पंजाब की राजनीति में एक बार फिर हिंदू वोटर्स चर्चा के केंद्र में हैं। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कोर वोटर माने जाने वाले हिंदुओं पर अब आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस की भी नजर है।  इसकी वजह सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि राज्य की बदलती राजनीतिक परिस्थितियां भी हैं। बीजेपी लंबे समय से शहरी हिंदू वोटर्स की पसंद मानी जाती रही है, वहीं अब AAP और कांग्रेस भी इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं और बीजेपी को उसके कोर वोटबेस में ही घेरने की तैयारी कर रहे हैं। 

 

हाल के दिनों में पंजाब की भगवंत मान सरकार ने कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिन्हें राजनीतिक जानकार हिंदू आउटरीच यानी हिंदू समाज तक पहुंच बनाने की रणनीति मान रहे हैं। AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंज केजरीवाल और पंजाब के सीएम भगवंत मान समेत तमाम पार्टी नेता भजन संध्या में जा रहे हैं। भगवान राम, भगवान शिव और लव-कुश से जुड़े धार्मिक आयोजनों और योजनाओं को प्रमुखता दी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सभी दल अपने पारंपरिक वोटबैंक से आगे बढ़कर नए मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रहे हैं।

 

यह भी पढ़ें: गर्लफ्रेंड को किसी और के साथ देख लिया, फिर मिलने बुलाया और मारकर गाड़ दिया

पंजाब में हिंदू वोट क्यों हैं इतने अहम?

पंजाब को अक्सर सिख बहुल राज्य के रूप में देखा जाता है, लेकिन यहां हिंदू आबादी भी काफी बड़ी है। राज्य में करीब 38 से 40 प्रतिशत आबादी हिंदू समुदाय की मानी जाती है। कई विधानसभा सीटों पर यही वोट जीत-हार का फैसला करते हैं। खासतौर पर जालंधर, लुधियाना, अमृतसर, पठानकोट, होशियारपुर, गुरदासपुर, फाजिल्का, अबोहर, बठिंडा और पटियाला जैसे शहरों में हिंदू मतदाता बड़ी संख्या में हैं। इन इलाकों में व्यापारी वर्ग, मध्यम वर्ग और शहरी वोटर्स चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालते हैं। इसी वजह से कोई भी राजनीतिक दल इस वोटबैंक को नजरअंदाज नहीं करना चाहता।

बीजेपी का पारंपरिक वोटर

पंजाब में लंबे समय तक बीजेपी का सबसे मजबूत आधार शहरी हिंदू वोटर रहे हैं। शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन के दौरान बीजेपी मुख्य रूप से हिंदू बहुल सीटों पर चुनाव लड़ती थी और उसका फोकस शहरी क्षेत्रों पर रहता था।  इस गठबंधन को हिंदू-सिख गठबंधन के तौर पर पेश किया जाता था। हालांकि, किसान आंदोलन के बाद अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन टूट गया। इसके बाद बीजेपी अकेले चुनाव लड़ रही है और उसे अपने पुराने वोटबैंक को बचाए रखने के साथ-साथ नए वर्गों तक भी पहुंच बनानी पड़ रही है।

अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही बीजेपी

भारतीय जनता पार्टी अब सिर्फ हिंदू वोटों तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी सिख और दलित समुदाय में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसी रणनीति के तहत हाल में पार्टी ने संगठन में भी सामाजिक संतुलन बनाने की कवायद तेज की है। इसके तहत हिंदू नेता सुनील जाखड़ को हटाकर पार्टी ने जट्ट सिख चेहरे केवल सिंह ढिल्लों का राज्य यूनिट की कमान दी है। 

AAP की नई रणनीति

2022 विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज करने वाली आम आदमी पार्टी अब अपने जनाधार को बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे में पार्टी हिंदू समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। राज्य सरकार ने पूरे राज्य में 'एक शाम शिव के नाम' भजन संध्या का आयोजन किया है। राज्य के 22 बड़े शहरों में इस तरह के कार्यक्रम हो रहे हैं। अमृतसर में एक कार्यक्रम में अरविंद केजरीवाल ने लव-कुश मंदिर से जुड़ी बड़ी योजना का ऐलान किया। इसके अलावा भगवान शिव से जुड़े कार्यक्रम, रामायण आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और सनातन परंपरा से जुड़े आयोजनों को भी बढ़ावा दिया गया। 

 

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि AAP यह संदेश देना चाहती है कि वह केवल एक वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे पंजाब की पार्टी है। इससे उसे उन हिंदू वोटर्स में भी जगह बनाने की उम्मीद है जो पहले बीजेपी या कांग्रेस के साथ रहे हैं। इसके साथ ही हाल के दिनों में भगवंत मान के विवादित वीडियो से हुए डैमेज को हिंदू वोट के जरिए पूरा करने की कोशिश की जा रही है। 

 

यह भी पढ़ें: राम मंदिर में सुरक्षित है 5 करोड़ की सोने की रामचरितमानस, ट्रस्ट ने दिखाई फोटो

कांग्रेस भी नहीं रहना चाहती पीछे

कांग्रेस भी पंजाब में वापसी की तैयारी में जुटी है। पार्टी जानती है कि सिर्फ पारंपरिक वोटों के भरोसे सत्ता में लौटना आसान नहीं होगा। इसलिए वह हिंदू समाज के साथ-साथ दलित, किसान और शहरी मतदाताओं को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी राज्य स्तर पर हिंदू, दलित और जट्ट सिख का फॉर्मूला लागू करने की कोशिश कर रही है। 

आगे क्या होगा?

2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। AAP सरकार अपने कामकाज और नए सामाजिक समीकरणों के सहारे दोबारा सत्ता में लौटना चाहती है। कांग्रेस खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है, जबकि बीजेपी अपने पारंपरिक हिंदू वोटबैंक को मजबूत रखते हुए नए सामाजिक वर्गों में विस्तार करना चाहती है। यही वजह है कि आने वाले समय में पंजाब में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए राजनीतिक सक्रियता और बढ़ सकती है।