पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। राजनीतिक पार्टियां राज्य के प्रभावशाली नॉन-रेजिडेंट इंडियन (NRI) समुदाय से जुड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। NRI अफेयर्स मंत्री डॉ. रवजोत सिंह ने मोहाली में 'NRI मिलनी-2026' कार्यक्रम के दौरान विदेशी पंजाबियों को आश्वासन दिया कि सरकार उनके शिकायतों को पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से हल करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही अन्य राजनीतिक दल भी इस समुदाय के प्रभावशाली लोगों से मिलकर काम कर रहे हैं और उनको अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। एनआरआई पंजाब में रहते नहीं हैं और ज्यादातर तो वोट करने भी नहीं आते हैं फिर पंजाब की राजनीति में वह इतने अहम क्यों हैं? यह प्रश्न हर किसी के मन में है।
पंजाब में एनआरआई की संख्या वोटरों के मुकाबले बहुत अधिक नहीं है, लेकिन चुनाव के दौरान उनकी भूमिका काफी अहम मानी जाती है। राजनीतिक दलों का मानना है कि विदेश में रहने वाले पंजाबी अपने परिवार, रिश्तेदारों और सोशल कनेक्शन के जरिए चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि चुनाव से पहले लगभग सभी प्रमुख दल एनआरआई समुदाय से लगातार संपर्क बनाए रखते हैं।
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कैसे डालते हैं प्रभाव?
NRI पंजाब में बड़े वोट बैंक नहीं हैं, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव मतदान से कहीं आगे तक जाता है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, एनआरआई का प्रभाव केवल मतदान तक सीमित नहीं माना जाता। विदेशों में रहने वाले कई पंजाबी अपने परिवारों के संपर्क में रहते हैं। इसके अलावा सामाजिक पहचान, आर्थिक सहयोग और चुनाव प्रचार में मदद जैसे कारणों से भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही वजह है कि चुनाव से पहले राजनीतिक दल एनआरआई समुदाय के बीच अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करते हैं।
दोआबा, माझा और मालवा इलाकों में राजनीतिक पार्टियां जानती हैं कि विदेश में बसे परिवार के सदस्यों की राय घर पर वोटिंग फैसलों को प्रभावित करती है। विदेशी पंजाबी अपने मूल गांवों और क्षेत्रों की घटनाओं पर गहरी नजर रखते हैं और परिवार और सोशल नेटवर्क में ओपिनियन मेकर की भूमिका निभाते हैं। चुनाव के समय यह ओपिनियन मेकर किसी भी पार्टी के पक्ष में या विरोध में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
आम आदमी पार्टी को मिला था समर्थन
आम आदमी पार्टी (AAP) ने शुरूआत में दिल्ली में सरकार बनाई और इसके बाद पार्टी ने पंजाब में संगठन का विस्तार किया। 2017 में जब पार्टी ने अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा तो उसमें डायस्पोरा का प्रभाव साफ दिखा। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में NRI ने AAP को कैंपेनिंग, फंडरेजिंग और डिजिटल मोबिलाइजेशन के जरिए सक्रिय समर्थन दिया था। इससे AAP की छवि पारंपरिक राजनीतिक ताकतों के विकल्प के रूप में मजबूत हुई।
हालांकि, विदेशी में रह रहे पंजाबियों का समर्थन किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है। कांग्रेस को लंबे समय से विदेश से जुड़े परिवारों का समर्थन मिलता रहा है। शिरोमणि अकाली दल का प्रभाव सिख धार्मिक संस्थाओं और पंथिक राजनीति से जुड़े वर्गों में है। कनाडा जैसे देशों से अकाली दल को काफी समर्थन मिलता आया है।
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आगमी चुनाव से पहले बढ़ी सक्रियता
पंजाब में चुनाव से पहले अक्सर सरकार और राजनीतिक दल एनआरआई समुदाय के साथ बैठकें, कार्यक्रम और संवाद आयोजित करते रहे हैं। इसी कड़ी में इस बार भी NRI मिलनी-2026 का आयोजन किया गया, जिसमें विदेश में रहने वाले पंजाबियों की शिकायतों के समाधान और उनसे जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। 'द ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के अनुसार, पहले चुनाव से पहले बड़े स्तर पर NRI मिलनी और एनआरआई से फीडबैक लेने की पहल होती थी। हालांकि, अब ऐसे कार्यक्रम पहले की तुलना में कम दिखाई दे रहे हैं।
हाल के वर्षों में गैंगस्टर और वसूली से जुड़े मामलों के कारण कई एनआरआई खुद भी सार्वजनिक रूप से ज्यादा सक्रिय रहने से बचते हैं। कई लोग अपने कारोबार और प्रतिष्ठानों को अनावश्यक चर्चा से दूर रखना चाहते हैं। हालांकि, बैक़ॉर वह चुनावी नैरेटिव सेट करने में भूमिका निभाते हैं।
पंजाब के बड़ी संख्या में परिवारों के सदस्य विदेशों में रहते हैं। ऐसे में एनआरआई अपने गांव, शहर और परिवारों से लगातार जुड़े रहते हैं। राजनीतिक दल भी इसी संपर्क को देखते हुए चुनाव से पहले उनके बीच अपनी बात पहुंचाने की कोशिश करते हैं। पंजाब में NRI के मुद्दे कई बार चर्चा का विषय रहे हैं। NRI मामलों के मंत्री डॉ. रवजोत सिंह ने कहा कि सरकार विदेश में रहने वाले पंजाबियों की शिकायतों का पारदर्शी, निष्पक्ष और तय समय के भीतर समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है। आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव में NRI समुदाय अहम भूमिका निभा सकता है।


