पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के चंद महीने बाकी हैं। अब चर्चा है कि 2021 में वाम दलों के साथ चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस इस बार अकेले ही चुनाव में उतर सकती है। 2024 में लेफ्ट और कांग्रेस ने साथ में ही चुनाव लड़ा था लेकिन 2021 के चुनाव की तरह ही कोई खास कामयाबी नहीं मिली। ऐसे में अब चर्चा है कि लेफ्ट और कांग्रेस इस बार गठबंधन किए बिना ही लड़ेंगे लेकिन रणनीतिक तौर पर पर्दे के पीछे से एक-दूसरे का साथ देंगे। ऐसे में यह भी हो सकता है कि एक बार फिर से पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव सिर्फ तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच ही केंद्रित हो जाए।
एक तरफ ममता बनर्जी और एक तरफ बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ रही कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वह पश्चिम बंगाल में खुद को मजबूत स्थिति में लाए। 2016 में 44 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी 2021 में लेफ्ट और अन्य दलों के साथ लड़ने के बावजूद शून्य पर सिमट गई थी। वहीं, दशकों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर राज करने वाले लेफ्ट दल भी अपने वजूद के लिए जूझ रहे हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि लेफ्ट और कांग्रेस अकेले लड़कर बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस को कैसे टक्कर देंगी।
क्या है प्लान?
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की हालत देखें तो वह हर चुनाव में कमजोर होती जा रही है। 2024 में उसे पश्चिम बंगाल की सिर्फ एक लोकसभा सीट पर जीत मिली थी। खुद अधीर रंजन चौधरी अपनी सीट से चुनाव हार गए थे। ऐसे में कांग्रेस चाहती है कि अब जब उसके पास गंवाने को कुछ नहीं बचा है तो वह खुद को अपने दम पर मजबूत करे। कांग्रेस को यह पता है कि वह अकेले ना तो सरकार बना पाने की स्थिति में है और ना ही मुख्य विपक्षी बनने का माद्दा है। ऐसे में उसकी कोशिश है कि बिना किसी और को साथ लिए वह उन सीटों पर फोकस करे जहां अपने दम पर जीत हासिल की जा सकती है।
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कांग्रेस के नेताओं का यह भी मानना है कि यह चुनाव TMC बनाम BJP होने वाला है और तीसरे मोर्चे के लिए कोई खास स्पेस नहीं बच रहा है। ऐसे में कांग्रेस की पूरी कोशिश होगी कि वह अपने वोट शेयर को बढ़ाए और जहां संभव हो सके अपने दम पर सीटें जीतने की कोशिश करे। बता दें कि साल 2016 में 44 सीटें और 12.4 प्रतिशत वोट पाने वाली कांग्रेस पार्टी को 2021 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 3 प्रतिशत वोट मिले थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे एक लोकसभा सीट पर जीत मिली और उसे सिर्फ 4.7 प्रतिशत वोट ही मिले।
लेफ्ट क्या करेगा?
एक-एक करके राज्य हारते जा रहे लेफ्ट के पास अब सिर्फ केरल में सरकार बची है। त्रिपुरा के दो चुनावों में उसे हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद पश्चिम बंगाल में उसे कोई फायदा नहीं मिला। इसके उलट उसे केरल में बीजेपी से यह सुनना पड़ा कि जिसके खिलाफ यहां वह लड़ रही है, बंगाल में उसी से हाथ मिला लिया है। हालांकि, अभी भी लेफ्ट के नेता चाहते हैं कि सब मिलकर साथ लड़ें ताकि वोटों के बिखराव का फायदा विपक्षियों को न मिले।
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बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी लेफ्ट और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में सिर्फ कांग्रेस 2 सीटें जीत पाई और लेफ्ट को एक भी सीट नहीं मिली। 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों ने फिर से हाथ मिला लिया था लेकिन फिर कोई फायदा नहीं हुआ।
एक कयास यह भी लगाया जा रहा है कि दोनों दल चुनाव तो अलग-अलग लड़ेंगे लेकिन एक-दूसरे के प्रभाव वाले इलाकों में सिर्फ नाम के लिए चुनाव लड़ेंगे। चर्चा है कि एक रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है ताकि त्रिकोणीय लड़ाई में कांग्रेस या लेफ्ट की स्थिति थोड़ी बेहतर रहे।
