ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (AIADMK) से निष्कासित दिग्गज नेता ओ. पन्नीरसेल्वम ने द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) के अध्यक्ष एमके स्टालिन की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली है। DMK मुख्यालय जाते वक्त, उनकी कार में जयललिता की तस्वीर नजर आई। एक जमाने में वह जे जयललिता के सबसे करीबी नेताओं में शुमार रहे हैं। उनकी सरकार में मंत्री रहे। 

ओ. पन्नीरसेल्वम, तमिनलाडु के मुख्यमंत्री रहे हैं। साल 2022 में पार्टी विरोधी गतिविधियों को वजह से उन्हें AIADMK ने निकाल दिया था। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने चुनाव लड़ा लेकिन जीत नहीं मिली। अब यह माना जा रहा कि अपनी सियासत बचाने के लिए वह DMK में शामिल हुए हैं। 

बीते कुछ महीनों में उन्होंने स्टालिन से कई बार मुलाकात की थी और AIADMK के मौजूदा नेता एडप्पादी के. पलानीस्वामी के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी। ओ. पन्नीरसेल्वम के समर्थक भी उनके साथ DMK में आए। कुछ विधायकों ने पहले ही इस्तीफा देकर DMK में अपनी जगह बना ली थी। 

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पन्नीरसेल्वम के आने से DMK को क्या मिलेगा?

ओ पनीरसेल्वम, मुक्कुलाथोर समुदाय से आते है। यह थेवर समुदाय का हिस्सा है। यह दक्षिणी तमिलनाडु का एक मजबूत समुदाय है। अब उनके साथ आने से DMK को फायदा हो सकता है। तमिलनाडु में इस समुदाय के पास OBC स्टेटस है। 

अब आगे क्या?

 ओ पनीरसेल्वम ने कहा था कि DMK सत्ता बरकरार रख सकती है और उन्होंने अमित शाह से भी बात की थी कि मजबूत DMK गठबंधन जीतेगा। यह कदम AIADMK को कमजोर कर सकता है। वह जयललिता के समय से पार्टी में कई अहम पदों पर थे। DMK उनके आने से मजबूत स्थिति में दिख रही है।

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कौन हैं पनीरसेल्वम?

नीरसेल्वम AIADMK के कोषाध्यक्ष और पार्टी समन्वयक जैसे बड़े पदों पर रह चुके हैं। वह अपने बेटे पी रवींद्रनाथ कुमार और समर्थकों के साथ डीएमके में शामिल हो गए। पन्नीरसेल्वम ने 2006 में DMK के नेतृत्व वाली सरकार में रहे। वह विपक्ष के नेता भी रहा।

DMK में आए AIADMK नेताओं का क्या होता है?

  • एस. मुथुसामी:    एक जमाने में जयललिता के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शुमार रहे। उन्होंने AIADMK से अनबन के बात पार्टी छोड़ी और DMK सरकार में आवास और शहरी विकास मंत्री बने। वह 9 बार के विधायक रहे हैं। साल 1977 में उन्होंने पहला चुनाव AIADM से लड़ा था। वह MGR सरकार में भी मंत्री रहे, फिर जयललिता सरकार में भी। साल 2010 में उन्होने DMK में शामिल होने का फैसला लिया। अभी वह स्टालिन सरकार में मंत्री हैं। 

  • EV वेलु: स्टालिन सरकार में लोक निर्माण मंत्री है। वह AIADMK नेता हैं। साल 2021 से ही वह यह विभाग संभाल रहे है। उन्होंने एम करुणानिधि सरकार में खाद्य मंत्री रहे हैं। साल 1984 से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई थी। 1997 में वह DMK में शामिल हुए। पार्टी में मजबूत स्थिति में बने हुए हैं।  

  • अनिता आर राधाकृष्णन: राजनीति की शुरुआत साल 2001 से हुई। त्रुचेंद्र विधानसभा से उन्होंने पहली बार 2001 में चुनाव लड़ा। 2006 तक वह डीएमके में रहे, फिर साल 2009, 2011, 2016 में DMK से चुनाव लड़ा। 2001 में DMK ने उन्हें शहरी विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी दी थी। अनबन हुई, DMK में चले गए। अभी पशु मंत्रालय संभाल रहे है। 

  • आर. राजकन्नप्पन: साल 1991 में पहली बार AIADMK से चुनाव लड़ा। उन्हें 1991 में मंत्रालय भी मिला। उन्होंने मक्कल तमिल देशम (MTD) पार्टी बनाई। 2001 में डीएमके साथ वह गठबंधन में चुनाव लड़ गए। 2006 तक वह शामिल भी हो गए। 2009 में एक बार फिर अनबन हुई तो DMK छोड़कर AIADMK में चले गए। 2019 में पार्टी का साथ छोड़ दिया, DMK के साथ हो गए। अब स्टालिन सरकार में खादी और वन मंत्रालय संभाल रहे है।
     
  • थोपू एनडी वेंकटचलम: तमिलनाडु के एक जाने-माने नेता और पूर्व मंत्री हैं। वह पहले AIADMK पार्टी में थे और पेरुन्दुरई विधानसभा सीट से दो बार 2011 और 2016 में विधायक चुने गए थे। उस समय वह जयललिता सरकार में पर्यावरण और राजस्व मंत्री भी रहे। 2021 के विधानसभा चुनाव में AIADMK ने उन्हें टिकट नहीं दिया। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा लेकिन पार्टी ने उन्हें निकाल दिया।फिर जुलाई 2021 में वह DMK में शामिल हो गए। अब वह DMK के साथ हैं और पार्टी में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। |

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जमीन पर दल-बदल की मुश्किलें क्या हैं?

AIADMK के उन्हीं बागी नेताओं को DMK में जगह मिलती है, जिनके जातीय समीकरण सधे होते हैं। इन नेताओं की मजबूत जातीय राजनीति रही है। इनके आने से DMK को मजबूत जन समर्थन मिलता है। इनके टिकट को नकारने का खतरा आमतौर पर पार्टियां नहीं कर पाती हैं। संगठन में भले ही मजबूत पद न मिले, प्रतनिधित्व मिल जाता है।
 

तमिलनाडु की राजनीति में AIADMK से DMK में आए नेताओं को पार्टी ने उतना तवज्जो कभी नहीं दिया। शुरुआती चुनावों में उन्हें ज्यादा बड़ी भूमिका नहीं मिलती है। स्थानीय स्तर पर भरोसे की कमी भी देखी जाती है। कई बार उन्हें टिकट तो मिला जाता है लेकिन उनका वोट ट्रांसफर नहीं हो पाता है तो हार भी मिलती है।
 
AIADMK के कोर वोटर और जयललिता के पुराने समर्थक, DMK को विरोधी दल ही मानते हैं। साल 1970 से अब तक, कई बार AIADMK के नेता, डीएमके गए लेकिन उनका कद, दोबारा नहीं बढ़ा। सरकार में जगह तो मिल गई लेकिन पार्टी में कद, उतना प्रभावी नहीं रहा, जितना DMK के मूल नेताओं का रहा है।