पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अब महज कुछ ही महीने का समय बचा है। इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल के दो दिवसीय दौरे पर पहुंचे हुए हैं। उन्होंने राज्य में बीजेपी की तैयारियों को तेज करते हुए बंगाल के दक्षिणी हिस्से में कार्यकर्ताओं की बैठक ली और उत्तरी हिस्से में संगठनात्मक बैठक किया। इन बैठकों में शाह ने तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाली ममता बनर्जी सरकार को घेरने की रणनीति पर चर्चा की।

 

अमित शाह ने ममता बनर्जी सरकार पर निशाना साधते हुए 'घुसपैठियों को पनाह देने', भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने और चुनावी फायदे के लिए जानबूझकर सीमा सुरक्षा उपायों में रुकावट डालने का आरोप लगाया। उन्होंने साथ ही मुस्लिम तुष्टीकरण करने और परिवारवार का भी आरोप लगाया। बीजेपी इन्हीं मुद्दों को लेकर विधानसभा में उतर रही है। मगर, अमित शाह का इस बार का बंगाल दौरा इससे अलग है। दरअसल, बीजेपी इस बार पश्चिम बंगाल की कास्ट पॉलिटिक्स पर खास ध्यान दे रही है। ऐसे में आइए जानते हैं कि पश्चिम बंगाल की जातिगत राजनीति क्या है, जिसे बीजेपी साधना चाहती है।

 

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पश्चिम बंगाल की राजनीति

पश्चिम बंगाल की राजनीति, विचारधारा और एजेंडा, दोनों ही मामले में देश के बाकी हिस्सों से अलग रही है। निचले तबके के मुद्दों की आवाज उठाकर और अपनी चुनावी लामबंदी से लेफ्ट ने पश्चिम बंगाल में अपनी पहचान बनाई। लेफ्ट ने राज्य में जाति को कोई बड़ा फैक्टर नहीं माना। ऐसे तो पश्चिम बंगाल में पारंपरिक रूप से ब्राह्मण, कायस्थ और बैद्य जैसी उच्च जातियां प्रमुख प्रभाव वाली जातियों में हैं। 

बंगाल की मजबूत जातियां कौन?

मगर, 2011 के विधानसभा चुनावों से ही टीएमसी ने मतुआ (दलित), महिष्य (कृषि प्रधान), राजबंशी (उत्तर बंगाल), कुर्मी (जंगलमहल क्षेत्र और मारवाड़ी को टारगेट करके साधा। इन समुदायों ने अभी तक टीएमसी को सत्ता में बिठाए रखा है। ऐसे में बंगाल की राजनीति में जाति की भूमिका अहम है। इसके अलावा, संथाल और अन्य अनुसूचित जनजातियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस बार बीजेपी की नजर इन्हीं जातियों पर है।

 

 

 

 

इस चुनाव में बीजेपी मतुआ समुदाय तक पहुंच बढ़ाने और उन्हें अपने साथ बनाए रखने की कोशिशों में जी जीन से जुटी हुई है। मतुआ समुदाय को बीजेपी के लिए एक अहम मतदाता आधार माना जाता है। दरअसल, मतुआ समुदाय बंगाल की प्रमुख अनुसूचित जाति है। यह मूल रूप से बांग्लादेश से आए शरणार्थियों का समूह है।

मतुआ जाति और प्रभाव वाले इलाके

इन्होंने बाग्लादेश में धार्मिक और सामाजिक उत्पीड़न के बाद भारत में आकर शरण ली थी। बंगाल में इस जाति की आबादी का अनुमान तकरीबन दो करोड़ के आसपास है। यही वजह है कि यह जाति राज्य की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। मतुआ जाति बंगाल के उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया और उत्तर बंगाल के इलाकों में फैले हुए हैं।

बीजेपी की नजर मतुआ जाति पर क्यों?

बीजेपी पहले ही ऐलान कर चुकी है कि मतुआ जाति के जो लोग दशकों से बंगाल में रह रहे हैं और हाल के सालों में धार्मिक उत्पीड़न के कारण आए हैं, उन्हें नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के तहत नागरिकता दी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पश्चिम बंगाल बीजेपी इकाई कई रैलियों और बैठकों के जरिए मतुआ जाति को अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है।

 

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बता दें कि पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय की आबादी कम से कम 30 विधानसभा सीटों और 11 लोकसभा सीट पर निर्णायक भूमिका निभाती है। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मतुआ बहुल इलाकों में बीजेपी का वोट शेयर औसतन 41.5 फीसदी रहा था। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में भी मतुआ बहुल क्षेत्रों से बीजेपी को काफी वोट मिले। हालांक‍ि, साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के वोट प्रतिशत में थोड़ी गिरावट आई और यह वोट टीएमसी के पास चला गया।

 

मगर, पिछले कुछ समय से पश्चिम बंगाल में हुई कई रैलियों में बीजेपी ने मतुआ समुदाय को भरोसा दिलाने की कोशिश की है। बहुल इलाकों को ध्यान में रखते हुए खुद गृह मंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक मंचों से कहा, 'सीएए के तहत शरणार्थियों को नागरिकता दी जाएगी। किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है।'

 

यही वजह है कि शनिवार को अपने पश्चिम बंगाल दौरे पर गृह मंत्री अमित शाह ने तृणमूल कांग्रेस पर मतुआ और नामशूद्र समुदायों को धमकाने का आरोप लगाया। साथ ही उन्हें भरोसा दिलाया कि उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है। दरअसल, शाह को इन समुदाय के वोटों की अहमियत पता है।