पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी अपने सख्त प्रशासनिक/राजनैतिक रवैये के लिए जानी जाती हैं। वह बंगाल की लगातार तीन बार से मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करके ममता बनर्जी चौथी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनने की तैयारी कर रही हैं। दरअसल, उन्हें देश की उन महिला नेताओं में शुमार किया जाता है, जो अपनी जिद और अड़ियल रवैये के कारण अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वर्तमान में जिस जगह पर आसीन हैं और उन्होंने अपने सियायी करियर में जो कुछ हासिल किया है, इसके पीछे उनका यही रवैया और मेहनत है।

 

ममता बनर्जी का चाहे वह साल 1997 में कांग्रेस से आंतरिक गुटबाजी और मतभेद के कारण पार्टी छोड़ना हो और फिर बाद में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना करना हो। संसद में रहकर एक सांसद और केंद्रीय मंत्री के तौर पर पक्ष-विपक्ष से अड़ना हो वह अपनी बात कहने से कभी पीछे नहीं हटीं। यही वजह है कि उनकी सियासी लड़ाई पहले कांग्रेस और लेफ्ट से थी। ममता अब यही लड़ाई बीजेपी से लड़ रही हैं।

 

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दरअसल, 2014 के बाद की ममता बनर्जी की राजनीतिक लड़ाई देखने के बाद मालूम पड़ता है कि उनका सियासी दुश्मन कांग्रेस नहीं बल्कि बीजेपी है। यह बात समय-समय सिद्ध भी साबित हुई है। सीएम ममता 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्यपालों और राष्ट्रपति तक से लड़ी हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल हों, ममता बनर्जी इन सबका सियासी लोड क्यों नहीं लेती हैं...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अदावत

टीएमसी सुप्रीमों ममता बनर्जी हमेशा आक्रामक, व्यक्तिगत और प्रतीकात्मक तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करती हैं। वह अक्सर अपनी रैलियों और भाषणों में पीएम को फासीवादी और झूठा कहकर संबोधित करती हैं। वह मोदी सरकार के ऊपर संवैधानिक पदों का दुरुपयोग करने का आरोप लगाती हैं। उनका कहना है कि मोदी सरकार सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग सहित केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल करके टीएमसी और राज्य सरकार को परेशान करती है।

 

 

ममता पश्चिम बंगाल में मोदी की तानाशाही और लोकतंत्र पर हमले का आरोप लगाकर खुद को और विपक्षी एकता के लिए समर्थन जुटाने की रणनीति पर काम करती हैं। क्योंकि बीजेपी बंगाल में कभी सत्ता में नहीं आई। भगवा पार्टी बंगाल में हमेशा से विपक्ष में रही है, मगर 2019 और 2024 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बंगाल में शानदार तरीके से जगह बनाई है, जिससे टीएमसी के लिए मुश्किल खड़ी हुई है। 

 

बीजेपी बंगाल में अपने पैर मजबूत ना कर पाए, इस वजह से ममता बनर्जी पीएम मोदी और बीजेपी को जमकर निशाना बनाती हैं। दूसरी तरफ बंगाल की सत्ता में आने के लिए पीएम मोदी और बीजेपी ममता बनर्जी के ऊपर अक्सर हमलावर रहते हैं।    

राज्यपालों से ममता की तनातनी

ममता बनर्जी सबसे पहली बार साल 2011 में बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं। तब से लेकर अभी तक वह लगातार मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हैं। इस दौरान राज्य और केंद्र के ऐसे कई मुद्दे रहे, जिनपर मुख्यमंत्री बनाम राज्यपाल हो गया। ऐसे में राज्यपालों से ममता की तनातनी रही। ममता के कार्यकाल में मुख्य रूप से दो राज्यपालों के साथ सार्वजनिक और तीखी तनातनी रही है। बाकी राज्यपालों (जैसे केशरी नाथ त्रिपाठी या अतिरिक्त चार्ज वाले) के साथ रिश्ता अपेक्षाकृत शांत या कम विवादित रहा। 

 

