुई हैं।'

 

दलित पंजाब में बिखरे हुए हैं लेकिन जट्ट सिख समुदाय राजनीतिक रूप से और आर्थिक रूप से पंजाब में बहुत ज्यादा ताकतवर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पंजाब में जट्ट सिखों की आबादी 25 प्रतिशत है। जट्ट सिख सिर्फ 25 प्रतिशत जरूर हैं लेकिन पंजाब की 93 प्रतिशत जमीनें इसी समुदाय के पास हैं। अकाली दल हो या कांग्रेस हर एक पार्टी में जट्ट सिखों का बोलबाला रहा है। अब तक पंजाब में ज्यादातर सीएम जट्ट सिख समुदाय से ही रहे हैं। पंजाब कांग्रेस हो या कोई अन्य पार्टी बड़े पदों पर ज्यादातर जट्ट सिख चेहरे ही हैं। ऐसे में पूर्व सीएम चन्नी ने पार्टी में दलितों के कम नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए तो दलित राजनीति एक बार फिर चर्चा में आ गई।