अगर सिख इतिहास को ध्यान से पढ़ा जाए तो यह समझ आता है कि गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोबिन्द सिंह जी तक सभी गुरुओं का उद्देश्य एक मजबूत राष्ट्र बनाना था। इस बड़े लक्ष्य को पूरा करने के लिए समाज में चल रहे त्योहारों को मनाने के तरीके में बदलाव लाना जरूरी था। उस समय के त्योहारों में कई ऐसी परंपराएं थीं जिन्हें सुधारने की आवश्यकता थी।

 

इसी सोच के साथ गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 17वीं शताब्दी में भारत के प्राचीन और पारंपरिक त्योहार होली को एक नए और क्रांतिकारी रूप में मनाने की शुरुआत की। उन्होंने इसे ‘होला महल्ला’ के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की, ताकि समाज में अनुशासन और एकता की भावना मजबूत हो सके।

 

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मुगल शासन में पाबंदियां

मुगल शासन के दौरान आम भारतीयों पर घुड़सवारी करने, पगड़ी बांधने और हथियार रखने जैसी कई पाबंदियां थीं। गुरु साहिब ने इन प्रतिबंधों को तोड़ते हुए इन्हीं कार्यों को पर्व का मुख्य हिस्सा बना दिया। उन्होंने आनंदपुर साहिब के किले में सिखों को युद्ध कला (मार्शल आर्ट्स) और शस्त्र विद्या में निपुण करने के लिए इस रीति की शुरुआत की, ताकि एक ऐसा समाज तैयार हो सके जो कमजोरों की रक्षा कर सके।

शब्दों के अर्थ

विद्वानों के अनुसार, 'होला' अरबी शब्द है जिसका अर्थ है 'हमला' और 'महल्ला' फारसी का शब्द है जिसका मतलब है 'हमले का स्थान'। गुरु गोबिंद सिंह जी ने इसे केवल नाम नहीं दिया बल्कि भक्ति और शक्ति का ऐसा संगम बनाया जहां शस्त्रों के अभ्यास के साथ-साथ गुरबाणी का पाठ और कीर्तन भी जरूरी कर दिया।

आनंदपुर साहिब में युद्ध का अभ्यास

साल 1700 ईस्वी में पहला होला महल्ला आनंदपुर साहिब के होलगढ़ किले में मनाया गया था। यहां गुरु साहिब अपनी फौज को दो दलों में बांटकर 'गुरिल्ला युद्ध' का अभ्यास करवाते थे। इसमें रणनीति के तहत एक दल किसी निश्चित स्थान पर कब्जा करता और दूसरा उसे छुड़ाने की कोशिश करता।

 

अभ्यास के बाद दीवान सजाए जाते और विजेता दल को सिरोपा देकर सम्मानित किया जाता। इसी परंपरा का परिणाम था कि चमकौर की गढ़ी में मात्र 40 सिखों ने विशाल मुगल सेना का डटकर मुकाबला किया।

 

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शौर्य की परंपरा

पिछले 300 से अधिक वर्षों से आनंदपुर साहिब में यह पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। होली से एक दिन पहले शुरू होने वाले इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में आज भी लाखों की संगत जुटती है।

 

निहंग सिख और अन्य श्रद्धालु घुड़सवारी, तलवारबाजी और 'गतका' के हैरतंगेज कारनामे दिखाते हैं। तख्त श्री केशगढ़ साहिब में सजे दीवानों में गुरु साहिब और साहिबजादों के बलिदान की कहानियां सुनाई जाती हैं, जो लोगों में नया जोश भर देती हैं।

 

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि गुरु साहिब ने जो कृपाण उठाने का आदेश दिया था, उसका मकसद केवल अपनी रक्षा नहीं बल्कि गरीबों और लाचारों को बचाना था।

 

नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।