आने वाले समय में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में चुनाव हैं। कांग्रेस पार्टी गुजरात और उत्तराखंड में कई दशकों से सत्ता से बाहर है। वहीं, उत्तराखंड और पंजाब में वह वापसी की राह देख रही है। ये चारों राज्य कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण हैं लेकिन आखिरी वक्त में कांग्रेस कुछ ऐसे बदलाव करती दिख रही है, जो उस पर भारी पड़ सकते हैं। 2022 में पंजाब में कांग्रेस ने आखिरी वक्त में बदलाव किए थे और उसे ये बदलाव भारी पड़े थे। इसके इतर कांग्रेस ने केरल में आखिरी वक्त में कोई बदलाव नहीं किया और उसे जीत मिली। इसके बावजूद ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब में कांग्रेस अपने संगठन में बदलाव करके ही रहेगी।
पंजाब को लेकर पिछले कई दिनों से लगातार बैठकों का दौर जारी है। चर्चा है कि पंजाब कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को हटाकर किसी दूसरे नेता को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है। इस बदलाव की चर्चा ऐसे वक्त में हो रही है जब आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल बार-बार कह रहे हैं कि चुनाव दो-तीन महीने पहले हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो नए अध्यक्ष को 4-5 महीने का ही समय मिलेगा। चुनाव समय पर भी होते हैं तो नए अध्यक्ष के सामने एक साल से भी कम समय मिल सकता है।
UP में बदलाव करके फंसेगी कांग्रेस?
2022 में कांग्रेस की चुनावी हार के कुछ महीने बाद अनिवाश पांडे को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया था। 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद अजय राय उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। अब चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने दिल्ली के विधायक रहे राजेंद्र पाल गौतम को अविनाश पांडे की जगह प्रभारी बना दिया है। वहीं, चर्चा है कि अजय राय की जगह नया अध्यक्ष भी बनाया जा सकता है। लंबे समय से गठबंधन सहयोगियों से समन्वय बना रहे इन नेताओं को चुनावी साल में हटाने के चलते भ्रम की स्थिति बन गई है। रोचक बात है कि उन्हीं राजेंद्र गौतम को प्रभारी बनाया गया है जो कुछ दिन पहले अचानक मायावती के घर पहुंच गए थे और कांग्रेस ने उन्हें नोटिस जारी कर दिया गया था।
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अब अगर नया अध्यक्ष भी बनाया जाता है तो कांग्रेस अपनी रणनीति को लेकर फंस सकती है। पहले ही कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच स्थिति सहज नहीं है। इमरान मसूद जैसे नेता पहले ही 100 से 170 सीटों की बात कर रहे हैं और राजेंद्र गौतम ने आते ही आधी सीटों की बात करके गठबंधन की बात को और उलझाने जैसी बात कर दी है। दूसरी तरफ, अखिलेश यादव अभी भी बार-बार दोहरा रहे हैं कि उनका गठबंधन कांग्रेस के साथ है और दोनों साथ ही चुनाव लड़ेंगे। हालांकि, दोनों दलों के बीच सहज स्थिति नहीं दिख रही है। इसकी वजह है कि सपा अधिकतम 60 सीटें देने को ही तैयार है लेकिन कांग्रेस के नेता 100 से तो शुरुआत कर रहे हैं।
अब इस स्थिति में नए अध्यक्ष, नए प्रभारी और नई टीम की एंट्री मामले को और भी उलझा सकती है। रोचक बात है कि राजेंद्र गौतम शुरुआत से ही समाजवादी पार्टी के बजाय बहुजन समाज पार्टी (BSP) की ओर रुझान रखते हैं। इससे उन चर्चाओं को और हवा मिल रही है कि कांग्रेस फिर से दोहरी राय लेकर चल रही है। उसके कुछ नेता सपा के साथ ही चुनाव लड़ना चाहते हैं, वहीं कुछ नेता बसपा और अन्य छोटे दलों के साथ जाकर एक नया गठबंधन बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं।
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कुल मिलाकर कांग्रेस की स्थिति बिहार जैसी बनती दिख रही है। ठीक इसी तरह कांग्रेस ने बिहार में भी अपना प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष आखिरी वक्त में बदला था और इसका खामियाजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ा था। तब बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाए गए अखिलेश प्रसाद सिंह अब खुलेआम कह रहे हैं कि अगर वह अध्यक्ष रहते तो बिहार में कांग्रेस की इतनी बुरी स्थिति नहीं होती। अखिलेश प्रसाद भी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के साथ मिलजुलकर काम करने वाले नेता थे जबकि कृष्णा अलावरू को प्रभारी बनाते ही कांग्रेस और आरजेडी के बीच तकरार शुरू हो गई थी और आखिर तक सीटों का समीकरण नहीं सुलझा।
पंजाब में आपस में ही लड़ती रह जाएगी कांग्रेस?
कमोबेश ऐसी ही स्थिति पंजाब में दिख रही है। 2022 के चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। लोकसभा चुनाव में उनकी अगुवाई में कांग्रेस को फायदा हुआ और वह 7 सीटें जीतने में कामयाब भी हुई। अब चर्चा है कि आखिरी वक्त में उन्हें भी बदला जा सकता है। यह सब तब हो रहा है जब आम आदमी पार्टी चुनावी मोड में है और नया अध्यक्ष नियुक्त करके भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) भी पूरी तरह से सक्रिय हो चुकी है। वहीं, कांग्रेस में अभी भी माथापच्ची जारी है कि राजा वड़िंग को हटाना है कि नहीं।
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इसका नतीजा यह हो रहा है कि कांग्रेस का काडर अपनी तैयारी करने के बजाय इसी ओर नजरें गड़ाए बैठा है। इसके उलट उसके प्रमुख विरोधी दल अपने-अपने चुनावी अभियान को धार देने में जुटे हुए हैं।
इस मामले में कांग्रेस को अपने केरल जैसे राज्यों से सीख लेने की जरूरत है। केरल में नेता प्रतिपक्ष वीडी सतीशन थे, सन्नी जोसेफ को चुनाव से लगभग एक साल पहले अध्यक्ष बना दिया गया था और आखिरी में पार्टी पूरी तरह से एकुजट हो गई थी। इसका नतीजा उसे मिला और वह चुनाव जीतकर 10 साल बाद सत्ता में आ गई। इसके उलट, बिहार, तमिलनाडु और असम में कांग्रेस ने आखिर में बदलाव किया और ये बदलाव उस पर भारी पड़े।


