सनातन धर्म के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर को जलाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इंसान का शरीर पांच तत्वों जैसे अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश और वायु से मिलकर बना है।  माना जाता है कि मृत्यु के बाद शरीर को आत्मा से मुक्ति मिलनी चाहिए। इसके अलावा माना जाता है कि व्यक्ति के शव को जलाने से उसका शरीर पांचों तत्वों में मिल जाता है, जिससे वह फिर से प्रकृति का हिस्सा बन जाता है। इसी कारण मृत्यु के बाद लोगों का अग्नि संस्कार किया जाता है।हर व्यक्ति का अग्नि संस्कार कराना जरूरी नहीं है। कुछ विशेष परिस्थितियों में यह नियम बदल जाता है।

 

 हिंदू धर्म में भी कुछ लोगों का मृत्यु के बाद अग्नि संस्कार नहीं किया जाता। कई लोगों को लगता है कि हिंदू धर्म में केवल अग्नि संस्कार की ही मान्यता है, जबकि मुस्लिम धर्म में शव को दफनाया जाता है लेकिन हकीकत कुछ और है। शास्त्रों के अनुसार बच्चों, गर्भवती महिलाओं और साधु-संतों की मृत्यु के बाद शव को जलाने के बजाय दफनाया जाता है। इस नियम के पीछे का कारण क्या है, आइए जानते हैं।

 

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जलाने के बजाय दफनाने का रहस्य

 

सनातन धर्म में कुछ लोग जैसे बच्चे, साधु-संत और गर्भवती महिलाओं को दफनाया जाता है। इन सभी को दफनाने के कारण अलग-अलग हैं। आइए एक-एक करके समझते हैं।

 

बच्चों को दफनाने का कारण

 

धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक जिन बच्चों की 14 साल से कम उम्र में मृत्यु होती है, उनका अग्नि संस्कार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें दफनाया जाना चाहिए। दफनाने के पीछे की वजह यह बताई जाती है कि बच्चों का मन शुद्ध होता है। न उनका कोई बड़ा पाप होता है और न ही ज्यादा पुण्य। इस वजह से उनके अंतिम संस्कार में अग्नि की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि माना जाता है कि बच्चों की आत्मा मृत्यु के बाद सीधे स्वर्ग लोक चली जाती है, यानी उन्हें मोक्ष मिल जाता है।

 

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गर्भवती महिला को दफनाने की वजह

 

हिंदू धर्म में गर्भवती महिलाओं की मृत्यु के बाद उनके शव को जलाने के बजाय दफनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इस दौरान महिला एक नए शिशु को जन्म देने वाली होती है, जो पूरी तरह पवित्र होता है।

 

 उसने न कोई बुरा कर्म किया होता है और न ही कोई अच्छा कर्म। इस वजह से माना जाता है कि इस अवस्था में महिलाएं बेहद पवित्र होती हैं। अगर उनकी इस अवस्था में मृत्यु हो जाती है, तो उनके शव को नहीं जलाना चाहिए। इसकी दूसरी वजह यह भी है कि शिशु के मरने के बाद उसे जलाया नहीं जाता, उसी प्रकार अजन्मे शिशु को अंतिम संस्कार में मां के साथ ही दफन किया जाता है।

 

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संतों को पहले ही मिलती है मुक्ति

 

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक साधु-संतों और संन्यासियों का दाह संस्कार नहीं करना चाहिए। धार्मिक जानकारों का मानना है कि साधु-संत और संन्यासी पहले से ही पवित्र होते हैं, क्योंकि वे अपने जीवनकाल में ही मोह-माया से मुक्ति पा चुके होते हैं। इसी वजह से उन्हें मिट्टी में समाधि दी जाती है।


डिस्क्लेमर- यह खबर मान्यताओं पर आधारित है, हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।