हाल ही में वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। सबकी नजरें इसी पर थीं कि इतने बड़े नेता के आने से समाजवादी पार्टी को क्या फायदा होगा। इसी के साथ कुछ और नेता भी SP में शामिल हुए जिन पर शायद कम लोगों ने ध्यान दिया। इसमें सबसे ज्यादा पाल जाति के नेता थे। यह दिखाता है कि अखिलेश यादव एक बार फिर से ऐसी जातियों को अपने साथ लाने में जुटे हुए हैं जो पारंपरिक रूप से SP के साथ नहीं रही हैं लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेहद अहमियत रखती हैं।
साल 2017 में सत्ता से बाहर होने के बाद से अभी तक समाजवादी पार्टी (SP) दो बार चुनाव में हार चुकी है। 2022 में बहुत उम्मीद थी लेकिन अखिलेश यादव एक बार फिर सत्ता से दूर रह गए। इसके बाद अखिलेश यादव ने रणनीति बदली और दलितों, अति पिछड़ी जातियों के साथ-साथ पिछड़े वर्ग की उन जातियों को साधने में जुटे जो अब तक SP से दूर रही थीं। इसका नतीजा उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला और समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब हो गई। यही वजह है कि अब समाजवादी पार्टी ऐसी जातियों का साथ लाने में जुट गई है।
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समाजवादी पार्टी में कौन-कौन शामिल हुआ?
15 फरवरी को हुई इस ज्वाइनिंग में नसीमुद्दीन सिद्दीकी के अलावा कई अन्य चेहरे भी थे। इसमें प्रतापगढ़ से पूर्व विधायक राजकुमार पाल, पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू, दीनानाथ कुशवाहा (पूर्व विधायक देवरिया), कन्नौज से AIMIM के टिकट पर चुनाव लड़ चुके दानिश खान, पूर्व विधान परिषद सदस्य हुस्ना सिद्दीकी, पूनम पाल और रंजना पाल भी शामिल थीं।
इनमें से राजकुमार पाल वह शख्स हैं जो पहले बीजेपी के करीबी रहे, फिर अपना दल (सोनेलाल) के टिकट पर चुनाव लड़कर पहली बार में ही विधायक बन गए। उन्हें अपना दल (सोनेलाल) का प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया गया था लेकिन बाद में आशीष पटेल पर आरोप लगाते हुए उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया।
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कहां है अखिलेश यादव का फोकस?
दरअसल, ऐसे नेताओं की ज्वाइनिंग यह इशारा कर रही है कि अखिलेश यादव अपने PDA फॉर्मूले के तहत उन सभी जातियों को साथ लाने की कोशिश कर रही हैं जो उपेक्षित महसूस कर रही हैं और उनकी सुध लेने वाला कोई बड़ा नेता है। यही वजह है कि अखिलेश ने आरोप लगाए थे यूपी में बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए पाल, बघेल, राठौड़ और मौर्य जातियों के वोट जानबूझकर काटे जा रहे हैं।
अनुमानों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग के जितने वोटर हैं उनमें 40 प्रतिशत से ज्यादा वोटर गैर यादव हैं। ये वोटर किसी एक पार्टी के पक्ष में नहीं रहते हैं। हां, पिछले कुछ साल में अनुप्रिया पटेल कमोबेश कुर्मी वोटरों को एनडीए के पक्ष में लाने में सफल दिखी हैं। हालांकि, 2022 और 2024 के चुनाव में यह समीकरण भी टूटता दिखा था।
प्रदेश में ओबीसी की 75 से ज्यादा जातियां हैं। सबसे ज्यादा यादव हैं और फिर कुर्मी हैं। हालांकि, SP की नजर इनकी बजाय ऐसे वोटबैंक पर है जो किसी एक पार्टी के वोटबैंक की तरह काम नहीं करते। इसी प्लान के तहत अखिलेश यादव का फोकस गड़रिया-पाल वोटरों पर है। लगभग 3 फीसदी आबादी वाली इस जाति के लोग कहीं निर्णायक भूमिका तो नहीं निभाते दिखते लेकिन कई सीटों पर हार-जीत का अंतर जरूर कम कर सकते हैं।
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बरेली, आगरा, फिरोजाबाद, इटावा, हाथरस, प्रतापगढ़, रायबरेली और बुंदेलखंड की कई सीटें ऐसी हैं जिन पर पाल जाति के लोगों की जनसंख्या 5 से 10 हजार तक है, ऐसे में ये वोटर अगर SP के साथ आते हैं तो उन सीटों पर अखिलेश यादव को मदद मिल सकती है जहां उन्हें कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा था।
पासी वाले फॉर्मूले से मिली सीख?
इससे पहले, अखिलेश यादव ने सफलता का शानदार स्वाद 2024 के लोकसभा चुनाव में चखा था। तब अखिलेश यादव ने अपने परिवार के पांच लोगों को छोड़कर एक भी यादव को टिकट नहीं दिया था। तब उन्होंने पासी, कुर्मी, कुशवाहा जैसी जातियों को टिकट बांटे थे। समाजवादी पार्टी के एक चौथाई उम्मीदवार तो ऐसे थे जो पूर्व में बसपाई रहे थे। इस रणनीति का असर भी अखिलेश यादव को देखने को मिला था। 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी से कुल 8 पासी सांसद चुने गए जिसमें से ज्यादातर समाजवादी पार्टी से थे।
समाजवादी पार्टी ने कुल 17 दलितों को टिकट दिया था जिसमें से 8 ने जीत हासिल की थी। इसी तरह 10 कुर्मियों को टिकट दिया गया और 7 ने जीत हासिल की थी। भूमिहार, राजभर, लोधी और बिंद-निषाद भी सपा के टिकट पर जीत हासिल करने में कामयाब रहे थे। ऐसे में अखिलेश यादव अब कई अन्य जातियों को भी अपने पाले में करने में जुटे हुए हैं।
