सनातन धर्म में एकादशी का व्रत बेहद पावन माना जाता है। साल में कुल 24 एकादशी होते हैं। एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है और व्रत भी रखा जाता है। सभी एकादशी व्रतों में कामदा एकादशी का खास महत्व है क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु इस दिन सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
हिन्दू धर्म के कई जानकारों का मानना है कि जो भी भक्त कामदा एकादशी का व्रत रखता है, वह अपने पापों से मुक्त हो जाता है और उसके जीवन में सुख-शांति का वास होता है। कामदा एकादशी को फलदा एकादशी भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन लोगों की इच्छाएं पूरी होती हैं। वर्ष 2026 में मार्च महीने में कामदा एकादशी पड़ रही है। इस दिन कथा पढ़ने और सुनने की खास मान्यता है। अब सवाल यह है कि मार्च महीने में किस तारीख को कामदा एकादशी का व्रत रखा जाएगा, कौन सी कथा पढ़नी और सुननी चाहिए और पूजा किस प्रकार करनी चाहिए तो आइए जान लेते हैं।
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कब है कामदा एकादशी?
हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने की कामदा एकादशी 29 मार्च को शुरू होगी। शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत का पारण हमेशा द्वादशी तिथि को किया जाता है। इसी प्रकार कामदा एकादशी व्रत का पारण 30 मार्च को किया जाएगा। पारण का शुभ समय सुबह 6 बजकर 14 मिनट से 7 बजकर 9 मिनट तक रहेगा।
पूजा की विधि
कामदा एकादशी के दिन सुबह-सुबह स्नान करें। इसके बाद स्वच्छ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प लें। घर के पूजा स्थल पर दीपक जलाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें। पूजन के समय भगवान के समक्ष तुलसी का पत्ता, पीले फल, फूल, खीर, मखाना या कोई सफेद मिठाई अर्पित करें। इसके बाद कामदा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। माना जाता है कि कामदा एकादशी का व्रत तब तक अधूरा रहता है, जब तक व्रत कथा न सुनी जाए। पूजन के बाद लक्ष्मी मंत्र का 108 बार जाप करें।
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पूजन का शुभ समय
29 मार्च को सुबह 6 बजे से 7 बजकर 30 मिनट तक पूजा के लिए शुभ समय रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय पूजन करना सबसे शुभ माना जाता है। हालांकि, जो भक्त सुबह पूजा नहीं कर पाते वे दोपहर में भी पूजा कर सकते हैं।
कामदा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार कामदा एकादशी की कथा गुरु वशिष्ठ ने भगवान राम के पूर्वज राजा दिलीप को सुनाई थी। प्राचीन काल में भोगीपुर नाम का एक नगर था, जहां राजा पुण्डरीक का शासन था। इस नगर में ललिता और ललित नाम के दंपत्ति प्रेमपूर्वक रहते थे। ललित राजा के दरबार में गीत गाने का काम करता था। एक बार गीत गाते समय उसका ध्यान अपनी पत्नी की ओर चला गया, जिससे उसका सुर बिगड़ गया। यह देखकर राजा क्रोधित हो गए और उन्होंने ललित को राक्षस बनने का श्राप दे दिया। श्राप के कारण ललित राक्षस बन गया और मांस खाने लगा। उसका रूप भी भयानक हो गया। ऐसी स्थिति में भी ललिता ने अपने पति का साथ नहीं छोड़ा और लोगों से पूछती रही कि इस श्राप से मुक्ति कैसे मिले।
एक दिन ललिता अपने पति के पीछे जंगल में गई, जहां उसे एक आश्रम दिखाई दिया। वहां एक मुनि थे। ललिता ने उन्हें प्रणाम किया और अपना परिचय देकर अपने पति के श्राप के बारे में बताया। मुनि ने कहा कि चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने से प्राप्त पुण्य यदि तुम अपने पति को अर्पित कर दोगी तो वह श्राप से मुक्त हो जाएगा। मुनि की बात सुनकर ललिता ने कामदा एकादशी का व्रत किया और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की। द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण किया और व्रत का पुण्य अपने पति को अर्पित कर दिया। व्रत के प्रभाव से ललित धीरे-धीरे श्राप से मुक्त होकर अपने मानव रूप में लौट आया। इसके बाद दोनों पति-पत्नी ने मिलकर 24 एकादशी व्रत करना शुरू किया। इस प्रकार उनके जीवन की सभी परेशानियां दूर हो गईं और वे सुखी जीवन जीने लगे। एकादशी व्रत के प्रभाव से उनके पाप भी नष्ट हो गए।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि नहीं की जाती है।
