प्राचीन काल के मनुपुत्र राजा शर्याति धर्म, वेद और मर्यादा के प्रतीक माने जाते थे। उनकी एक पु्त्री थीं, जो अत्यधिक सुंदर और कोमल स्वभाव की थीं। उनका नाम था सुकन्या। एक दिन राजा अपनी सेना और पुत्री के साथ वन भ्रमण करने गए। जहां पुत्री सुकन्या अपनी सखियों  संग घूम रही थीं, तभी उनकी नजर एक दीमक की बांबी पे पड़ी जिसे दो अद्भुत ज्योतियां चमक रही थीं। बालसुलभ जिज्ञासा में सुकन्या ने जुगनू समझकर कांटे से निकाल दिया। 

लेकिन वह कोई जुगनू नहीं बल्कि घोर तपस्या में लीन महर्षि च्यवन की आंखें थीं। कांटे की वजह से ऋषि की आंखें, फूटकर रक्तरंजित हो गई थीं। तभी राजा शर्याति पहुंचते हैं और वहां की स्थिति देखकर सन्न हो जाते हैं। वह ऋषि च्यवन के पैरों में गिरकर क्षमा मांगते है। वहीं पुत्री सुकन्या अपना अपराध स्वीकार करती है और प्रायश्चित्त के रुप में ऋषि च्यवन से विवाह करने का निर्णय लेती है। 

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सुकन्या की कठिन परीक्षा

तपस्या के कारण ऋषि च्यवन का शरीर सूख सा गया था, जिसमें सिर्फ हड्डियां दिख रही थीं। उनका स्वभाव अत्यंत कठोर हो गया था। सुकन्या ने बिना किसी संकोच के उन्हें पति के रुप में स्वीकार किया। उन्होंने अपने राजसी सुखों को त्यागकर सेवा और भक्ति के मार्ग को चुन लिया। सुकन्या दिन-रात अपने पति की सेवा में लगी रहती थीं। उनकी निष्ठा और प्रेम को देखकर ऋषि च्यवन का कठोर मन पिघल सा गया।

अश्विनी कुमार द्वारा च्यवन मुनि का कायाकल्प

एक दिन देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार च्यवन के आश्रम पहुंचे। ऋषि च्यवन ने उनसे अपनी युवावस्था पुनः पाने की इच्छा प्रकट की और बदले में उन्हें सोमयज्ञ में भाग दिलाने का वचन दिया। अश्विनीकुमार उन्हें एक दिव्य कुण्ड के पास ले गये और कहा कि, 'इस पवित्र कुण्ड में स्नान कीजिए, ऋषिवर।'

अत्यंत दुर्बल शरीर के साथ च्यवन मुनि कुण्ड में प्रवेश किए और कुछ ही क्षणों में वहां से तीन समान रुपधारी, तेजस्वी और सौंदर्य से परिपूर्ण युवक बाहर निकले। यानी तीनों का रूप, वस्त्र और आभूषण एक जैसा ही था। अब अश्विनीकुमार सुकन्या के सामने धर्मसंकट खड़ा कर देते है कि अब वह अपने पति को कैसे पहचाने?

उसने बड़ी विनम्रता से अश्विनी कुमार की शरण ली और कहा, 'मुझे बताइए, इनमें मेरे स्वामी कौन हैं? मैं किसी अन्य पुरुष को पति के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती।' उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमार ने च्यवन मुनि की ओर संकेत किया और सुकन्या ने उसी वक्त उन्हें पहचान लिया। 

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पिता का क्रोध और सत्य का दर्पण 

कुछ समय बाद राजा शर्याति यज्ञ के लिए आश्रम पहुंचे। वहां उन्होंने अपनी पुत्री को एक अत्यंत तेजस्वी युवक के साथ बैठे देखा। वह क्रोधित होकर सुकन्या को कठोर वचन कहने लगे। सुकन्या शांत होकर कहती हैं, 'पिताजी, यह कोई अन्य पुरुष नहीं। यही मेरे पति ऋषि च्यवन है। अब अपने नवयुवक रुप में।'

सुकन्या ने पूरी कथा सुनाई। राजा शर्याति लज्जित और आनंदित हो उठे। उन्होंने पुत्री को हृदय से लगा लिया। 

देवताओं का अहंकार-भंग कैसे किया?

ऋषि च्यवन ने सोमयज्ञ का आयोजन कराया और अपने तपोबल से अश्विनी कुमार को सोमपान का अधिकार दिलाया। देवताओं के राजा इन्द्र इससे क्रोधित हो गए और वज्र उठा लिया। लेकिन च्यवन मुनि ने अपने योगबल से इन्द्र का हाथ वज्र सहित स्थिर कर दिया। अंततः देवताओं को झुकना पड़ा और अश्विनी कुमार को उनका अधिकार प्राप्त हुआ।

डिस्क्लेमर: यह कथा, देवी भागवत पर आधारित है।