के करुणाकरन केरल में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे। चार बार केरल के मुख्यमंत्री रहे। उनके बेटे के मुरलीधरन कांग्रेस के विधायक हैं, केरल सरकार में मंत्री रहे और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। वहीं, करुणाकरन की बेटी पद्मजा वेणुगोपाल अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) में हैं। रोचक बात है कि पद्मजा वेणुगोपाल को उन्हीं सुरेश गोपी का समर्थन मिल रहा जिनके खिलाफ वह 2021 में विधानसभा का चुनाव लड़ी थीं। कांग्रेस पर अनदेखी का आरोप लगाने वाली पद्मजा वेणुगोपाल को उम्मीद है कि इस बार वह अपनी हार का सिलसिला तोड़ पाएंगी।
2016 और 2021 में विधानसभा का चुनाव हारने वाले पद्मजा वेणुगोपाल केरल की कांग्रेस के नेतृत्व से खुश नहीं थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने आरोप लगाए कि ना तो उन्हें कोई पहचान मिल रही है, ना सही बर्ताव हो रहा है और ना ही कांग्रेस नेतृत्व उनकी बातें सुन रहा है। उनके लिए अच्छा यह हुआ कि इस सीट से चुनाव लड़ते आ रहे सुरेश गोपी 2024 में लोकसभा के सांसद बन गए। अब बीजेपी को भी यह लग रहा है कि वह इस सीट पर अपना सूखा खत्म करने के लिए पद्मजा वेणुगोपाल पर दांव लगा सकती है। बता दें कि इसी तरह केरल के पूर्व सीएम ए के एंटनी के बेटे अनिल एंटनी भी बीजेपी में शामिल हो चुके हैं।
करुणाकरन परिवार की कहानी
चार भाई और एक बहन वाले करुणाकरन तीसरे नंबर पर थे। दो बड़े भाई उनसे बड़े थे और एक बहन और एक छोटा भाई था। बहन की मौत सिर्फ 5 साल की उम्र में हो गई थी। करुणाकरन मरार ने आगे चलकर अपनी जाति को अपने नाम से हरा दिया और के करुणाकरन के नाम से मशहूर हुए। साल 1937 में राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले करुणाकरन केरल के उन नेताओं के साथ काम करते थे जो आजादी की लड़ाई में सक्रिय थे। बाद में वह कांग्रेस में शामिल हुए और ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में सक्रिय हुए।
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के करुणाकरन के एक बेटे के मुरलीधरन और बेटी पद्मजा वेणुगोपाल हैं। पिता के बाद बेटे के मुरलीधरन ने राजनीतिक विरासत संभाली। वह ए के एंटनी की केरल सरकार में (साल 2004 में) मंत्री रहे। दो बार कोझिकोड से लोकसभा सांसद चुने गए और 2019 से 2024 तक वटाकरा से सांसद बने। वह कई भार केरल से विधायक भी बने। 2024 में उन्हें केरल की त्रिशूर लोकसभा सीट से उतारा गया था लेकिन वह बीजेपी के सुरेश गोपी और सीपीआई के सुनील कुमार के बाद तीसरे नंबर पर रहे। साल 2005 में कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाने वाले मुरलीधरन साल 2011 में कांग्रेस में लौट आए।
पद्मजा वेणुगोपाल केरल के पूर्व सीएम के करुणाकरन की बेटी और मुरलीधरन की बहन हैं। दशकों से कांग्रेस से जुड़े रहे इस परिवार की बेटी पद्मजा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हो गई हैं। 2004 में अपना पहला चुनाव हारने वाली पद्मजा 2016 और 2016 में भी विधानसभा का चुनाव हार चुकी हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के समय ही उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया था। चर्चा है कि अब वह उसी त्रिशूर विधानसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ सकती हैं जहां से दो बार चुनाव हार चुकी हैं।
कौन थे के करुणाकरन?
साल 1918 में पैदा हुए के करुणाकरन का निधन 23 दिसंबर 2010 को हुआ। उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में हुई जिन्होंने केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (UDF) की स्थापना की। केरल की राजनीति में सक्रिय रहने के अलावा वह केंद्र की सरकार में मंत्री भी रहे। पहले इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी के करीबी रहे करुणाकरन ने पी वी नरसिम्हा राव की मदद प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में की थी।
4 बार CM बने, एक बार पूरा हुआ कार्यकाल
के करुणाकरन पहली बार साल 1977 में केरल के मुख्यमंत्री बने। राज्य की 5वीं विधानसभा के चुनाव के बाद 25 मार्च 1977 को उन्हें शपथ दिलाई गई लेकिन 33 दिनों में ही मुख्यमंत्री बदल दिया गया। उनके बाद ए के एंटनी पहली बार केरल के CM बने। तब पांच साल में 4 सीएम बने और आखिर में राष्ट्रपति शासन लग गया। इसी में वसुदेवन नायर और सी एच मोहम्मद कोया का भी नंबर आया। अगले चुनाव हुए तो सीपीएम ने जीत हासिल कर ली और ई के नयनार सीएम बने।
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एक साल में ही नयनार की सरकार गिर गई और 68 दिन तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा। फिर से करुणाकरन की किस्मत खुली और 28 दिसंबर 1981 को उन्होंने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। सिर्फ 79 दिन में सरकार गिर गई और फिर से राष्ट्रपति शासन लग गया। आखिर में विधानसभा भंग हुई और 7वीं विधानसभा के चुनाव हुए।
चुनाव के बाद कांग्रेस ने अपने दम पर सरकार बनाई और 24 मई 1982 को शपथ लेने वाले करुणाकरन ने इस बार पूरे पांच साल सरकार चलाई। 1987 में चुनाव हुए तो लेफ्ट को जीत मिली और ई के नयनार फिर से मुख्यमंत्री बने। 1991 में फिर से कांग्रेस जीती और करुणाकरन चौथी बार मुख्यमंत्री बने। इस बार कार्यकाल के आखिर में फिर से उन्हें पद छोड़ना पड़ा और ए के एंटनी मुख्यमंत्री बनाए गए। हालांकि, इसका फायदा कांग्रेस को नहीं मिला और लेफ्ट ने फिर से वापसी कर ली।
हालांकि, इस छोटे कार्यकाल ने एक एंटनी को मौका दे दिया। साल 2001 में जब कांग्रेस फिर से जीती तब एके एंटनी तीसरी बार केरल के सीएम बन गए। कार्यकाल के आखिर में ओमान चांडी को मौका मिला और 1 साल 260 दिन तक वह भी मुख्यमंत्री रहे। 2011 से 2016 तक भी वही केरल के मुख्यमंत्री बने।
