समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 29 मार्च को 'मिशन यूपी 2027' का शंखनाद गौतमबुद्धनगर जिले की दादरी विधानसभा से कर दी। इसी विधानसभा से समाजवादी पार्टी बिसात बिछाना भी शुरू कर दिया है। नोएडा के दादरी से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत करते हुए सपा प्रमुख ने इसे 'समाजवादी समानता-भाईचारा रैली' नाम दिया है। इस रैली के माध्यम से अखिलेश ने पीडीए के समीकरणों को मजबूत करने का संदेश दिया। माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी इस रैली के जरिए अपने चुनाव अभियान को तेज करेगी और इसे पूरे उत्तर प्रदेश में लेकर जाएगी।
यह रैली दादरी के 'मिहिर भोज' डिग्री कॉलेज के बड़े से मैदान में की गई। रैली के लिए राजा मिहिर भोज के नाम को सपा ने ऐसे ही नहीं चुना बल्कि इसके पीछे आगे की रणनीति छुपी हुई है। दरअसल, मिहिर भोज 836 AD से लेकर 885 तक शक्तिशाली गुर्जर राजा थे। वह गुर्जर-प्रतिहार वंश के एक प्रमुख सम्राट थे। उन्होंने 49 सालों तक राज किया।
मिहिर भोज का गुर्जर समाज में बहुत सम्मान है। इसलिए राजा का नाम गुर्जर जाति में आदर से लिया जाता है। इस रैली का मुख्य आकर्षण मिशन 2027 तो है ही लेकिन इसके अलावा इसमें सबसे प्रमुख नाम 'गुर्जर जाति' का रहा। समाजवादी पार्टी ने इस रैली रैली को सफल बनाने की जिम्मेदारी भी गुर्जर नेता राजकुमार भाटी और उनके साथियों को दिया। इस रैली के जरिए सपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 32 जिलों में फैली 140 विधानसभा सीटों पर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश की।
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ऐसे में आइए जानते हैं कि गुर्जर समाज अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी का हो पाएगा? क्या यह समाज आगामी चुनाव में सपा को वोट करेगा? साथ ही सपा मुखिया दादरी से गुजर्रों को क्या संदेश दे रहे हैं...
अहम क्यों हैं गुर्जर?
दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की 2014 के बाद से मजबूत पकड़ है। यहां की ज्यादातर सीटें बीजेपी की झोली में जाते हैं। यह पैटर्न लोकसभा और विधानसभा चुनाव में देखने को मिला है। बीजेपी की इस जीत में गुर्जर जाति की भी भागीदारी रही है। यही वजह है कि सपा और अखिलेश यादव बीजेपी के हाथों से यह सीटें छीनने के लिए गुर्जर समाज को अपने पाले में करने की कोशिश कर रहे हैं।
पार्टी निगाहें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 100 से अधिक सीटों पर है। इसके लिए पूरा जोर गुर्जर-जाट के साथ मुस्लिम-दलितों की अपने पक्ष में गोलबंदी करने पर है। इसके लिए पार्टी ने 30 से अधिक जिलों से भीड़ जुटाने की तैयारी की थी। इस रैली में दर्जनों जिलों से भारी संख्या में लोग शामिल हुए, जिससे कार्यक्रम में भारी भीड़ देखने को मिली।
पश्चिमी यूपी के वोटरों को साधने की कोशिश?
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश सियासी दलों के लिए सबसे अहम क्षेत्र बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इससे एक दिन पहले 28 मार्च को नोएडा के ही जेवर में बड़ी रैली को संबोधित करके समाजवादी पार्टी पर हमला बोला। साथ ही पूर्ववर्ती सपा सरकार पर जिले को पीछे ले जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि सपा वालों ने नोएडा को अपना एटीएम बना लिया था। प्रधानमंत्री ने इशारों में समाजवादी पार्टी पर हमला बोलते हुए विकास कार्यों को अपनी सरकार की उपलब्धि बताया।
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ऐसे में पीएम मोदी के आरोपों को लेकर अखिलेश यादव ने पलटवार किया। अखिलेश यादव ने हमला बोलते हुए कहा, 'जो लोग एयरपोर्ट का उद्घाटन कर रहे थे, जिन लोगों ने खबरें ठीक से पढ़ी होंगी। पहले भी इस सरकार में एयरपोर्ट्स के उद्घाटन हुए हैं, उनमें से सात एयरपोर्ट में छह बंद हो गए हैं। कम से कम इस एयरपोर्ट के उद्घाटन के समय यह वादा करके जाते कि इसे बेचा नहीं जाएगा। लगता तो ऐसा है कि यह उद्घाटन ही बेचने के लिए हुआ है।'
अपनी-अपनी पार्टी के दोनों शीर्ष नेताओं ने इस बार नोएडा से ही चुनावी शंखनाद शुरू किया है। यही वजह है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव इस रैली के जरिए वोटरों को साधने के साथ बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि इस रैली के बाद प्रदेश में बीजेपी का ग्राफ गिरना शुरू हो जाएगा। सपा ने इसे परिवर्तन की शुरुआत बताया।
गुर्जर जाति प्रभावशाली वोट बैंक
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गुर्जर जाति एक प्रभावशाली वोट बैंक मानी जाती है। कई जिलों में यह निर्णायक भूमिका निभाती है। मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़ आदि में गुर्जर आबादी काफी निर्णायक मानी जाती है। कई विधानसभा सीटों पर इनकी संख्या 5 से लेकर 15 फीसदी तक है। इसी वजह से गुर्जर यहां चुनाव में किंगमेकर की भूमिका में आ जाती है।
गुर्जर जाति का राजनीतिक रुझान?
गुर्जर समाज को परंपरागत रूप से राष्ट्रवादी और किसान राजनीति से जुड़कर देखा जाता है। इसी पैटर्न पर यह वोट भी करते हैं। 2014 के बाद से इनका झुकाव काफी हद तक भारतीय जनता पार्टी की ओर बढ़ा है लेकिन स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार और जातीय समीकरण बहुत अहम होते हैं। गुर्जर समय के हिसाब से राजनीतिक रुझान बदलते भी रहे हैं। यानी कि यह फिक्स वोट बैंक नहीं, बल्कि सिचुएशनल वोटर हैं। अखिलेश यादव इसी मौके पर अपने पक्ष में भुनाना चाहते हैं।
