बिहार के सासाराम के रोहतास जिले में कैमूर की पहाड़ियों के बीच एक ऐसा अनोखा मंदिर है जिसकी महिमा की चर्चा देश के कोने-कोने में होती है। हम बात कर रहे हैं मां ताराचंडी धाम की जिसे सती के 51 शक्तिपीठों में से एक होने का गौरव मिला हुआ है। मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के हिस्से किए थे, तब यहां उनकी दाहिनी आंख यानी 'तारा' गिरी थी, जिससे इस स्थान को इसका पावन नाम मिला।
यह धाम केवल आम श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं बल्कि तंत्र साधना करने वालों के लिए भी बहुत खास माना जाता है। इसका सीधा संबंध असम के मशहूर कामाख्या मंदिर से जोड़ा जाता है। जानकारों का कहना है कि पूरे भारत में जो चार 'मुद्रा पीठ' हैं, उनमें कामाख्या और ताराचंडी का स्थान सबसे ऊपर आता है। जहां कामाख्या में महामुद्रा की पूजा होती है, वहीं यहां माता के नेत्र रूप की प्रधानता है, जो इसे एक शक्तिशाली आध्यात्मिक केंद्र बनाता है।
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मंदिर की खासियत
दिव्य दृष्टि का केंद्र: यहां माता की पूजा 'कुमारी' और 'चंडी' दोनों रूपों में की जाती है। भक्तों का अटूट विश्वास है कि यहां मत्था टेकने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन में एक नई और दिव्य दृष्टि का संचार होता है।
प्रकृति और आस्था का संगम: इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां कोई बनावटी मूर्ति नहीं है। एक विशाल शिलाखंड (पत्थर) पर उभरी प्राकृतिक आकृति की ही पूजा की जाती है। मंदिर के अंदर जल रही अखंड ज्योति को भक्त साक्षात मां का रूप मानते हैं।
साधना का केंद्र: नवरात्रि के दौरान यहां का माहौल बिल्कुल कामाख्या जैसा ही नजर आता है। यहां देश भर से साधक तांत्रिक सिद्धियों के लिए जुटते हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, कामाख्या और ताराचंडी के बीच एक गहरा ऊर्जा चक्र काम करता है, जो इसे तंत्र साधना के लिए सबसे उपयुक्त स्थान बनाता है।
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पर्यटकों की पहली पसंद: सासाराम का यह इलाका पहाड़ियों और झरनों से घिरा हुआ है, जो इसे धार्मिक यात्रा के साथ-साथ पर्यटन के लिए भी खास बनाता है। खासकर सावन के महीने में यहां लगने वाले 'सावणी मेले' में लाखों की भीड़ उमड़ती है।
नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।