ममता बनर्जी का जगदीप धनखड़ (2019-2022 राज्यपाल) के साथ सबसे ज्यादा और सबसे तीखी तनातनी रही। दोनों के बीच लगभग 14 प्रमुख विवाद को लेकर सार्वजनिक तौर पर बहसें सामने आईं। इसके बाद सीवी आनंद बोस (2022-2026) बंगाल के राज्यपाल रहे। बोस के साथ भी सीएम ममता नाराजगी हुई। बंगाल में राज्य सरकार के विश्वविद्यालयों के वाइस-चांसलर नियुक्ति पर ममता का गवर्नर के साथ लंबा संघर्ष देखने को मिला। उन्होंने गवर्नर पर VC की नियुक्ति में हस्तक्षेप का आरोप लगाया। इसके अलावा राज्यपाल से पंचायत चुनाव हिंसा, राज्य फाउंडेशन डे, जिले दौरे और कानून-व्यवस्था पर बयानबाजियों को लेकर विवाद रहा।

 

 

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ ताजा विवाद

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 7 मार्च को 9वें अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए पश्चिम बंगाल पहुंचीं। वह कार्यक्रम में जैसे ही पहुंची उन्होंने छोटे कार्यक्रम स्थल को लेकर नाराजगी जता दी। उन्होंने इस बात पर भी दुख जताया कि राष्ट्रपति के निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार उन्हें स्वागत करने के लिए मुख्यमंत्री या राज्य सरकार का कोई मंत्री मौजूद नहीं था। मुर्मू ने कहा कि उन्हें इससे व्यक्तिगत रूप से कोई आपत्ति नहीं है लेकिन देश के राष्ट्रपति के लिए तय किए गए प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए। 

 

राष्ट्रपति मुर्मू ने इस दौरान ममता बनर्जी को अपनी छोटी बहन बताया और हैरानी जताई कि क्या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री किसी बात को लेकर 'नाराज' हैं, क्योंकि उत्तर बंगाल दौरे के दौरान उनका स्वागत करने के लिए न तो मुख्यमंत्री आईं और न ही कोई अन्य मंत्री मौजूद था। 

 

 

राष्ट्रपति के इस बयान के बाद ममता ने कहा कि मुर्मू बीजेपी के इशारों पर विधानसभा चुनाव से पहले बयानबाजी कर रही हैं। सीएम ममता ने कहा कि बीजेपी राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए राष्ट्रपति कार्यालय का दुरुपयोग कर रही है। उन्होंने सीधा कहा कि चुनाव से पहले ऐसे कार्यक्रमों में हमेशा शामिल होना संभव नहीं है। साथ ही कहा कि अगर राष्ट्रपति साल में एक बार आती हैं तो मैं आपका स्वागत कर सकती हूं, लेकिन अगर आप चुनाव के दौरान आती हैं, तो मेरे लिए आपके कार्यक्रमों में शामिल होना संभव नहीं होगा क्योंकि मैं लोगों के अधिकारों के लिए काम कर रही हूं।

ममता किसके भरोसे लड़ती हैं?

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और राष्ट्रपति से इसलिए भिड़ जाती हैं क्योंकि उनकी अपने वोट बैंक पर मजबूत पकड़ है। इसी वोट बैंक के सहाने वह राजनीति में दशकों से प्रासंगिक बनी हुई हैं। टीएमसी की बंगाल में सबसे मजबूत पकड़ 27 फीसदी वाले मुस्लिम वोट बैंक पर है। यह ममता का सबसे मजबूत और विश्वसनीय आधार है। इसके अलावा ममता बनर्जी की पकड़ मतुआ समुदाय पर है, जो टीएमसी का SC वोट बैंक है। एक अनुमान के मुताबिक राज्य में इनकी आबादी 17 फीसदी है, जो बंगाल की 30-45 सीटों पर असर डालते हैं।

 

 

इसके अलावा ममता बनर्जी की एक बड़ी ताकत पश्चिम बंगाल के ST, ओबीसी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब लोग हैं, जो चुनावों में ममता की पार्टी को वोट करते हैं। कुल मिलाकर टीएमसी का वोट बैंक मुस्लिम, महिला, ओबीसी और SC/ST हैं।

राज्य आधारित मुद्दे पर फोकस

ममता बनर्जी हमेशा पश्चिम बंगाल के मुद्दों पर फोकस करती हैं। वह भली-भांति जानती हैं कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को बंगाल के की राजनीति में कोई खास मतलब नहीं है। इसीलिए वह राज्य के गरीबों, मुस्लिमों, बंगाली भाषा, संस्कृति और बंगाली अस्मिता को लेकर की बात करती हैं। हालांकि, बीजेपी हमेशा अपने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे लाकर उन्हें अपनी पिच पर लाने का प्रयास करती है लेकिन वह बीजेपी के बनाए गए मुद्दों को अपने पक्ष में लाने में सफल रहती हैं।