चुनाव से पहले CM बनने की जंग, केरल कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल तो नहीं बनेगी?
केरल में अभी विधानसभा के चुनावों की घोषणा तक नहीं हुई है लेकिन कांग्रेस के नेताओं में मुख्यमंत्री के पद को लेकर जोर आजमाइश अभी से शुरू हो गई है।

केरल में कांग्रेस के कई नेता हैं CM पद के दावेदार, Photo Credit: Khabargaon
10 साल की एंटी इनकंबेंसी, लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन और अब केरल के निकाय चुनावों में जीत के बाद से कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं। कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (UDF) को पूरी उम्मीद है कि इस बार वह लेफ्ट की पिनराई विजयन सरकार को हटा देगी। इसका एक असर कांग्रेस के नेताओं में भी देखने को मिल रहा है। कई नेता अभी से खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार पेश करने में जुट गए हैं और इसके चलते आपसी मतभेद भी होने लगे हैं। कई दावेदारों के चलते कहीं ऐसा न हो कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक जैसा हाल हो जाए।
कई राज्यों में नेतृत्व के टकराव से जूझने वाली कांग्रेस को इसका नुकसान उठाना पड़ा है। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर और नवजोत सिंह सिद्धू का झगड़ा सार्वजनिक तौर पर था और पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ की सरकार गिरा दी थी और बीजेपी में चले गए। छत्तीसगढ़ में टी एस सिंह देव तत्कालीन सीएम भूपेश बघेल से बार-बार टकराते रहे थे। राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत का टकराव देखा ही गया। हिमाचल प्रदेश में विक्रमादित्य सिंह के इशारे पर हुई बगावत के बाद मुश्किल से कांग्रेस पार्टी अपनी सरकार बचा पाई थी। कर्नाटक में भी लगातार टकराव हो रहा है। अब चुनाव से पहले ही ऐसी स्थिति केरल में बनती दिख रही है।
जीत से पहले उतराए कुर्सी के दावेदार
कांग्रेस के संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल के बारे में कहा जाता है कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से करीबी के चलते पार्टी को असल में वही चलाते हैं। वह केरल से ही आते हैं और तीसरी बार केरल की अलप्पुझा लोकसभा सीट से सांसद चुने गए हैं। पिछले कुछ दिनों से वह अचानक केरल में तेजी से सक्रिय हो गए हैं। वह स्थानीय लोगों से मिल रहे हैं और उनकी बातें संसदीय कमेटियों के सामने तक रख रहे हैं। ऐसे में यह कहा जाने लगा है कि वह भी खुद की दावेदारी मजबूत करने में जुटे हुए हैं।
यह भी पढ़ें: क्या तमिलनाडु 'इंडिया ब्लॉक' में पड़ी फूट? DMK बोली कई लोग नेता बनना चाहते हैं
रिपोर्ट्स के मुताबिक, के सी वेणुगोपाल चुनाव से पहले ही खुद को सीएम कैंडिडेट घोषित करवाना चाहते हैं और अपने चेहरे पर चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता और केरल की विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष वी डी सतीशन भी खुद को दावेदार मानते हैं। वहीं, रमेश चेन्निथला तो केरल में कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। हाल ही में कांग्रेस पार्टी से अपने रिश्ते ठीक कर पाने में कामयाब हुए शशि थरूर भी पुराने कांग्रेसी हैं और तिरुवनंतपुरम से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं। इन चारों के अलावा केरल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के सुधाकरन और के मुरली धरन जैसे नेता भी हैं लेकिन बड़े नेताओं की रेस में अब ये नेता पीछे छूटने लगे हैं।
किसका दावा मजबूत?
अगर विधानसभा में सक्रियता और अन्य मामलों को देखा जाए तो सबसे आघे वी डी सतीशन हैं। वैसे भी सदन में प्रतिपक्ष के नेता को भावी सीएम उम्मीदवार माना जाता है, ऐसे में उनका दावा सबसे ज्यादा मजबूत देखा जा सकता है। वह कई बार कह भी चुके हैं कि वह पार्टी को जीत दिलाकर रहेंगे और अगर ऐसा नहीं कर पाते हैं तो वह वनवास ले लेंगे। दरअसल, हाल के निकाय चुनावों, केरल के उपचुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव में सतीशन की भूमिका बेहद अहम रही है, ऐसे में उन्हें रेस में काफी आगे माना जा रहा है।
साल 2021 में रमेश चेन्निथला की जगह पर नेता विपक्ष बने सतीशन कोच्चि जिले की परावुर सीट से पांच बार के विधायक हैं। कई मुद्दों पर वह पार्टी से इतर राय रखने में भी हिचकते नहीं हैं जिसके चलते उनकी छवि एक मजूबत नेता के रूप में बनी है। शानदार वक्ता होने के नाते वह विधानसभा से लेकर जनसभाओं तक में कांग्रेस के विजन को अच्छे से रखते हैं। उनके साथ एक और प्लस प्वाइंट यह है कि वह 61 साल के हैं और 63 साल के के सी वेणुगोपाल और 69 साल के रमेश चेन्निथला से छोटे हैं।
यह भी पढ़ें: CM बनने का सपना, कांग्रेस के इस नियम से चुनाव नहीं लड़ पाएंगे थरूर और वेणुगोपाल?
रमेश चेन्निथला के आड़े आएगी उम्र?
लंबे समय से केरल के सीएम की कुर्सी पर नजर बनाए रमेश चेन्निथला सिर्फ 28 साल की उम्र में पहली बार विधायक बने थे। उसी बार वह के करुणाकरन की सरकार में मंत्री भी बने थे। ओमान चांडी की सरकार में 2014 से 2016 तक वह केरल के गृहमंत्री भी रहे। चार बार सांसद बने, पांच बार विधायक बने, केरल कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, नेता विपक्ष रहे लेकिन आज तक सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंचे।
अब ऐसा लगता है कि उम्र उनके दावे को कमजोर कर रही है। पिछली बार उनका दावा बेहद मजबूत था लेकिन तब कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाला UDF चुनाव नहीं जीत पाया था। ऐसे में अब रमेश चेन्निथला भले चाहते हों लेकिन उनका दावा उतना पुख्ता नहीं रह गया है।
इन प्रमुख नेताओं के अलावा शशि थरूर भी अब रेस में माने जा रहे हैं। हाल ही में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से उनकी मुलाकात ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि अब सब ठीक है। हालांकि, वेणुगोपाल और शशि थरूर की राह में एक रोड़ा यह हो सकता है कि हाल ही में कांग्रेस ने संकेत दिए थे कि लोकसभा या राज्यसभा सांसदों को चुनाव नहीं लड़ाया जाएगा। इस मामले में भी केसी वेणुगोपाल खेल कर सकते हैं क्योंकि वह कह चुके हैं कि मुख्यमंत्री का चयन चुनाव के बाद जीते हुए विधायक और पार्टी हाई कमान करेंगे।
हालांकि, इन सबमें एक चीज यह तय है कि अगर ये नेता चुनाव में कांग्रेस और UDF की जीत की बजाय अपनी-अपनी गोटियां सेट करने में ज्यादा ध्यान लगाते हैं तो विपक्षियों को मौका मिल जाएगा और बाजी हाथ से निकल भी सकती है।
और पढ़ें
Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies
CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | Sitemap



