अपनी पार्टी के गठन के बाद तेज प्रताप यादव ने मकर संक्रांति पर पहली बार चूड़ा दही भोज आयोजित किया। उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष के तमाम नेताओं को भोज का निमंत्रण दिया। अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव और माता-पिता को भी आमंत्रित किया। भोज का आयोजन पटना के 26 एम स्ट्रैंड रोड स्थित आवास पर किया गया। यह तेज प्रताप यादव का सरकारी आवास है। अब सवाल उठ रहा है कि विधायकी हारने वाले तेज प्रताप यादव कैसे सरकारी आवास पर भोज कर रहे हैं और इससे जुड़े नियम क्या हैं?

 

2020 विधानसभा चुनाव में तेज प्रताप यादव ने हसनपुर से विधायकी जीती थी। तब उन्हें बतौर विधायक 26 M स्ट्रैंड रोड स्थित सरकारी आवास आवंटित हुआ था। हालांकि 2025 का विधानसभा चुनाव उन्होंने महुआ से लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। पिछले साल नवंबर में विधायकी हारने के बाद बिहार सरकार ने तेज प्रताप यादव को अपना सरकारी आवास खाली करने का आदेश दिया था। अब यह आवास बिहार सरकार में मंत्री लखेंद्र कुमार रोशन को आवंटित किया गया है।

 

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तेज प्रताप यादव के अलावा बिहार सरकार ने उनकी मां राबड़ी देवी को पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास खाली करने को भी कहा था। यह आवास उन्हें बतौर पूर्व मुख्यमंत्री आवंटित किया गया था। साल 2022 में तेज प्रताप यादव भी इसी आवास में रहने लगे थे। हालांकि पिछले साल एक फेसबुक पोस्ट के बाद परिवार ने तेज प्रताप यादव से दूरी बना ली थी। अब बिहार सरकार ने पटना के हार्डिंग रोड स्थित सेंट्रल पूल हाउस नंबर 39 राबड़ी देवी को आवंटित किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राबड़ी देवी ने अपना कुछ सामान 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास खाली से शिफ्ट किया है। मगर वह अब भी वही पर हैं।

 

 

 

 

 तेजस्वी यादव ने अपने एक पोस्ट में लिखा, आज अपने पिताजी आदरणीय श्री लालू प्रसाद यादव जी, माता जी आदरणीय श्रीमती राबड़ी देवी जी से 10 सर्कुलर रोड स्थित आवास पहुंचकर मुलाकात कर आशीर्वाद प्राप्त किया और अपने छोटे भाई और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी से भी भेंट मुलाकात कर कल 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित होने वाले ऐतिहासिक दही -चूड़ा भोज कार्यक्रम हेतु निमंत्रण पत्र देकर आमंत्रित किया।'

क्या है नियम?

बिहार में भवन निर्माण विभाग मंत्रियों और विधायकों को आवास आवंटित करता है। विधानसभा अध्यक्ष की मंजूरी के बाद विधायकों और सीएम की अनुमति के बाद मंत्रियों को आवास आवंटित होते हैं। वहीं चुनाव हारने वाले सदस्यों को भवन निर्माण विभाग से नोटिस मिलने के बाद आवास खाली करना होता है। हालांकि उन्हें कुछ समय दिया जाता है। अगर समय सीमा के बाद भी आवास खाली नहीं किया गया तो सरकार संबंधित व्यक्ति से किराया भी वसूल सकती है। 

 

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आवास खाली नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट क्या कह चुका?

अविनाश कुमार सिंह ने साल 2014 में विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था।उसके बावजूद उन्होंने 2016 तक पटना के टेलर रोड स्थित सरकारी बंगला खाली नहीं किया था, जबकि यह आवास एक कैबिनेट मंत्री को अलॉट किया गया था। बाद में भवन निर्माण विभाग ने उन पर 20.98 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया। जुर्माने के खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, मगर अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि सरकारी आवास पर अनिश्चित काल तक कब्जा नहीं रखना चाहिए। 

पटना में बनी विधायक कॉलोनी

बिहार सरकार पटना में बीजेपी कार्यालय के सामने विधायक कॉलोनी बसा रही है। यहां कुल 246 आवास हैं। इनमें प्रदेश के 243 विधायक रहेंगे। तीन आवास अस्थायी हैं। इनका उपयोग कोई बांगला खाली नहीं होने पर नव निर्वाचित विधायक के लिए तुरंत रहने की व्यवस्था करना है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक बंगले की अनुमानित कीमत एक करोड़ रुपये है। गार्डनीबाग में 20 बेडरूम वाला एक अलग ब्लॉक बनाया गया है। यहां मंत्रियों के ठहरने की व्यवस्था होगी।