पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल का प्रभाव पिछले एक दशक में लगातार कम हुआ है। 2017 तक पंजाब की सत्ता में रहने वाली पार्टी के पास अब 3 विधायक और 1 सांसद ही है। पिछले करीब 10 सालों में पार्टी पंजाब में सत्ता के शिखर से अपने अब तक के सबसे खराब प्रदर्शन तक पहुंच चुकी है। पार्टी के कई नेता बागी होकर अलग हो गए और अब पार्टी के सामने खुद को फिर से पंजाब की राजनीति में स्थापित करने की कोशिश हो रही है।

 

पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की अध्यक्षता में पार्टी पूरे पंजाब में बैसाखी से पहले 40 रैलियों का आयोजन कर रही है, जिसमें कुछ रैलियां हो भी चुकी हैं। पार्टी पुराने नेताओं को मनाने में लगी है और विश्वास खो चुके वोटर्स को एक बार फिर से अपने पाले में करने की कोशिश में लगी है। शिरोमणि अकाली दल की सक्रियता से पंजाब में अन्य राजनीतिक दलों को झटका लग सकता है। 

 

यह भी पढ़ें: बिहार में आयुष्मान भारत योजना में करोड़ों का फर्जीवाड़ा, CAG रिपोर्ट ने खोली पोल

2012 में लगातार दूसरी बार बनाई थी सरकार

अकाली दल ने पंजाब में 2007 में सरकार बनाई थी और इसके बाद 2012 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने पूर्ण बहुमत से फिर से वापसी की। 2012 में जहां कांग्रेस सत्ता वापसी की उम्मीद लगाए बैठी थी वहीं, अकाली दल को पूर्ण विश्वास था कि उसे पंजाब की जनता फिर से मौका देगी। तमाम अटकलों को खारिज करते हुए धमाकेदार वापसी की। पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटों में से 56 सीटें अकाली दल के खाते में गई हैं जबकि उसकी गठबंधन सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को 12 सीटें मिली। अकाली दल ने पिछले 46 सालों की परंपरा को तोड़ते हुए लगातार सरकार बनाई। 

2017 के बाद खराब प्रदर्शन

2012 में अकेल दम पर बहुमत हासिल करने के वाली पार्टी शिरोमणि अकाली दल को 2017 में बड़ी हार का सामना करना पड़ा। शिरोमणि अकाली दल को 177 में से सिर्फ 15 सीटों पर जीत मिली। पार्टी का यह अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था। इसके बाद अकाली दल का ग्राफ लगातार गिरता रहा। 2017 में कांग्रेस की वापसी के साथ-साथ आम आदमी पार्टी का उदय हुआ और प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा मिला।

 

इसके बाद 2020 में किसान कानूनों के कारण अकाली दल को स्टैंड लेने में समय लगा और अंत में अपने सबसे पुराने सहयोगी बीजेपी को विदा भी कहना पड़ा। इसे बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की लहर में पंजाब बह गया और शिरोमणि अकाली दल को मात्र 3 सीटों पर समिट गया। अकाली दल के लिए यह अब तक की सबसे शर्मनाक हार थी। पार्टी के बड़े नेता और 11 बार विधायक रहे प्रकाश सिंह बादल, पार्टी प्रधान सुखबीर सिंह बादल भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। बादल परिवार के सदस्य और सभी करीबी चुनाव में अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। अकाली दल को 18.38 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2017 के चुनाव से करीब 7 प्रतिशत कम थे।

वापसी की तैयारी

अकाली दल अब पंजाब में फिर से वापसी की तैयारी कर रहा है। प्रकाश सिंह बादल अब नहीं रहे और पूरी कमान उनके बेटे सुखबीर बादल के हाथों में है। 2017 के बाद कई टकसाली नेता पार्टी से अलग हो गए। 2022 और 2024 की हार के बाद कई पार्टी नेताओं ने पार्टी को अलविदा कह दिया। धार्मिक मामलों में सुखबीर बादल भी सजा काट चुके हैं। अब पार्टी इन सभी संघर्षों से आगे बढ़कर 2027 की तैयारी में जुट गई है। पार्टी ने 2027 के लिए चुनावी वादे भी कर दिए हैं। बिक्रम सिंह मजिठिया को जमानत मिलने से पार्टी को ओर सहारा मिल गया है। पार्टी पुराने नेताओं को वापिस पार्टी में शामिल करवाने की कोशिश कर रही है और अब बीजेपी के नेताओं को भी तोड़ रही है। 

पंथक राजनीति में लौटेगा अकाली दल?

