हिन्दू धर्म में माना जाता है कि मोक्ष की प्राप्ति केवल भगवान विष्णु के आशीर्वाद से ही संभव है। इसी मोक्ष की प्राप्ति के लिए लाखों लोग भगवान विष्णु के बद्रीनाथ धाम जाते हैं। धार्मिक मान्यता के मुताबिक बद्रीनाथ में दर्शन करने से लोगों को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। मोक्ष पाने के लिए एक राक्षस ने भी भगवान विष्णु की भक्ति की थी। जिससे उसे न सिर्फ भगवान विष्णु का वरदान मिला था, बल्कि वह बद्रीनाथ धाम का रक्षक भी बन गया था।
पौराणिक कथाओं के मुताबिक पिशाच योनि में जन्म लेने वाले राक्षस घंटाकर्ण थे, जो भगवान शिव के परम भक्तों में से एक थे। वह दिन-रात भगवान शिव की तपस्या करते थे। इसके अलावा उन्हें भगवान विष्णु से बेहद नफरत थी। वह भगवान विष्णु का नाम सुनना भी पसंद नहीं करते थे। हालांकि बाद में घंटाकर्ण भी भगवान विष्णु के भक्त बन गए थे। अब सवाल उठता है कि किस वजह से घंटाकर्ण भगवान विष्णु के भक्त बने थे।
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घंटाकर्ण शिव भक्ति में लीन
घंटाकर्ण ने पिशाच योनि में जन्म लिया था। वह बाकी राक्षसों से बिल्कुल अलग थे। राक्षस होने के बावजूद वह हमेशा शिव भक्ति में लीन रहते थे। जहां एक तरफ वह खुद को भगवान शिव का परम भक्त मानते थे, वहीं दूसरी तरफ भगवान विष्णु का नाम लेना भी पसंद नहीं करते थे।
घंटाकर्ण ने एक बार अपने दोनों कानों में घंटा बांध लिया था। जब भी कोई उनके सामने भगवान विष्णु का नाम लेता था, तो वह घंटी बजा लेते थे, जिससे उन्हें सिर्फ घंटी की आवाज सुनाई दे। इसी वजह से उन्हें घंटाकर्ण नाम से जाना जाने लगा।
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कैसे बने भगवान विष्णु के भक्त ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, घंटाकर्ण राक्षस योनि से मुक्ति चाहते थे। इसके लिए उन्होंने भगवान शिव की खूब तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। शिव जी ने बताया कि उनके पास मोक्ष देने की शक्ति नहीं है। मोक्ष देने का अधिकार भगवान विष्णु के पास है। ऐसे में घंटाकर्ण बद्रीनाथ धाम गए, जहां उन्होंने भगवान विष्णु का वरदान पाने के लिए कठोर तपस्या की। इस तपस्या से भगवान विष्णु बेहद खुश हुए।
घंटाकर्ण बने बद्रीनाथ धाम के रक्षक
भगवान विष्णु घंटाकर्ण की तपस्या देखकर बेहद खुश हुए थे। जिसके बाद भगवान विष्णु ने उन्हें न सिर्फ मोक्ष का वरदान दिया, बल्कि बद्रीनाथ धाम का रक्षक भी बना दिया। इसी वजह से आज भी बद्रीनाथ में घंटाकर्ण की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार किसी भी भक्त की बद्रीनाथ धाम यात्रा तभी सफल मानी जाती है, जब वह घंटाकर्ण के दर्शन भी करे। बद्रीनाथ धाम में कपाट खुलने और बंद होने की परंपराओं में भी घंटाकर्ण की अहम भूमिका मानी जाती है।
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