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बिहार में आयुष्मान भारत योजना में करोड़ों का फर्जीवाड़ा, CAG रिपोर्ट ने खोली पोल

गरीब परिवारों को हर साल 5 लाख रुपये तक का मुफ्त मेडिकल इलाज देने वाली AB-PMJAY स्कीम में करोड़ों रुपये के फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है।

fraud in Ayushman Bharat scheme

सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा ने आयुष्मान कार्ड भेंट करते हुए, Photo Credit: ANI

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आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) एक बार फिर चर्चा में आ गई है। इस बार इस योजना में धोखाधड़ी की खबरें सामने आई हैं। बिहार में AB-PMJAY के तहत लाभार्थियों के इलाज के लिए करोड़ों रुपये के संदिग्ध भुगतान का खुलासा हुआ है। यह खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट 2025 में हुआ, जो 26 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।

 

आपको बता दें कि यह स्कीम एक सरकारी हेल्थ इंश्योरेंस प्लान है जो गरीब परिवारों को हर साल पांच लाख रुपये तक का फ्री इलाज देती है। CAG रिपोर्ट में खास तौर पर इनऐक्टिव आयुष्मान कार्ड पर किए गए पेमेंट और उन कार्ड पर खर्च की गई रकम का जिक्र है जो ऑफिशियल डेटाबेस में रजिस्टर्ड भी नहीं थे।

 

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इनएक्टिव कार्ड पर लुटाए गए करोड़ों रुपये

रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 2,186 ऐसे मामले सामने आए जहां इनएक्टिव आयुष्मान कार्ड का इस्तेमाल करके इलाज के क्लेम जमा किए गए और कुल 2.31 करोड़ रुपये दिए गए। इसका मतलब है कि अस्पतालों को ऐसे कार्ड पर भी पैसे दिए गए जो सिस्टम में एक्टिव नहीं होने चाहिए थे या एक्सपायर हो चुके थे। ऑडिट ने इसे एक गंभीर फाइनेंशियल गड़बड़ी माना और इस बात पर सवाल उठाया कि जब कार्ड इनएक्टिव थे, तो क्लेम को वेरिफाई और पेमेंट किस आधार पर किया गया।

 

CAG की जांच में यह भी पता चला कि 139 आयुष्मान कार्ड लाभार्थी पहचान प्रणाली (BIS) डेटाबेस में रजिस्टर्ड भी नहीं थे। फिर भी, इन कार्डों पर पेमेंट किया गया। इन डेटाबेस कार्डों पर 25.25 लाख रुपये तक का पेमेंट किया गया। इसका मतलब है कि इलाज के क्लेम को मंजूरी दी गई और ऐसे बेनिफिशियरी के नाम पर फंड जारी किया गया जिनके नाम और कार्ड रिकॉर्ड सरकारी सिस्टम में मौजूद नहीं थे।

 

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रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला साफ दिखाता है कि आईटी सिस्टम और निगरानी व्यवस्था में बड़ी कमजोरी है। योजना में हर लाभार्थी का नाम और जानकारी डिजिटल सिस्टम में जांच के बाद ही मंजूर होनी चाहिए। लेकिन जब डेटाबेस में नाम ही दर्ज नहीं था और फिर भी भुगतान हो गया, तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है।

 

इससे लगता है कि या तो सिस्टम में कोई तकनीकी गड़बड़ी थी या फिर जिम्मेदार लोगों की लापरवाही हुई। साथ ही, इसमें आपसी मिलीभगत की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।


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