समय की गणना के लिए दुनिया में मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जाते हैं एक जो सूर्य पर आधारित है जिसे हम सौर कैलेंडर कहते हैं और दूसरा जो चंद्रमा पर आधारित है जिसे चंद्र कैलेंडर कहा जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर, जिसे हम ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं, पूरी तरह सौर गणना पर टिका है। इसमें एक साल 365 दिन और 6 घंटे का होता है। इन अतिरिक्त 6 घंटों को हर चार साल में जोड़कर एक पूरा दिन यानी 24 घंटे बना दिया जाता है, जिसे हम 'लीप ईयर' और 29 फरवरी के रूप में जानते हैं।
दूसरी ओर, भारतीय हिंदू पंचांग चंद्रमा और सूर्य दोनों की चाल को मिलाकर चलता है। चंद्रमा का एक साल सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा होता है। यदि इस अंतर को ठीक न किया जाए, तो हमारे त्योहार (जैसे दिवाली या होली) हर साल पीछे खिसकते जाएंगे और मौसम से उनका तालमेल बिगड़ जाएगा। इसी 11 दिन के अंतर को हर तीन साल में जोड़ने पर जो एक अतिरिक्त महीना बनता है, उसे ही 'अधिकमास', 'मलमास' या 'पुरुषोत्तम मास' कहा जाता है।
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कैसे की जाती है गणना?
लीप ईयर, सौर वर्ष पर आधारित है। पृथ्वी सूर्य का चक्कर 365.24 दिनों में लगाती है। इस डेसिमल को एडजस्ट करने के लिए हर चौथे साल फरवरी में 1 दिन जोड़ा जाता है। वहीं अधिकमास, चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच के अंतर को खत्म करने के लिए है। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है और सौर वर्ष 365 दिनों का। इस 11 दिन के अंतर को संतुलित करने के लिए हर 32 महीने, 16 दिन और 8 घंटे के बाद एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है।
कब-कब आता है?
लीप ईयर नियम के अनुसार हर 4 साल में एक बार आता है। वहीं अधिकमास लगभग हर 3 साल (2.5 से 3 साल) के अंतराल पर आता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
लीप ईयर का कोई विशेष धार्मिक महत्व नहीं है। यह केवल प्रशासनिक और कैलेंडर संबंधी सटीकता के लिए है। वहीं अगर अधिकमास की बात करें तो हिंदू धर्म में इसका अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व है। इसे 'मलमास' भी कहते हैं क्योंकि इसमें शुभ कार्य (शादी, मुंडन) वर्जित होते हैं लेकिन इसे 'पुरुषोत्तम मास' कहकर भगवान विष्णु की भक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
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प्रभाव
लीप ईयर, यह सुनिश्चित करता है कि हमारे मौसम कैलेंडर की तारीखों के साथ बने रहें। वहीं अधिकमास यह सुनिश्चित करता है कि हमारे त्योहार सही मौसम में पड़ें। उदाहरण के लिए, यदि अधिकमास न हो, तो कुछ दशकों बाद होली कड़ाके की ठंड में और दिवाली चिलचिलाती गर्मी में आने लगेगी।