गुरुद्वारा मूवमेंट से शुरू हुई अकाली दल की यात्रा में पिछला एक दशक बहुत खराब रहा है। पार्टी धार्मिक मामलों में भी सवालों के घेरे में रही। हालांकि, अब पार्टी वापस 90 के दशक की राजनीति की ओर बढ़ रही है। पिछले एक दशक में उभरे पंथक राजनेताओं और पार्टियों को अकाली दल की बढ़ती ताकत से परेशानी होगी। अकाली दल के कमजोर होने से कई पंथक नेताओं का उभआर देखने को मिला था। 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की दो सीटों के नतीजों की चर्चा पूरे देश में हुई। खडूर साहिब सीट से वारिस पंजाब दे के मुखिया अमृतपाल सिंह ने चुनाव जीता। वह अभी भी एनएसए के तहत जेल में बंद हैं और जेल से ही उन्होंने चुनाव लड़ा और 1.97 लाख वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज कर ली। इसके अलावा फरीदकोट से पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के कातिल बेअंत सिंह के बेटे सरबजीत सिंह खालसा ने 70 हजार वोटों के बड़े अंतर से चुनावों में जीत दर्ज की। अब जब अकाली दल फिर से पंथक मुद्दों को उठाने लगा है तो इन नेताओं के साथ-साथ अन्य पंथक राजनीति करने वाले सिख नेताओं और पार्टियों को झटका लगना तय है। कुछ नेताओं के तो अकाली दल में जाने की भी चर्चा है। 

बीजेपी को कितना नुकसान होगा?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अमृतपाल और सरबजीत सिंह खालसा जैसे नेताओं के उभार से भारतीय जनता पार्टी को फायदा हुआ। गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के रिटायर्ड प्रोफेसर जगरूप सिंह सेखों ने एक मीडिया संस्थान से बातचीत करते हुए बताया था कि उग्र सिख नेताओं के पास पंजाब को देने के लिए कुछ नहीं है लेकिन जब लोग सभी पार्टियों से नाराज होते हैं तो इनका उभार होता है। 

प्रोफेसर हरजेश्वर पाल सिंह पाल पंजाब की पंथक राजनीति पर नजर रखते हैं। उनका कहना है कि उग्र सिख नेताओं के उभरने से पंजाब में बीजेपी को फायदा हुआ और उनका वोट प्रतिशत बढ़ गया है। उग्र सिख विचारों वाले नेताओं के उभार से हिंदू वोटर बीजेपी के साथ लामबंद हुआ। प्रोफेसर हरजेश्वर का कहना है कि बीजेपी हिन्दू वोटों को खालिस्तान का डर दिखा कर डराने का काम कर सकती है। पंजाब में कुछ समय से शातिर सियासी चालें चली जा रही हैं। इसके साथ ही बीजेपी को ग्रामीण इलाकों में जो वोट मिलते थे वह भी अकाली दल के साथ जा सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में अगर अकाली दल का प्रभाव बढ़ता है, तो बीजेपी को नुकसान होना तय है।

 

यह भी पढ़ें: 'कांग्रेस के बिना 30 सीटें भी नहीं जीत सकती DMK', विजय की पार्टी का बड़ा दावा

कांग्रेस और AAP को फायदा या नुकसान?

पंजाब में जब अकाली दल का ग्राफ गिरने लगा तो आम आदमी पार्टी का ग्राफ बढ़ने लगा। 2017 में पार्टी ने अकाली दल को पीछे छोड़कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा प्राप्त किया और 2022 में सभी को चौंकाकर पंजाब में पहली बार सरकार बनाई। कांग्रेस के खिलाफ जो लोग पहले अकाली दल को वोट करते थे वे सभी अब आम आदमी के पक्ष में चले गए हैं। अकाली दल के उभार से आम आदमी पार्टी को कुछ इलाकों में नुकसान हो सकता है। हालांकि, अगर अकाली दल मजबूत होता है और सत्ता विरोधी वोटों में बंटवारा करता है तो आम आदमी पार्टी को फायदा भी होगा। इसके लिए अभी अकाली दल के प्लान का इंतजार है कि वे किन इलाकों पर ज्यादा फोकस करते हैं। 

 

अकाली दल का उभआर कांग्रेस को परेशान कर सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि अकाली दल और बीजेपी ने अगर चुनावों के नजदीक जाकर थर्ड फ्रंट बना लिया तो AAP के विरोधी वोटरों के पास दो मजबूत विकल्प होंगे। ऐसे में AAP की सरकार के खिलाफ वोट करने वाले लोग दो जगह बंट जाएंगे और इसका सीधा नुकसान कांग्रेस पार्टी को होगा। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी ने जब 2017 में सरकार बनाई थी उस समय जट सिख किसानों ने पार्टी का मजबूती से साथ दिया। इसी समुदाय के लोग 2012 में अकाली दल के साथ खड़े थे। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। अकाली दल की कई पुरानी सीटों पर जहां कांग्रेस ने अपना जनाधार बढ़ाया है उन सीटों पर कांग्रेस को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।