संजय सिंह, पटना। बिहार में सरकारी आवास को लेकर छिड़े राजनीतिक विवाद के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ऐसा बयान दिया है, जिसे सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि सत्ता और सार्वजनिक जीवन के प्रति अपनी सोच का सार्वजनिक संदेश माना जा रहा है। शेखपुरा में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि उन्हें न तो कुर्सी से मोह है और न ही सरकारी बंगले से। जिस दिन पार्टी नेतृत्व यह तय कर देगा कि उनकी जिम्मेदारी समाप्त हो गई है, वह 24 घंटे के भीतर सरकारी आवास खाली कर अपने निजी घर चले जाएंगे।

 

मुख्यमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार की राजनीति में सरकारी आवासों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सरकारी सुविधाओं के उपयोग को लेकर लगातार बयानबाजी हो रही है। ऐसे माहौल में सम्राट चौधरी ने अपने संबोधन के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की कि लोकतंत्र में पद और सुविधाएं स्थायी नहीं होतीं, बल्कि जनता की सेवा ही किसी जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।

 

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यह मुख्यमंत्री का नहीं, लोकसेवक का आवास है

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने कहा कि जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद सरकारी आवास में प्रवेश किया था, तब अधिकारियों से स्पष्ट कहा था कि यह भवन किसी व्यक्ति विशेष का घर नहीं बल्कि जनता की सेवा का केंद्र है। उन्होंने कहा कि आवास के बाहर यह लिखा जाना चाहिए कि यह 'लोकसेवक का आवास' है, ताकि लोगों को यह संदेश मिले कि यहां रहने वाला व्यक्ति जनता का सेवक है, मालिक नहीं।

 

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां सत्ता और सरकारी संसाधन किसी व्यक्ति की बपौती नहीं होती। जनता के विश्वास से पद मिलता है और समय आने पर उसे छोड़ना भी पड़ता है। जो लोग सरकारी संपत्तियों को निजी अधिकार समझने लगते हैं, वे लोकतांत्रिक मूल्यों की भावना को कमजोर करते हैं।

राजनीतिक जीवन के अनुभवों का किया उल्लेख

मुख्यमंत्री ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। मंत्री, उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री जैसे अहम पदों पर रहने के बावजूद उन्होंने कभी सरकारी आवास को प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं माना। उन्होंने कहा कि राजनीति में अब तक वह कई सरकारी आवासों में रह चुके हैं और वर्तमान आवास उनके जीवन का ग्यारहवां सरकारी आवास है।

 

सम्राट चौधरी ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति हर बार पद बदलने पर नया सरकारी आवास ले सकता है और समय आने पर उसे छोड़ सकता है, तो फिर किसी एक बंगले के प्रति विशेष मोह रखने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि राजनीति सेवा का माध्यम है, संपत्ति संग्रह का नहीं।

 

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बिना नाम लिए विपक्ष पर तीखा तंज

मुख्यमंत्री के भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा वह रहा, जब उन्होंने बिना किसी नेता का नाम लिए विपक्ष पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कुछ नेताओं की राजनीति जनता की समस्याओं से ज्यादा सरकारी घरों के इर्द-गिर्द घूमती है। ऐसे लोगों को विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा चिंता इस बात की रहती है कि कौन किस बंगले में रहेगा। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि कुछ परिवारों को बेटे के लिए अलग घर चाहिए, परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए अलग व्यवस्था चाहिए और सरकारी सुविधाओं को वे अपने अधिकार की तरह देखते हैं। जबकि उनकी सरकार का मानना है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग जनता की सेवा और प्रशासनिक जरूरतों के लिए होना चाहिए।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री का यह बयान हाल के दिनों में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के सरकारी आवास को लेकर उठे विवाद की पृष्ठभूमि में आया है। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके संकेतों को विपक्ष की ओर सीधा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।

जनता का विश्वास सबसे बड़ा पद

सम्राट चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च शक्ति होती है। कोई भी जनप्रतिनिधि जनता के भरोसे से ही पद पर पहुंचता है और उसी जनता के प्रति जवाबदेह भी रहता है। इसलिए किसी नेता की पहचान उसके सरकारी बंगले, सुरक्षा व्यवस्था या सरकारी सुविधाओं से नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता और कामकाज से तय होती है। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता ने विकास और सुशासन के लिए जनादेश दिया है और उनकी सरकार उसी दिशा में काम कर रही है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार का लक्ष्य राजनीतिक विवादों में उलझना नहीं बल्कि राज्य को विकास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना है।

सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना बयान

मुख्यमंत्री का यह बयान अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर इसे सत्ता पक्ष की ओर से सादगी और जवाबदेही का संदेश माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे राजनीतिक हमला करार दे सकता है। लेकिन इतना तय है कि सरकारी आवास विवाद के बीच सम्राट चौधरी ने अपने बयान से यह स्पष्ट संकेत देने की कोशिश की है कि सत्ता में रहने का अर्थ सरकारी सुविधाओं से चिपके रहना नहीं, बल्कि जनता की सेवा करना है।

 

शेखपुरा की सभा से दिया गया उनका यह संदेश आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे सकता है। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन के जरिए यह बताने का प्रयास किया कि लोकतंत्र में सरकारी बंगले बदलते रहते हैं, लेकिन जनता का विश्वास और जनसेवा का दायित्व ही किसी नेता की सबसे बड़ी पूंजी होती है।